अग्रिम/ अंतिम अवस्था में देखभाल (Late-stage dementia care)

डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति जब अग्रिम अवस्था में पहुंचते है तो सब कामों के लिए पूरी तरह से निर्भर होते हैं. वे अकसर बातचीत नहीं कर पाते, और बिस्तर पर पड़ जाते हैं

देखभाल करने वाले क्या कर सकते हैं:  घर को देखभाल के लिए तैयार करें, होम-नर्सिंग के लिए तैयार रहें, जरूरी काम करना सीखें, और समर्थक सेवाओं का भी इस्तेमाल करें. सतर्क रहें, डॉक्टर से सम्पर्क रखें और सलाह लेते रहें. अन्य परिवार वालों से निरंतर सम्पर्क रखें क्योंकि शायद कुछ कठिन निर्णय लेने पड़ें या बुरी खबर देनी हो

अग्रियम/ अंतिम अवस्था तक पहुंचते पहुंचते डिमेंशिया (मनोभ्रंश) से ग्रस्त व्यक्ति देखभाल करने वालों पर हर काम के लिए लगभग पूरी तरह से निर्भर हो जाते हैं. अब उनकी देखभाल अन्य डिमेंशिया के अवस्थाओं की देखभाल से काफी भिन्न होती है.

भारत में अधिकाँश अग्रिम/ अंतिम अवस्था की देखभाल घर पर ही होती है, और परिवार वाले, उपलब्ध सेवाओंकी मदद से, डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल करते हैं. यह अग्रिम/ अंतिम चरण छोटा भी हो सकता है, या कई साल लंबा भी हो सकता है. व्यक्ति ही हालत बिगड़ती जाती है, और फिर अंत आ जाता है. इस अवस्था की देखभाल अन्य डिमेंशिया की अवस्थाओं की देखभाल से बहुत फर्क होती है.

अग्रिम अवस्था की देखभाल से सम्बंधित विषयों पर एक उपयोगी साधन है हमारे अंग्रज़ी साईट पर एक 6 भाग का इंटरव्यू सीरीज– इस में चर्चा के विषयों में शामिल देखभाल के लिए तैयार होना, मेडिकल सलाह प्राप्त करना, देखभाल के कुछ जरूरी पहलू जिन्हें हम अक्सर भूल जाते हैं, और एक ख़ास चिंताजनक विषय: खाना खाने की और निगलने की दिक्कत और ट्यूब-फीडिंग से सम्भ्नाधित निर्णय. इंटरव्यू लिस्ट यहाँ देखें.

घर को इस अवस्था की देखभाल के लिए तैयार करें

पूरी तरह से निर्भर और बिस्तर पर पड़े व्यक्ति की देखभाल के लिए घर में बदलाव करने होते है, और कई होम नर्सिंग और अन्य कामों के तरीके भी सीखने होते हैं. व्यक्ति के दैनिक कार्य अब बिस्तर पर या व्हीलचयेर पर होते हैं, और चलना फिरना बहुत कम या बंद हो जाता है. व्यक्ति को उठाने के, नहलाने के और साफ करने के, खाना खिलाने के, यह सभी तरीके सीखने होते हैं. सही तरह से न करने से व्यक्ति को और आपको, दोनों को तकलीफ हो सकती है. देखभाल करने वाले अगर सही तरीके न जानते हों तो उन्हें अकसर पीठ की तकलीफों हो जाती हैं. सही तरीकों के लिए आप इस विषय पर वीडियो देख सकते हैं, और चित्रों वाली किताबें देख सकते हैं, फिजियोथैरेपिस्ट से बात कर सकते हैं, और डॉक्टर से पूछ कर कहाँ से सीखें, यह भी पता चला सकते हैं.

अस्पताल बेड का इस्तेमाल करने से देखभाल में आसानी होती है, और पीठ की तकलीफें भी कम होती हैं. यह इसलिए क्योंकि देखभाल करते हुए आपको व्यक्ति को कई बार उठाना और लिटाना पड़ता है, और खाना देते हुए भी बिठाए रखना पड़ता है. साधारण पलंग पर इस सब काम में दिक्कत होती है, और एक जना अकेले कर भी नहीं पाता, पर अस्पताल बेड में लीवर होता है, और उसे घुमाने से पलंग के सिरहाने को ऊपर/ नीचे करा जा सकता है. रेलिंग वाला बेड लें तो व्यक्ति पलंग से लुढ़कजाएगा या गिर जाएगा, इसका भी डर नहीं होता.

एक और उपयोगी चीज़ है बेडरेस्ट (bedrest), जो सस्ता है और जिसे किसी भी पलंग पर लगाया जा सकता है. इसका इस्तेमाल करना उतना आसान तो नहीं जितना अस्पताल बेड का, पर फिर भी इससे काम में आसानी हो जाती है. (इसके इस्तेमाल का प्रदर्शन नीचे दिए गए एक वीडियो लिंक में है)

क्योंकि पलंग पर पड़ी अवस्था में मरीज कोई महीने बिता सकते हैं, आप अस्पताल बेड या बेडरेस्ट के बारे में जरूर सोचें.

बिस्तर पर पड़े रहने की वजह से व्यक्ति को बेड सोर (bed sore, pressure sore, शैय्या-व्रण) होने का खतरा होता है, और इसके लिए डॉक्टर से एयर मैट्रेस (alternating column air beds, air mattress) या वाटर बेड (water bed) के बारे में पूछें. (बेड सोर से बचने के लिए अन्य तरीकों के बारे में नीचे पढ़ें)

अगर व्यक्ति कुछ चल फिर सकता है, तो डॉक्टर से व्हीलचयेर, वाल्कर, और वाल्किंग स्टिक के बारे में सलाह लें.

घर में अन्य सहयोगी डिवाइस के बारे में भी सोचें. इन से व्यक्ति को काम करने में आसानी हो सकती है, और देखभाल करने वाले को भी सुविधा हो सकती है. आजकल भारत में भी कई इस प्रकार के सहयोगी डिवाइस (सहायक उपस्कर, assistive device) मिल जाते हैं जिनसे देखभाल अधिक सुलभ करी जा सकती है, चाहे वे व्यक्ति की सक्षमता बढ़ाएँ, उनके चलने-फिरने या दैनिक कामों को आसान बनाएं, या वे बिस्तर पर देखभाल करना आसान बनाएं, जैसे कि फोल्डिंग बेड ट्रे या शैम्पू करने के लिए खास डिजाईन का बना बेसन/ टब.

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समर्थक सेवाओं का इस्तेमाल करें

various things relevant for home care and medical emergencies

घर पर अग्रिम/ अंतिम अवस्था के डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल के लिए कुछ सेवाओं का भी प्रबंध करना होता है, जैसे कि:

  • घर से खून और पेशाब के सैम्पल लेने की सेवा
  • घर पर ECG
  • घर आकर नर्सिंग करने के लिए प्रशिक्षित नर्स जो बेड सोर की ड्रेसिंग कर पाए, और अन्य नर्सिंग के काम भी, जैसे इंजेक्शन देना, IV, नेबुलाइजर, कैथेटर, ब्लैडर वाश, वगैरह
  • घर आकर व्यायाम कराने वाले फिजियोथैरेपिस्ट
  • घर पर चेक अप करने वाले डॉक्टर

एमरजेंसी में अस्पताल ले जाने ले लिए भी इंतजाम होना चाहिए, और इसके लिए आप एम्ब्युलेंस सेवाओं का और अस्पतालों का नंबर अपने पास तैयार रखें. अस्पताल जल्दी में जाना पड़ सकता है, इस के लिए तैयार रहें–एक बैग में जरूरी डॉक्टर के कागज़ और हेल्थ बीमा के पेपर और आवश्यक दवा की पत्ती रखें. जिन जिन को सूचित करना पड़ सकता है, उनके नाम, ईमेल, और फ़ोन नंबर भी रखें.

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घर पर देखभाल करने के तरीके सीखें

बिस्तर पर व्यक्ति की देखभाल के लिए कई काम करने होते हैं. व्यक्ति तकरीबन पूरी तरह से आप पर निर्भर होंगे और अपनी जरूरतें भी शायद बता न पाएँ और देखभाल कर्ता के साथ सहयोग भी पूरी तरह न कर पाएँ. व्यक्ति को साफ सुथरा रखना, सही पोषण देना, व्यक्ति के स्वास्थ्य का खयाल रखना, यह सब देखभाल कर्ता की जिम्मेदारी हो जाती है. इसके लिए कई जरूरी तरीके सीखने होंगे, जैसे कि बिस्तर में लेते हुए व्यक्ति को नहलाना, बिस्तर पर ही जरूरी व्यायाम करवाना, खिलाना पिलाना, साफ करना, इत्यादि.

इस तरह की देखभाल के तरीकों को होम नर्सिंग कहते हैं (home-nursing skills). इस होम नर्सिंग की श्रेणी में क्या क्या सीखना चाहिए, इसके लिए अपने डॉक्टर, नर्स, और फिजियोथैरेपिस्ट से सलाह करें. जानकारी के लिए देखें कि नर्स काम कैसे करती हैं, वीडियो देखें, नर्सिंग की किताबें देखें, फिजियोथैरेपिस्ट से सिखाने का अनुरोध करें. देखभाल करने के लिए जरूरी है कि आप ये सब खुद कर पाएँ, या कोई और कर रहा हो तो सुपरवाइज कर पाएँ– आप यह देख पाएँ कि यह काम ठीक से हो रहा है या नहीं.

नीचे के एक सेक्शन में सीखने लायक कई जरूरी तरीकों की सूची है, जो सांकेतिक है पर आपको होम नर्सिंग सीखना शुरू करने में काम आ सकती है. डॉक्टर से सलाह करके सूची में अन्य तरीके अपनी जरूरत के हिसाब से जोड़ें, और जो खरीदना हो, उसके बारे में भी जानें.

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व्यक्ति को समझें

इस अवस्था में आते आते डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की बातचीत अकसर बंद सी हो जाती है, और यह आपको ही अंदाजा लगाना पड़ेगा कि व्यक्ति को किस वक्त क्या चाहिए, या क्या उन्हें कोई तकलीफ है. क्या उन्हें भूख लग रही है? प्यास लगी है? अगर वे सूप थूक रहे हैं, तो क्या सूप गाढ़ा है या ठंडा है या ज्यादा गरम या उस में नमक या मिर्च ज्यादा है, यह सब आपको ही सोचना होगा, क्योंकि व्यक्ति शायद सही कारण नहीं बता पाएँ. अगर आप व्यक्ति के साथ बैठ कर बातें कर रहें हैं, तो आपको ही सोचना होगा कि व्यक्ति कौनसी बातों में ज्यादा रुची लेंगे, या कौन सी एल्बम देखना चाहेंगे. इस देखभाल के दौर में व्यक्ति के बारे में आपकी जानकारी बहुत काम आयेगी. व्यक्ति के चेहरे के भाव की पहचान भी काम आयेगी.

इस स्थिति में पहुंचे डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति को एक घर से दूसरे घर के जाना भी आसान काम नहीं (खासकर यदि दूसरे शहर या देश में ले जाना हो), और अगर आप भाई-बहनों या रिश्तेदारों के साथ व्यक्ति की देखभाल का काम बाँट रहे हैं, तो प्लैन करते वक्त इस बात का ख्याल रखें.

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लंबे अर्से तक बिस्तर पर रहने की वजह से समस्याएं

late stage dementia patients are bedridden and fully dependent on caregiversघर पर व्यक्ति का डॉक्टर से चेक करवाते रहना जरूरी है, ताकि कोई समस्या हो को जल्दी पकड़ी जाए.

ज्यादातर व्यक्ति इस स्थिति में यह नहीं बता पाते कि उनकी तबीयत खराब है या उन्हें कहीं दर्द है. घर पर ही डॉक्टर से नियमित चेक अप कराने से कोई समस्या हो तो जल्दी पकड़ में आ सकती है.

एक आम समस्या है व्यक्ति को बेड सोर होना (bed sore, pressure sore, decubiti, शैय्या-व्रण). इनसे बचने की खास कोशिश करनी होती है. एक तरकीब है बेड पर सही तरह की मैट्रेस (गद्दे) का इस्तेमाल (जैसे कि एयर मैट्रेस). बार बार व्यक्ति की करवट बदलें, चादर पर सिलवट न रहने दें. रोज त्वचा को गौर से देखें, ताकि शुरू में ही बेडसोर को पकड़ पाएँ. बेडसोर से बचाव, और उसकी दवाई/ पट्टी के लिए डॉक्टर से सलाह करें. और बेडसोर होने का शक हो तो तुरंत डॉक्टर से सलाह करके, उचित सफाई/ ड्रेसिंग वगैरह शुरू कर दें

अन्य आम समस्याएँ हैं संक्रमण (इन्फेक्शन, infection), मोच (स्प्रेन, sprains), दस्त लगना (loose motions), कब्ज (constipation), इत्यादि. हड्डियां कमज़ोर हो जाती हैं, त्वचा नाज़ुक हो जाती है. व्यक्ति अपने आप को थोडा भी खुजाएँ तो ज़ख्म पड़ सकते हैं. छाती में इन्फेक्शन भी जल्दी जल्दी होता है. एक ही तरह से लंबे अर्से तक लेटे रहने के कारण, कभी कभी शरीर में जकड़न हो जाती है, और व्यक्ति के अंग सीधे नहीं हो पाते और उनकी लचक कम हो जाती है. वे शायद हाथ की उंगलियों को खोल न पाएँ, या टांग सीढ़ी न कर पाएँ. इस तरह की समस्याओं के प्रति आपको सतर्क रहना होगा और कोई समस्या हो तो डॉक्टर को बुलाना होगा, ताकि समस्या भी सुलझे और देखभाल के लिए अन्य टिप्स भी ले पाएँ.

मुंह और दाँत को साफ रखना (Oral hygiene, mouth care) खास तौर से जरूरी है क्योंकि डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति कई बार ठीक से निगल नहीं पाते और उनका थूक और खाने के टुकड़े खाने की नाली के बजाय सांस की नाली में जा सकते हैं और फेफड़ों में पहुंच सकते हैं (aspirate food and liquid into their lungs). इसके कारण संक्रमण हो सकता है, और मुंह और दाँत साफ न रखें तो इसकी संभावना बढ़ जाती है. यह aspiration pneumonia अंतिम अवस्था के व्यक्तियों में मरने का एक आम कारण है.

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अन्य बीमारियों के बारे में सतर्क रहें

अग्रिम अवस्था में देखी गयी कुछ मुख्य समस्याएं: गिरना, त्वचा में घाव, कोनट्रैकचर, फेफड़ों में पानी या खाने के कण जाने से संक्रमण, निर्जलीकरण, कुपोषण, कब्ज, मूत्र पथ के संक्रमण, अन्य आम संक्रमण, दर्द, दृष्टि में समस्याएं, सुनने की समस्याएं, अवसाद, प्रलाप, दबाव अल्सर, नींद की समस्याओं, आदि. साथ-साथ कमजोरी और बड़ी उम्र के कारण अन्य स्वास्थ्य समस्याएँ भी आम होती हैं, जैसे कि मांसपेशियों का बहुत कम होना, हड्डियाँ कमज़ोर होना, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, गुर्दों की समस्याएं, और कैंसर, और इन सब से अग्रिम स्टेज की देखभाल बहुत ही चुनौतीपूर्ण हो जाती है .

व्यक्तियों को डिमेंशिया की वजह से तो समस्याएँ हैं ही, पर अन्य बीमारियाँ भी पहले से हो सकती हैं. समय के साथ भी दूसरे बीमारियां भी हो सकती हैं.

डिमेंशिया को अब “life-limiting” माना जाता है (जीवन-काल को सीमित करने वाला रोग). इसका मतलब है, कि अब यह माना जाता है कि डिमेंशिया के कारण व्यक्ति की मौत सामान्य व्यक्ति की मौत से जल्दी होने की संभावना है. अन्य बीमारियां अधिक तेजी से बढ़ सकती हैं–इसकी एक वजह यह है कि व्यक्ति समय पर अपनी तकलीफ बता नहीं पाते, और इलाज ठीक समय पर नहीं हो पाता. और डिमेंशिया की कारण व्यक्ति की जो काबिलीयत कम हो रही हैं, और तकलीफें हो रही हैं (जैसे कि खाना ठीक से निगलने की तकलीफ), उनसे उनको खतरा भी ज्यादा होता है और जिंदगी भी छोटी हो सकती है.

ऐसा डॉक्टर ढूंढ़ें जो व्यक्ति के की हालत और मर्ज समझें भी और नियमित रूप से घर पर चेक अप भी कर पाएँ. डॉक्टर सलाह दे पायेंगे कि आपको कौन कौन से टेस्ट कराते रहने चाहिये, जो वर्तमान बीमारियों के लिए हों, और उम्र के साथ होने वाले संभावित बीमारियों के लिए भी. उदाहरण के तौर पर ऐसे चेक अप में डॉक्टर कई चीज़ों पर नज़र रखेंगे, जैसे कि डॉयबटीज़ (शूगर), उच्च रक्तचाप, गुर्दे की प्रॉब्लम, हृदय रोग. दृष्टि के बारे में भी ध्यान दें , क्योंकि व्यक्ति का देखना बंद हो जाए (जैसे कि कैटरैक्ट या ग्लौकोमा के कारण) तो व्यक्ति को बहुत ही दिक्कत होगी–पर दृष्टि कम हो रही है, यह शायद व्यक्ति आपको बता न पाएँ. डॉक्टर से सलाह कर लें कि इस स्थिति में कब कब कौन से टेस्ट कराने का फायदा है, और कौन से कराने लायक नहीं हैं.

व्यक्ति की सेहत के प्रति सतर्क रहें. व्यक्ति के चेहरे के भाव पर ध्यान रखें, और यह भी देखें कि वे किस तरफ हिलाने से बदन जकड़ते हैं, वगैरह, ताकि अगर व्यक्ति को तकलीफ या दर्द है, तो आपको अंदाज़ा पड़ जाए.यदि किसी दिन व्यक्ति रोज से ज्यादा सुस्त लगें, तो विशेषकर ध्यान से देखें, कि क्या समस्या है. शरीर ज्यादा गर्म लगे, तो बगल में रख कर थेर्मोमीटर से देखें कि बुखार तो नहीं? पेशाब का रंग देखें, गहरा तो नहीं, बू तो नहीं आ रही है? कब्ज तो नहीं?

आम तौर पर तकलीफ होने पर लोग क्लिनिक या अस्पताल जाते हैं पर अंतिम अवस्था में डिमेंशिया वाले व्यक्ति को क्लिनिक या अस्पताल ले जाना बहुत मुश्किल है. ऐसे ट्रिप के लिए बहुत इंतजाम करना पड़ता है और ट्रिप व्यक्ति के लिए बहुत थकाने वाला और डराने वाला हो जाता है. खुद को अंजान जगह में पाना व्यक्ति को भयभीत कर सकता है, और घर आने के बाद भी व्यक्ति को सामान्य होने में काफी टाइम लग सकता है. अस्पताल जाना या वहाँ रहना सचमुच जरूरी है या नहीं, इसके फायदे और नुकसान तोलें और डॉक्टर से भी पूछें, फिर सोचें कि अस्पताल ले जाएँ या नहीं.

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परिवार वालों के साथ व्यक्ति के जीवन के अंतिम निर्णय लेना

डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल में जरूरी निर्णय अन्य देखभाल में जरूरी निर्णय से अलग होते हैं. आम तौर पर बीमार भी हों तो लोग कह पाते हैं कि उन्हें क्या चाहिए, उन्हें इलाज कराना है या नहीं, कैसे इलाज कराना है, वगैरह, पर डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति के लिए आपको निर्णय लेने पड़ते हैं क्योंकि वे सोचने समझने और तय करने ही हालत में नहीं है. अस्पताल में लंबे अर्से रहना, स्ट्रोंग दवाई लेना, एंटीबायोटिक दिलवाएं या नहीं, खाने की नली डालें या नहीं, यह सब निर्णय परिवार वालों को लेने पड़ते हैं. बहुत ज्यादा स्ट्रोंग इलाज करने से डिमेंशिया के व्यक्ति को फायदा होगा या नहीं, यह भी सोचना होता है.

कुछ क्षेत्र जिनमें शायद निर्णय लेने पड़ें:

  • क्या एंटीबायोटिक दवाओं या यहां तक कि सर्जरी की तरह के आक्रामक उपचार करें, या कम आक्रामक उपचार करें और व्यक्ति के आराम और शान्ति पर ज्यादा ध्यान दें?
  • व्यक्ति खाना बहुत कम कर दें तो क्या भोजन नली (ट्यूब फीडिंग) का उपयोग करें?
  • गंभीर स्थितियों के लिए क्या व्यक्ति को अस्पताल में भर्ती करें या घर पर ही इलाज करें?

कुछ लोग सोचते हैं कि बीमार हैं तो दवाई तो करनी ही है, पर यह नहीं जानते कि ऐसा भी हो सकता है कि व्यक्ति को दवाई से फायदा नहीं हो पाए. जो दवाई कम उम्र के व्यक्तियों में या सामान्य वृद्धों में कारगर हैं, वह डिमेंशिया से ग्रस्त इस अवस्था में व्यक्ति पर हमेशा काम नहीं करतीं. इस पर अनेक अध्ययन हुए हैं, और निष्कर्ष यह है कि डिमेंशिया की अंतिम अवस्था में ज्यादा स्ट्रोंग, आक्रामक प्रकार की दवाइयाँ और इलाज से व्यक्ति का जीवन लंबा नहीं हो पाता, न ही उनको ज्यादा आराम पहुंचता है. यह विषय पेचीदा है, और गौर करने लायक.

परिवार वालों के अपने अपने नजरिए हो सकते हैं, और इस हालत में उनमें मतभेद और संघर्ष अकसर हो जाते हैं. कुछ लोग सोचते हैं कि जो कुछ भी कर सकते हैं व्यक्ति को जीवित रखने के लिए, वह करना चाहिए और ऐसा नहीं करना व्यक्ति को मारने के बराबर है. अन्य लोग सोचते हैं कि इतने आक्रामक इलाज करना ठीक नहीं क्योंकि इससे हम तो व्यक्ति को उसके अंत समय पर तंग कर रहे हैं. इस हालत में व्यक्ति को शान्ति से घर पर रखना चाहिए ताकि व्यक्ति परिवार के बीच, सुखी से अंत बिताए. एक और समस्या यह है कि एक बार अस्पताल ले गए तो टेस्ट पर टेस्ट, दवाई पर दवाई होती रहती है, और इलाज बंद कराना मुश्किल हो जाता है, और इस दौरान व्यक्ति अंजान जगह में सिर्फ नर्स और डॉक्टर के चेहरे देख कर और घबरा जाते हैं और गुमसुम हो जाते हैं. कुछ लोग इसे ज्यादती समझते हैं. डॉक्टर कई बार परिवार वालों को इलाज के फायदे तो बताते हैं पर नुकसान नहीं, और इलाज नहीं रोकने देते.

चूंकि अंतिम समय पर ऐसे कई मौके आ सकते हैं जिनमें कठिन निर्णय लेने पड़ें, बेहतर यही है कि आप जो भी करें, परिवार वालों के साथ, सबकी सहमति से करें, वरना बाद में आपस में संघर्ष हो सकते हैं, एक दूसरे पर आरोप लगाए जा सकते हैं, और मनमुटाव हो सकता है.

जीवन के अंतिम चरण पर क्या उपचार करें, इस से सम्बंधित निर्णय लेने के लिए प्रशामक/ उपशामक देखभाल (palliative care) के बारे में जानें. प्रशामक देखभाल ऐसी स्वास्थ्य सेवा है जो कई चिकित्सा क्षेत्रों को जोड़ती है (multidisciplinary) और व्यक्तियों की पीड़ा को रोकने पर केंद्रित है। इसमें जीवन की गुणवत्ता पर जोर है. यह एक अपेक्षाकृत नया क्षेत्र है, और आम तौर पर कैंसर और HIV रोगियों के लिए इस्तेमाल होता है। अंतिम चरण वाले व्यक्ति के आराम के लिए और उन्हें दर्द से मुक्त रखने के लिए उपशामक देखभाल विशेषज्ञों से बात करें और उपलब्ध विकल्प के बारे में पूछें. ऐसे विशेषज्ञ ढूंढ़ें जिन्हें डिमेंशिया देखभाल का भी अनुभव हो. फिर परिवार वाले डेटा और चर्चा के आधार पर मिल कर सोचें कि क्या करना चाहते हैं, ताकि बाद में बुरा महसूस न हो

नोट: कई देशों में ऐसे कानून हैं जिनमें व्यक्ति या परिवार वाले “पुनर्जीवित न करें” (do not resuscitate) निर्देश दे सकते हैं, और डॉक्टर को उसका पालन करना होता है. भारत में अभी ऐसा कोई क़ानून नहीं है. अभी यहाँ पर डॉक्टर अंतिम क्षण तक इलाज करने की कोशिश करते रहते हैं. परिवार वाले अगर कहें भी कि अब तो अंत पास है, अब व्यक्ति को शान्ति से अंतिम क्षण बिताने दें, तब भी कई आक्रामक उपचार करते रहते हैं. यदि आप को इस तरह का आक्रामक इलाज पसंद नहीं तो लीगल सलाह लें और पता चलायें कि आप क्या कर सकते हैं. अलग अलग अस्पताल की भी ऐसी स्थिति के लिए अलग अलग पालिसी होती है. जब व्यक्ति का कहीं दाखिला कराएं, तो इस पहलू को भी अस्पताल के चुनाव के वक्त ध्यान में रखें.

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व्यक्ति से भावनात्मक सम्पर्क बनाना

देखभाल का एक पहलू है व्यक्ति के साथ भावनात्मक रिश्ता बनाए रख पान, जिससे यह अंतिम अवस्था व्यक्ति और परिवार, दोनों के लिए कुछ हद तक आसान हो.

जब व्यक्ति इतने लाचार हो जाएँ, और बात भी नहीं करें, तो आप पाएंगे कि अब स्थिति पहले से बहुत फर्क है. पहले की उत्तेजना, गुस्सा, और अन्य बदले व्यवहार अब नहीं नज़र आते, और लाचार व्यक्ति की ओर स्नेह और सहानुभूति महसूस करना पहले से आसान हो जाता है. बात बात पर क्या होगा, मूड कैसे बदलेगा, यह तनाव चला जाता है. पर अब यह भी साफ नज़र आने लगता है कि व्यक्ति का अंत पास आ रहा है, और इसको स्वीकारना कठिन होता है. कुछ परिवार वाले स्थिति से इतना घबराते हैं कि व्यक्ति के कमरे में घुस भी नहीं पाते.

व्यक्ति बात न करें, तब भी आप स्नेहपूर्ण सम्बन्ध बनाए रख सकते हैं. व्यक्ति आपकी बातें सुन सकते हैं, और उनका आनंद भी उठा सकते हैं, चाहे उन्हें बात ठीक से समझ आये या नहीं. आप उनका हाथ पकड़ सकते हैं और अपना स्नेह दिखा सकते हैं. उनके साथ कुछ देर बैठें तो आपको और उनको दोनों को अच्छा लग सकता है और शांति मिल सकती है.

अंतिम अवस्था में भी डिमेंशिया वाले व्यक्ति कई तरह के आनंद उठा सकते हैं. कुछ व्यक्ति संगीत या भजन पसंद कर सकते हैं, या जिस दिन ज्यादा सक्रिय हों, उस दिन पुरानी एल्बम देख सकते हैं या आपसे पुराने किस्से सुन सकते हैं. पलंग पर लेटे लेटे उनकी नज़र जहाँ जा सकती है, आप वहाँ उनकी पसंद के फोटो/ देवी-देवताओं की तस्वीरें लगा सकते हैं. उन्हें अगरबत्ती पसंद हो, तो जला सकते हैं.

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शोक और काउंसेलिंग

Caregivers need support when grieving

अंतिम अवस्था के डिमेंशिया वाले व्यक्ति की हालत देख कर यह स्पष्ट होता है कि अब अंत आ रहा है, और मौत की घड़ी करीब आ रही है.

किसी प्रियजन को मरते देखना आसान नहीं है. न सिर्फ व्यक्ति के खोने का दुःख होता है, बल्कि आपके और व्यक्ति के आपस की यादें भी उभरने लगती हैं और लगता है कि व्यक्ति नहीं रहेंगे को आपके जीवन का वह अंश भी नहीं रहेगा जो साथ बिताया था. व्यक्ति का अंत पास आते देखते एक लाचारी सी महसूस होती है कि आप उसे रोक नहीं सकते. आने वाली मौत का सामना करने के लिए और व्यक्ति के साथ बचे हुए पलों को सुखद रखने से कुछ आराम मिलता है. काउंसेलिंग से भी कुछ शक्ति शायद मिल पाए, और स्थिति का सामना करने की हिम्मत बढ़े.

अगर आप लंबे अर्से से देखभाल करते आ रहे हैं तो आपने इस रोल के लिए अपनी ज़िन्दगी में कई बदलाव किये होंगे, करियर में, दोस्तों से मिले रहने में, अपनी अन्य चीज़ों में. व्यक्ति के गुजर जाने के बाद देखभाल करने वालों की जिंदगी में एक खालीपन, एक रिक्तता आ जाती है. इतने अर्से उनका सारा दिन, सारा ध्यान व्यक्ति पर लगा था, और अब दिन खाली खाली लगता है. अब देखभाल की जरूरत नहीं रही है. अब आप वापस किस जिंदगी में जाएँ, किससे बात करें, क्या बात करें, यह समझना शायद आपके लिए मुश्किल हो सकता है. एक थकान सी हो सकती है. इस सब से उभरने के लिए काउंसेलिंग से शायद मदद मिले. अपने साथ जल्दी न करें, खुद को नई स्थिति से समन्वय करने के लिए समय दें.

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होम नर्सिंग विषय सूची

होम नर्सिंग करने के लिए कौशल भी चाहिए और घर में जरूरी उपकरण और एक ठीक से स्थापित पर्यावरण भी. एक प्रारंभिक परिचय के लिए देखें भारत से यह वीडियो:


(यदि ऊपर का वीडियो प्लेयर लोड न हो, तो “Home Care of Bedridden Patient” वीडियो यूट्यूब पर देखें Opens in new window). यह वीडियो डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति के लिए तो नहीं है, पर इसमें एक मध्यवर्गीय भारतीय परिवार में देखभाल कैसे करें, यह समझाया गया है (वीडियो का पहला मिनट छोड़ दें, वह खाली है).

होम नर्सिंग कैसे करें, इसके लिए अपने डॉक्टर से सलाह करें और किसी होम केयर सर्विस से भी बात करें. यह देखें कि नर्स अपने काम कैसे करती हैं. फीजियोथेरेपिस्ट से सलाह करके काम करने के सही और सुरक्षित तरीके सीखें, जिनसे न तो व्यक्ति को चोर लगे और न आप को.

वीडियो और ऑनलाइन मैनुअल से भी जानकारी मिल सकती है, पर ध्यान रहे कि आप जिस भी तकनीक का उपयोग करें वह चिकित्सकीय तौर से सही और उपयुक्त है–इस के लिए आप डॉक्टर या नर्स से सलाह कर सकते हैं. अधिकाँश उपलब्ध वीडियो और अन्य सामग्री बिस्तर ग्रस्त व्यक्तियों की संस्थाओं में देखभाल के लिए तैयार करी गयी है, और खास डिमेंशिया वाले लोगों के लिए नहीं है. वे यह मान कर बनायी गयी है कि होम नर्सिंग करने वाले के पास उचित सुविधाएं और उपकरण उपलब्ध हैं. लेकिन इस के बावजूद, आपको इनसे क्या करने की जरूरत है और कैसे करें, इसका अच्छा अंदाज़ा मिल एकता है. आप इस जानकारी को अपनी स्थिति के अनुसार ढालें और इस्तेमाल करें. डॉक्टरों / नर्सों से सुनिश्चित करें कि आप उन्हें सही ढंग से समझ पाएँ हैं.

इस सेक्शन में होम नर्सिंग के महत्त्वपूर्ण विषयों की एक सूची है. इसे एक प्रारंभिक सूची समझें, और जरूरत अनुसार अन्य विषय इस सूची में जोड़ने.

  • बिस्तर पर पड़े व्यक्ति की बेसिक देखभाल: इसमें कई कार्य हैं, जैसे कि बिस्तर पर व्यक्ति को पलट पान, उनके कपड़े बदलना, बिस्तर पर ही नहलाना और बाल धोना, बिस्तर से कुर्सी पर और वापस उठाना बिठाना, खाना और पानी देना, इत्यादि. बिस्तर पर व्यक्ति के होते हुए ही बिस्तर की चादर बदलना. व्यक्ति को हिलाते हुए खयाल रखना कि व्यक्ति को चोट न पहुंचे, और आपको भी चोट न पहुंचे. बिस्तर के इर्द गिर्द सामान और उपकरण इस तरह नियोजित करें कि गन्दा होने पर भी कपड़े बदलने और व्यक्ति को साफ करने की क्रिया आसानी से हो पाए. ये सब होम नर्सिंग के आम कार्य हैं. कोई भी नर्स आपको दिखा सकती है कि ये कैसे करें. कई ऑनलाइन वीडियो भी उपलब्ध हैं, जिनसे आप प्रारंभिक सीख पाने के बाद अपनी समझ की पुष्टि किसी डॉक्टर या नर्स से कर सकते हैं. खोजने के लिए कुछ उपयोगी वाक्यांश: “making the bed/ turning the patient/ lifting and transferring the patient”, “moving a bedridden patient”, “making an occupied bed”, “lifting techniques”, “transfer methods”, “bed bath”, इत्यादि.
  • डायपर बदलने और मूलाधार (गुप्तांग, निजी भागों) की साफ़-सफाई: यह बिस्तर वाले व्यक्ति की देखभाल का एक बहुत जरूरी भाग है. साफ़-सफाई के लिए किन उपकरण और उत्पादों का उपयोग करें, इस पर जानकारी प्राप्त करें. ठीक से सफाई करने के तरीके सीखें. निजी भागों की स्वच्छता बनाए रखने के लिए ऑनलाइन सामग्री भी मिलेगी. खोजने के लिए कुछ उपयोगी वाक्यांश: “diaper change” और “perineal care”.
  • मौखिक स्वच्छता (oral hygiene): जैसे कि पृष्ठ पर ऊपर जिक्र है, मुंह और दांत की सफाई बहुत जरूरी है. डिमेंशिया वाले व्यक्ति शायद मुंह ठीक से न खोलें, या कुल्ला न कर पाएँ. ऐसे में सफाई कैसे रखें, इसके लिए अपने डेंटिस्ट से उपयुक्त तरीकों और उत्पादों के बारे में पता करें.
  • बेड सोर होना (bed sore, pressure sore, decubiti, शैय्या-व्रण)): जैसे कि पृष्ठ पर ऊपर जिक्र है, यह एक आम और गंभीर समस्या है. बेड सोर के बारे में जानकारी प्राप्त करें. बेड सोर न बन पाएँ, इसके तरीके सीखें. उन्हें पहचानने के तरीके सीखें. अपनी समर्थन प्रणाली (घर पर देखभाल सेवाओं, डॉक्टरों, आदि) बनाते समय यह जरूर देखें कि बेड सोर हो तो आपके पास सहायता पाने के विकल्प हों.
  • पोषण, हाइड्रेशन, व्यायाम, और कब्ज: व्यक्ति के भोजन और तरल पदार्थ का सेवन (food and liquid intake) पर नज़र रखें. कम होने पर सोचें कि सुधार कैसे कर सकते हैं. अलग तरह के खाने दें, देखें व्यक्ति क्या पसंद करते हैं. खाना पौष्टिक होना चाहिए. यदि व्यक्ति तरल पदार्थ और पानि कम ले रहे हों तो मौखिक पुनर्जलीकरण समाधान (ओआरएस, rehydration solutions, ORS) दें ताकि हाइड्रेशन बेहतर हो. डॉक्टर की सलाह लें. व्यक्ति के व्यायाम का भी ख़याल रखें. अक्सर व्यक्ति हिलते डुलते नहीं और कहने पर भी हरकत नहीं करते. फिजियोथैरेपिस्ट या डॉक्टर की सलाह के हिसाब से व्यक्ति से range-of-motion या अन्य एक्सेरसाईज कराइए. यदि व्यक्ति सहयोग न दें तो passive range-of-motion एक्सेरसाईज करवाएं. इसमें आप व्यक्ति के हाथ पैर धीरे से और सुरक्षित तरह से खुद हिलाते हैं ताकि उनका कोई अंग जकडे नहीं. एक अन्य समस्या है कब्ज का होना, इसलिए खाने में पर्याप्त रेशा (fiber) हो, यह ध्यान रखें, और डॉक्टर से पूछ कर जरूरी हो तो नुस्खे के हिसाब से सुरक्षित हल्का जुलाब (safe mild laxative) भी दें. कब्ज बहुत तकलीफ पैदा कर सकता है इसलिए कब्ज बढ़ने न दें: सतर्क रहें.
  • खाना खिलाना और एस्पिरेशन निमोनिया (aspiration pneumonia): अग्रिम अवस्था डिमेंशिया व्यक्तियों में एक आम समस्या है.व्यक्तियों को खाना देने के लिए उठा कर बिठाना होता है. व्यक्ति खाना ठीक निगल नहीं पाते, इसलिए उनसे खाना निगलवाने के लिए तरीके सीखने और आजमाने होते हैं. खाने के स्वाद और तापमान को अडजस्ट करें ताकि व्यक्ति की पसंद के अनुरूप हो. चबाने में दिक्कत होती है–अधिकाँश केस में खाना नरम ही देना होता है, या तरल करके देना होता है (very soft or in liquid form). अक्सर इस अवस्था में व्यक्ति खाना ठीक से नहीं निगलते इसलिए उनके फेफड़ों में खाने के कण और तरल पदार्थ की बूँदें पहुंच जाती हैं, जिनसे संक्रमण हो जाता है (एस्पिरेशन निमोनिया, aspiration pneumonia). सांस की नाली में भी खाना अटक जाता है और दम घुटने का खतरा रहता है. दमा घुटने पर क्या करना चाहिए, इसके तकनीक फर्स्ट एड ट्रेनिंग में सिखाये जाते हैं, और आप डॉक्टर से भी पूछ सकते हैं. एस्पिरेशन निमोनिया डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्तियों की मौत का एक आम कारण है; फेफड़ों में संक्रमण के प्रति सतर्क रहें और तुरंत डॉक्टर को बुलाएं. ये सोच के रखें कि आप व्यक्ति के लिए आक्रामक उपचार चाहते हैं या नहीं. जब खाने में दिक्कत होने लगे, तो खाने की नली (feeding tube) से सम्बंधित निर्णय की भी जरूरत पड़ सकती है. परिवार वालों के साथ मिल कर सोच लें कि ऐसी स्थिति में आप क्या करेंगे.
  • निरंतर चिकित्सीय सतर्कता: चूंकि व्यक्ति अपनी समस्याएँ नहीं बता सकते, देखभाल करने वालों को हमेशा सतर्क रहना होता है, कि व्यक्ति को कुछ दर्द, संक्रमण, चोट, बुखार इत्यादि तो नहीं. नियमित टेस्ट और चेक अप कराने होते हैं. बिस्तर पर सीमित व्यक्ति को अस्पताल ले जाने बहुत मुश्किल है, इसलिए कोई प्रॉब्लम जितनी जल्दी पकड़ में आये उतना अच्छा होगा, ताकि अस्पताल ले जाएँ या नहीं, यह सोचने की नौबत न आये और समय पर आसानी से उपचार हो सके. फर्स्ट एड (प्राथमिक चिकित्सा, first-aid) की जानकारी जरूरी है.

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इन्हें भी देखें….

हिंदी पृष्ठ, इसी साईट से:

विभिन्न अवस्थाओं में डिमेंशिया देखभाल

इस विषय पर हमारे अन्य वेबसाइट से सामग्री: ये सब अंग्रेज़ी पृष्ठ भारत में देखभाल के संदर्भ में लिखे गए हैं.

डिमेंशिया विशेषज्ञ डॉ. सौम्य हेगड़े के साथ अग्रिम अवस्था देखभाल पर एक 6 भाग वाला इंटरव्यू

डॉ. सौम्या हेगड़े (Dr. Soumya Hegde) एक बैंगलोर में स्थित कंसलटेंट जेरिएत्रिक साइकेट्रिस्ट (Consultant Geriatric Psychiatrist, वृद्धों के लिए मनोचिकित्सक) हैं. वे कई सालों से डिमेंशिया देखभाल के क्षेत्र में काम कर रही हैं, और उन्हें डिमेंशिया की हर अवस्था में परिवार वालों को सपोर्ट करने का अनुभव हैं. पेश है सरल अंग्रेज़ी में एक 6 भाग के इंटरव्यू सीरीज जिस में उन्होंने अग्रिम अवस्था में जरूरी देखभाल के अनेक महत्वपूर्ण पहलूओं पर उपयोगी जानकारी और प्रैक्टिकल सुझाव दिए हैं. देखें:

देखभाल कर्ताओं के कुछ उपयोगी इंटरव्यू:

  • विजया एक अकाउंटेंट हैं, पर उन्होंने पिछले कई सालों से अपन करियर अपने पिता की देखभाल के लिए त्याग दिया है. इस इंटरव्यू में विजया अपने पिता के अंतिम कुछ महीनों के बारे में बात करती हैं, जब उन्होंने और उनकी बहन ने पूरी तरह से निर्भर पिता की घर पर देखभाल करी. इंटरव्यू में घर पर देखभाल कैसे करी, दिनचर्या क्या होता था, दिन भर के काम क्या क्या थे, साथ बिताए हुए कुछ कोमल पल कैसे बीते, विजया ये सब बांटती हैं. बार बार बीमार पड़ने की वजह से पिता के अस्पताल के चक्कर, वहाँ पर पेश आयी दिक्कतें, दुविधाएं, इत्यादि भी इंटरव्यू में शामिल हैं. इंटरव्यू पढ़ें: Late-stage care, heartbreaks and tender moments, hospitals, dilemmas, decisions: a daughter narrates Opens in new window.
  • नीना एक चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं, जिन्होंने अपनी सास की देखभाल के लिए अपना करियर स्थगित कर दिया है. नीना की सास को अनेक बीमारियाँ हैं, जिनमें डिमेंशिया भी एक है. इस इंटरव्यू में नीना बताती हैं कि उनकी सास कैसे बिस्तर पर पड़ीं, नीना ने कैसे इसके लिए घर में सारा इंतजाम करा, देखभाल में किस तरह की चुनौतियों का रोज रोज सामना करना होता है, घर पर नर्स से कैसे काम कराते हैं, वगैरह. नीना की सास के कई ज़ख्म ठीक ही नहीं हो पा रहे हैं, और नीना कहती हैं, “माँ को तडपता देख कर मैं बहुत परेशान हो जाती हूँ” इंटरव्यू पढ़ें: When I see Ma struggle, I get very disturbed: a daughter-in-law describes the caregiving for a bedridden mother-in-law Opens in new window.

एक भारत में स्थित देखभाल कर्ता बेटी के अनेक ब्लॉग एंट्री (अंग्रेज़ी), जिनमें बिस्तर पर पड़ी माँ की देखभाल का भी वर्णन है:

इस पृष्ठ का नवीनतम अँग्रेज़ी संस्करण यहाँ उपलब्ध है: Late-stage dementia careOpens in new window . अंग्रेज़ी पृष्ठ पर आपको विषय पर अधिक सामयिक जानकारी मिल सकती है. कई उपयोगी अँग्रेज़ी लेखों, संस्थाओं और फ़ोरम इत्यादि के लिंक भी हो सकते हैं. कुछ खास उन्नत और प्रासंगिक विषयों पर विस्तृत चर्चा भी हो सकती है. अन्य विडियो, लेखों और ब्लॉग के लिंक, और उपयोगी पुस्तकों के नाम भी हो सकते हैं.

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