देखभाल करने वाले का रोल (Understand the dementia caregiver’s role)

डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल का कार्यभार संभालना है

देखभाल करने वाले क्या कर सकते हैं:  रोल की तैयारी करने के लिए वे समझें कि काम क्या करना होगा. देखभाल का काम कर पाएँ, इसके लिए जिंदगी के दूसरे पहलूओं में के क्या बदलना या एडजस्ट करना होगा, यह भी सोचें.

डिमेंशिया (मनोभ्रंश) से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल का काम अकसर परिवार वाले करते हैं, पर उन्हें अंदाजा नहीं होता कि इस रोल (role, भूमिका) के लिए कैसे तैयार होना होगा, और आगे क्या क्या हो सकता है.

इसके अतिरिक्त, इस वेबसाइट के अन्य पृष्ठ पर देखभाल कैसे प्लान करें, क्या सीखें, किस तरह की चुनौतोयों के लिए तैयार रहें, और अन्य कई पहलूओं पर विस्तृत चर्चा हैं

देखभाल करने की स्थिति अलग अलग व्यक्ति के लिए फ़र्क होती हैं, और देखभाल करने वालों का रोले भी अलग अलग होता है

कई बार चर्चा में “देखभाल कर्ता” का इस्तेमाल ऐसे किया जाता है जैसे कि सब देखभाल करने वालों को एक जैसे स्थिति का सामना करना होता है, और एक ही किस्म की सलाह की जरूरत है. पर सच तो यह है कि जैसे कि कोई दो रोगी एक जैसे नहीं होते, वैसे ही देखभाल की स्थिति और देखभाल कर्ता के रोल भी बहुत किस्म के होते हैं. उदाहरण: किसी को सारा काम और सारी जिम्मेदारी संभालनी होती है, किसी अन्य देखभाल करने वाले को शायद सिर्फ दूसरे शहर से देखभाल पर निगरानी रखनी होती है, या कभी कभी सहायता करनी होती है.

“देखभाल कर्ता” कोई स्टैंडर्ड नाम नहीं है, और देखभाल करने का अनुभव भी कोई स्टैंडर्ड नहीं है. देखभाल का रोल भी सब देखभाल कर्ताओं के लिए सामान नहीं है. अनेक प्रकार की देखभाल हो सकती है, इस बात को हम ध्यान में रखें तो हम देखभाल सम्बंधी जानकारी और सलाह को सही संदर्भ में देख सकेंगे और हमारे लिए इस सलाह का कौन सा भाग उचित है और कौन सा अप्रासंगिक और बेकार है, हम यह पहचान पायेंगे.

एक बात जो सब देखभाल कर्ताओं के बीच सामान है वह यह है कि कोई व्यक्ति है जो डिमेंशिया से ग्रस्त है, और उस व्यक्ति के सम्बन्ध में देखभाल कर्ता को कुछ काम करने होते हैं या निर्णय लेने होते हैं, जिनसे व्यक्ति की सेहत और खुशहाली पर असर पड़ता है. देखभाल करने वाले यदि डिमेंशिया और देखभाल के बारे में ज्यादा जानते हैं तो वे अपने काम और निर्णय में अधिक कारगर होंगे.

देखभाल कर्ताओं के बीच के अंतर कई तरह के हो सकते हैं. देखभाल करने वाला व्यक्ति के साथ रहता है, या दूर, और साथ रहता भी है तो उसे खुद कितना काम करना होता है और कितना नहीं, यह भी फ़र्क हो सकता है. एक ही घर में रहते हुए भी, कुछ परिवार के सदस्यों का पूरा दिन रात देखभाल के चारों ओर घूमता है, कुछ सिर्फ बहुत जरूरत पड़ने पर या एमरजेंसी में हाथ बांटते हैं. कुछ घरों में नौकर और सहायक होते हैं, और देखभाल कर्ता जिम्मेदारी तो संभालते हैं पर काम औरों से करवा पाते हैं, एक मेनेजर की तरफ. कुछ अन्य घरों में देखभाल कर्ता सारा काम या काम का अधिकाँश भाग खुद ही करते हैं. परिवार में पैसे की तंगी है या नहीं, इसमें भी अंतर होता है. देखभाल करन वाले की उम्र भी फ़र्क होती हैं–कुछ युवा हो सकते हैं, कुछ अधेड़ उम्र के, कुछ बुज़ुर्ग. देखभाल करने वाले की सेहत और शारीरिक ताकत में फ़र्क होते हैं, जिससे उन्हें काम कितना आसान लगता है, इसमें फ़र्क होता है. कुछ स्थिति में मर्द को डिमेंशिया है पर देखभाल का काम शारीरिक रूप से कमजोर औरत पर होता है. कुछ में औरत बीमार है, और मर्द देखभाल करने वाले को उसके काम करने में संकोच हो सकता है. ऐसी अनेक भिन्न भिन्न देखभाल की स्थितियाँ हो सकती हैं.

किस रोग के कारण डिमेंशिया के लक्षण है, इससे भी देखभाल में फ़र्क पड़ सकता है, क्योंकि अलग अलग रोगों के प्रकट लक्षण फ़र्क हो सकते हैं और रोग के बढ़ने की गति भी. उदाहरण के तौर पर, फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया (Frontotemporal Dementia, FTD) में व्यक्ति अनुचित या अश्लील हरकतें कर सकते हैं. या डिमेंशिया अगर चालीस या पचास साल की उम्र में शुरू हो तो देखभाल की चुनौतियाँ फ़र्क हैं. या अगर व्यक्ति का डिमेंशिया मंद किस्म का, धीरे धीरे बढ़ने वाला हो, तो देखभाल की प्लानिंग फ़र्क होगी.

भिन्न भिन्न तरह के देखभाल करने वालों के लिए उपयुक्त देखभाल-संबंधी सलाह भी फ़र्क होगी. उपलब्ध सलाह से उचित तरीके और टिप्स छांटने होंगे. जैसे कि, साथ रहकर देखभाल करने वाले को दैनिक कार्यों में कैसे सहायता करनी होगी, यह अच्छी तरह से समझना होगा, पर दूर से मदद करने वाले के लिए यह जरूरी नहीं. व्यक्ति को यदि जल्दी शुरू होने वाला डिमेंशिया है जिसके कारण वे अब पैसे नहीं कमा पा रहे, तो देखभाल करने के लिए न सिर्फ देखभाल के बारे में सोचना होगा बल्कि यह भी सोचना होगा कि व्यक्ति और परिवार के खर्चे कहाँ से निकलेंगे.

जाहिर है कि देखभाल करने वालों को अपनी स्थिति को सही तरह से समझना होगा ताकि वे अपने रोल की जिम्मेदारियों को और स्कोप (कार्य-क्षेत्र) को निर्धारित कर पाएँ. आम चर्चाओं में देखभाल में इस विविधता पर ज्यादा चर्चा नहीं होती, पर देखभाल करने वाले इसका ख़याल रखें तो वे उपलब्ध जानकारी और सलाह से ज्यादा लाभ उठा सकते हैं.

नोट: इस वेबसाइट पर सब चर्चा भारत को ध्यान में रख कर हुए लिखी गयी है. यह भारत में स्थित घर में डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल करने वालों के लिए उपयुक्त है. साईट पर विभिन्न किस्म के देखभाल करने वालों के लिए टिप्पणी भी हैं, जैस कि दूर से देखभाल मैनेज करने वाले, जल्दी शुरू होने वाली डिमेंशिया के देखभाल कर्ता, इत्यादि)

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देखभाल कर्ता का रोल निभाने के लिए तैयारी

डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल अनेक कारणों से मुश्किल है, और इस रोल को निभाने के लिए आपको समझना होगा कि क्या क्या काम करने होंगे, और क्या क्या समस्याएँ आ सकती हैं. आपको अपनी जिंदगी के अनेक पहलूओं में देखभाल के लिए समय और पैसे निकालने के लिए बदलाव भी करने पड़ेंगे, और यह मुश्किल हो सकता है. ऊपर से, व्यक्ति की हालत को देखकर दुःख होता है. व्यक्ति के व्यक्तित्व में बदलावों को स्वीकारने में भी परिवार वालों को दिक्कत होती है.

dementia caregiver tries to balance work and caregivingक्योंकि देखभाल एक दो हफ्ते की बात नहीं, बल्कि सालों चल सकती है, और इसमें काम भी बहुत होता है, इसलिए अगर आप देखभाल का पूरा सफर तय करना चाहते हैं तो आपको रोल समझना होगा और देखभाल के लिए प्लान करना होगा. पहले से ही आप कई रोल संभाल रहे होंगे, जैसे कि अपना व्यवसाय, घर के काम, बच्चों की देखभाल और पढाई, अपने रिश्तेदारों और कम्यूनिटी के लिए करने वाले काम, अपने शौक के काम, वगैरह. इन सब में टाइम कैसे निकल जाता है, शायद पता भी न चलता. अब आपको डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल भी करनी है, तो इन सब कामों में से कुछ काम कम करने पड़ेंगे, क्योंकि देखभाल कोई छोटा रोल नहीं है. इस बढ़े हुए काम को आप किसी तरह कुछ दिन संभाल लेंगे, आप ऐसा नहीं सोच सकते क्योंकि देखभाल का काम लंबे अरसे तक चलेगा, और काम की मात्रा भी बढ़ती जायेगी.

पहले तो आपको डिमेंशिया क्या है, और इसका व्यक्ति पर क्या असर होता है, यह ठीक से समझना होगा. और फिर समझना होगा कि देखभाल में क्या क्या शामिल है, और उसके लिए आपको क्या इंतज़ाम करने होंगे, क्या सीखना होगा, क्या करते रहना होगा. आगे आगे क्या होगा, यह भी जानना होगा, ताकि आप तैयार रहें.

व्यक्ति के डिमेंशिया के लक्षण किस रोग से हो रहे हैं. आप डॉक्टरों से जानकारी मांग सकें और उनकी सलाह को समझ सकें, इसके लिए आपको अपनी डिमेंशिया और रोगों संबंधी जानकारी प्राप्त करनी होगी. आपको जिसकी देखभाल करनी है, उस व्यक्ति को कौन सा रोग है, और उस रोग का इलाज है या नहीं, यह जानना होगा. कभी कभी लक्षण कम करने के लिए दवाइयाँ तो होती हैं, पर वे दवाइयाँ हमेशा काम नहीं करतीं, और उनके कुछ दुष्परिणाम भी हो सकते हैं. यदि आप इनके बारे में जानते हों, तो डॉक्टर से उचित सवाल कर पायेंगे और निर्णय ले सकेंगे, और दवाई के दुष्परिणाम पहचान पायेंगे. रोग और उपलब्ध दवाइयों के बारे में मोटे तौर से जानना देखभाल के रोल का एक जरूरी अंग है. डिमेंशिया के बारे में अधिक जानकारी के लिए “इन्हें भी देखें” सेक्शन में दिए गए लिंक देखें.

डिमेंशिया के लक्षण किसी मूल रोग के कारण होते हैं. डिमेंशिया किस गति से बढेगा और कौनसे लक्षण पहले नज़र आ सकते हैं, यह रोग पर निर्भर है. रोग की जानकारी के अलावा, आपको डिमेंशिया की अवस्थाओं के बारे में भी मालूम होना चाहिए.

यह याद रखें कि हर व्यक्ति में रोग अलग तरह से पेश आता है, और सामान्य जानकारी आपको अंदाजा तो दे सकती है कि आगे क्या होगा, पर पक्का नहीं तय है कि आप जिस व्यक्ति की देखभाल कर रहे हैं, उनके साथ बिलकुल वैसा ही होगा जैसे आपने पढ़ा या सुना है.

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डिमेंशिया का व्यक्ति के व्यवहार पर प्रभाव होता है. डिमेंशिया व्यक्ति का व्यवहार बदल देता है. अगर आप यह बात ठीक से न समझें तो आप सोचेंगे कि व्यक्ति हट्टी हैं या आपको जान बूझ कर तंग कर रहे हैं, या कोशिश नहीं कर रहे हैं. इससे आप व्यक्ति का काम करते समय दुःखी हो सकते हैं, या गलत तरीका अपना सकते हैं. शायद आप बहस करने लगें, जो डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति के साथ बिलकुल बेकार रहता है. व्यक्ति का व्यवहार रोग के कारण है, और अगर आपको यह याद न रहे तो आपकी थकावट बढ़ेगी और आपको तनाव भी होगा. व्यवहार कैसे बदल सकता है, इस पर जानकारी के लिए नीचे “इन्हें भी देखें” सेक्शन के लिंक देखें.

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<a id=”plan”>देखभाल के लिए उचित योजना (प्लान) बनाएँ. आपको सोचना होगा कि आप व्यक्ति की देखभाल कैसे संभालेंगे, और जैसे जैसे स्थिति बिगड़ेगी, आप अपने देखभाल को उसके अनुसार कैसे बदलते जायेंगे. अगर शुरू में ही आपने इतने जोर-शोर से देखभाल करी हो कि थकान हद से बढ़ जाए, तो कुछ सालों में आप इस हालत में पंहुच सकते हैं कि आगे कुछ भी देखभाल करने में असमर्थ हो जाएँ. व्यक्ति का कोई काम करना है, यह सोचते ही आप घबरा जायेंगे, और उसके सामने भी जाना मुश्किल हो जाएगा. इस तरह का ब्रेकडाउन या बर्न-आउट हो, तो फिर व्यक्ति की देखभाल कैसे होगी? देखभाल की गति ऐसी रखें जो आप लंबे अरसे तक निभा सकें. बाद की अवस्था में व्यक्ति को आपकी ज्यादा जरूरत पड़ेगी, इसलिए आपको अपनी हिम्मत बनाए रखनी है.

caregiver negotiates with boss to work from homeदेखभाल की योजना बनाते वक्त यह सोचना होगा कि इस सब काम के लिए आप समय कैसे निकालेंगे. आपको अपनी अन्य जिम्मेदारियों को देख कर, उन्हें एडजस्ट करना पड़ेगा. डिमेंशिया के बढ़ने पर, अधिकाँश डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्तियों को अकेले नहीं छोड़ा जा सकता क्योंकि वे खुद को चोट लगा सकते हैं और अपने सब काम अकेले नहीं कर पाते. इसलिए किसी को पूरे वक्त व्यक्ति के साथ या पास रहना पड़ता है. इस काम के लिए या तो आप को भरोसे वाला प्रशिक्षित सहायक रखना होगा या परिवार वालों को बारी बारी से यह काम बांटना होगा. या आपको डिमेंशिया डे केयर की सेवा का इस्तेमाल करना होगा. इतना समय निकालने के लिए आपको शायद अपने करियर में एडजस्टमेंट करने पड़ेंगे, जैसे कि फुल-टाइम नौकरी की जगह पार्ट-टाइम काम लेना, या घर से काम करना, या नौकरी छोड़ देना. अगर व्यक्ति की वजह से आप घर से निकल ही नहीं पायेंगे, तो बाहर के काम कैसे करेंगे (जैसे कि बैंक का काम, सब्जी और राशन की खरीदारी)? लोगों से घर से बाहर मिलना मुश्किल होगा, पर मेहमानों को घर बुलाना भी शायद आसान न हो. छुट्टियों में शहर से बाहर जाना शायद न संभव हो.

देखभाल के लिए समर्थक सेवाओं के बारे में सोचना होगा. यह सोचना होगा कि घर पर क्या सामान रखना है, किस के फोन नंबर पास रहने चाहियें (मित्र जो एमरजेंसी में सहायता कर पाएँ), किन सेवाओं से जल्दी में सम्पर्क करने की जरूरत हो सकती है (डॉक्टर, एम्बुलेंस, रात भर खुलने वाला केमिस्ट, वगैरह). एमरजेंसी के लिए तैयार रहना जरूरी है. पहले से सोच कर रखें कि व्यक्ति को अस्पताल कैसे ले जायेंगे. यह भी जानना जरूरी है कि व्यक्ति के लिए अस्पताल या क्लिनिक जाना बहुत तनावपूर्ण हो सकता क्योंकि वहाँ का माहौल फ़र्क होता है, लोग फ़र्क होते हैं, शोर होता है, और व्यक्ति यह नहीं समझ पाते कि सुरक्षित घर छोड़ कर उन को यहाँ क्यों लाया गया है. लोग उनसे तरह तरह के प्रश्न पूछते हैं, जिससे वे कंफ्यूस हो जाते हैं. आपके पास डॉक्टर को दिखाने के लिए व्यक्ति की मेडिकल फाइल में पूरी जानकारी होनी चाहिए, क्योंकि डॉक्टर तो व्यक्ति से ही सवाल करेंगे और व्यक्ति जवाब नहीं दे पायेंगे या गलत जवाब देंगे. व्यक्ति को डिमेंशिया है, डॉक्टर को इस निदान का प्रिस्क्रिप्शन दिखा पाना जरूरी होगा. अच्छे डॉक्टरों से सम्पर्क बनाये रखें.

घर में व्यक्ति की सुरक्षा और सुविधा के लिए परिवर्तन करने होंगे. यह जरूरी है कि व्यक्ति आसपास के माहौल से घबराएं नहीं. पर छोटा घर हो तो ज्यादा बदलाव करने मुश्किल होते हैं. परिवार के अन्य सदस्यों की जरूरतें भी होती हैं, इसलिए आपको बदलाव के बारे में सोचना होगा और सब की सहमती लेनी होगी.

व्यक्ति की देखभाल के बारे में सभी भागीदारों के साथ बातचीत करनी होगी. घर में ऐसे अनेक लोग होते हैं जो व्यक्ति की देखभाल में भागीदार हैं. दूर रहने वाले भाई-बहन और अन्य रिश्तेदारों की भी चिंताएं और राय होगी. इसलिए सब को देखभाल में शामिल रखें. यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि आप साल दर साल पूरी देखभाल अकेले नहीं संभाल पायेंगे. काम और खर्च बांटा जाए तो अच्छा रहेगा, और इसके लिए सब को लगना चाहिए कि वे इस काम में भागीदार हैं, और उन्हें पराया नहीं समझा गया है. परिवार में देखभाल के ऊपर चर्चा न हो और सहमती न हो तो बाद में बहुत संघर्ष और मनमुटाव हो सकता है, और रिश्ते टूट सकते हैं. देखभाल की जानकारी बांटते रहना और सम्बन्ध बनाए रखना आपके रोल का एक अंश है.

देखभाल करने के तरीके सीखने होंगे. आपको सीखना होगा कि व्यक्ति से बातचीत कैसे करें और उसकी दैनिक कार्यों में मदद कैसे करें. यह भी जानना होगा कि ऐसा समर्थक माहौल कैसे बनाएँ ताकि व्यक्ति अपने काम जितना खुद कर सकता है, उतना कर पाएँ. यह भी सीखना होगा कि व्यक्ति के मुश्किल व्यवहार के कारण कैसे समझें और ऐसे व्यवहार को कैसे संभालें.

डिमेंशिया की अवस्थाओं के अनुसार देखभाल के तरीके बदलने होते हैं, और अग्रिम/ अंतिम अवस्था के लिए आपको अन्य तरीके भी सीखने होंगे, क्योंकि इस अवस्था में व्यक्ति पूरी तरह हर काम के लिए निर्भर हो जाता है, और देखभाल का कार्यभार बहुत बढ़ जाती है और होम नर्सिंग की जरूरत पड़ने लगती है.

डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल चुनौती भरा काम है. आपको अन्य देखभाल करने वालों से, सपोर्ट ग्रुप से, डॉक्टरों से, स्वयंसेवकों से सुझाव मिल पाएँ, इसके लिए आपको सबसे सम्पर्क बना कर रखना होगा, और जानकारी के लिए वेबसाइट, किताबें, और वीडियो भी देखने होंगे. देखभाल करने के लिए आवश्यक तरीके सीखें और अपनाएँ.

देखभाल करने का देखभाल कर्ता पर संभावित असर समझें.

डिमेंशिया वाले व्यक्ति की देखभाल का असर परिवार के सब सदस्यों पर भी पड़ता है, खास तौर से उस देखभाल कर्ता पर जो व्यक्ति की रोज मर्रे के कामों में देखभाल कर रहे हैं, और व्यक्ति की हालत बिगड़ते देख रहे हैं. यह संभावित असर समझना जरूरी है ताकि जितना हो सके, आप इसके लिए तैयार हों, या इससे बच पाए.

शारीरिक थकान ही संभावना ऊँची हैडिमेंशिया की देखभाल को दिन में 36 घंटे की देखभाल का काम माना गया है. शुरू में आप शायद सोचें कि भला इतनी थकान क्यों होगी, सभी लोग तो बीमार लोगों की देखभाल करते हैं और बुजुर्गों के साथ रहते हैं, पर समय के साथ आप देखेंगे कि डिमेंशिया देखभाल की थकान कुछ और ही है. अच्छा यही है कि आप स्वयं को तंदुरुस्त रखें ताकि देखभाल का कार्यभार संभालते संभालते आप खुद बीमार न पड़ जाएँ. यदि आपका स्वास्थ्य ठीक नहीं है, तो व्यक्ति की देखभाल के लिए अन्य विकल्प ढूँढें, और अन्य परिवार वालों को भी सूचित रखें, क्योंकि अगर आप इस काम को संभाल नहीं पायेंगे तो आपको और व्यक्ति को, दोनों को नुकसान हो सकता है.

 
dementia patient claims he hasn't had breakfast half-an-hour after eating it

समाज में लोग डिमेंशिया के व्यवहार को समझें नहीं तो शर्मिंदगी भी हो सकती है और आपको अकेलापन महसूस हो सकता है डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति हाल में हुई बातें भूल जाते हैं, जैसे कि खाना खाया था या नहीं. अपने भूलने के कारण वे अकसर शक्की हो जाते हैं और आरोप लगाने लगते हैं. कभी कह देंगे कि आप उन्हें खाना नहीं देते, तो कभी कहेंगे कि आपकी नज़र उनके पैसों पर है या किसी ने उनके जेवर चुरा लिए हैं. क्योंकि बाकी व्यवहार में बाहर वालों के सामने डिमेंशिया के बावजूद व्यक्ति सामान्य लगते हैं, इसलिए अकसर लोग उनकी बात पर यकीन कर लेते हैं, और सोचते हैं कि कोई तो गड़बड़ है, वरना आंटीजी ऐसा क्यों बोलतीं? ऐसी बातों से लोगों की नज़र में आपकी इज्ज़त कम हो सकती है.

कभी कभी लोग आकर कुछ कह भी सकते हैं, या डांट सकते हैं कि आप गलत काम कर रहे हैं. नजदीकी रिश्तेदार भी शिकायतों पर यकीन करके कुछ चुभोने वाली बात कह सकते हैं. अगर आप उन्हें समझाने की कोशिश करें कि असलियत क्या है, या देखभाल करनी कितनी मुश्किल है, तो लोग उसे बहाना समझ सकते हैं. वे सोच सकते हैं कि आप अपनी गलतियों पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहे हैं. अगर व्यक्ति शिकायत न भी करे, लोग अकसर यह नहीं समझ पाते कि आप थकान की बात क्यों कर रहे हैं जबकि देखने में आंटीजी बिलकुल ठीक हैं और बुजुर्गों के साथ तो सभी रहते हैं.

भारत में डिमेंशिया की जानकारी बहुत ही कम है. आपको यह सोचना होगा कि औरों को सच्चाई कैसे समझाएं ताकि ये आसान से समझ सकें और आप पर यकीन भी करें. किताबों द्वारा, पत्रिकाओं द्वारा, चित्रों द्वारा, यूट्यूब द्वारा, अनेक विश्वसनीय तरीकों से उन्हें डिमेंशिया की सच्चाई के बारे में बताना होगा. बात करते हुए आप अगर गुस्सा करेंगे या विचलित होंगे तो आपकी बात शायद कोई न सुने. यदि आप उपसेट हों तो गहरी सांस लें, कुछ डेरे चहल कदमी कर लें, और शांत होने के बाद ही बात करें. संभव हो तो औरों से मदद मांगें, उन्हें व्यक्ति के साथ कुछ समय बिताने दें या देखभाल के कार्यों में आपके साथ रहने को कहें, ताकि वे स्थिति खुद देख और समझ पाएँ. आपको एक मित्रों के समुदाय/ सपोर्ट ग्रुप (support group, support network) की जरूरत होगी, और इसको बनाने में टाइम लगता है, इसलिए ऐसे लोग अपने इर्द गिर्द इकठ्ठा करना शुरू कर दें जो जरूरत होने पर आपका समर्थन भी करें, और आपकी मदद भी कर पाएँ.

कुछ प्रकार के डिमेंशिया में व्यक्ति समाज में कैसे उठते बैठते हैं, यह भूल जाते हैं, या अपनी हरकतों पर काबू नहीं रख पाते. वे औरों की भावनाओं को पहचान नहीं पाते और उनकी कद्र नहीं कर पाते. इस कारण उनका व्यवहार उग्र हो सकता है, वे लोगों पर चिल्ला सकते हैं और गाली दे सकते हैं, और अश्लील हरकतें भी कर सकते हैं. अनुचित तरह से हंसना या रोना भी कर सकते हैं. लोगों से कट सकते हैं. इस तरह के व्यक्तित्व के बदलाव को लोग चरित्र की बुराई मान सकते हैं. डिमेंशिया का व्यक्ति पर कक्या और क्यों असर पड़ रहा है, ऐसी स्थिति में यह दूसरों को समझाना और भी जरूरी हो जाता है.

डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल के लिए भावनात्मक रूप से भी तैयार होना होता है व्यक्ति की बिगड़ती हालत देखना भावनात्मक तौर से मुश्किल होता है. जैसे जैसे व्यक्ति का डिमेंशिया बढेगा आप देखेंगे कि उन को हर काम में ज्यादा दिक्कत हो रहे है, उनका व्यवहार बदल रहा है, और यह सब और अन्य लक्षण देखते हुए आपको लगेगा कि जिस व्यक्ति को आप जानते थे, ये वो नहीं हैं. जो यादें, जो बातें आप व्यक्ति के साथ बाँट सकते थे, अब आप उनके बारे में व्यक्ति के साथ बात नहीं कर पाते. एक समय ऐसा आएगा जब व्यक्ति आपको पहचान नहीं पायेंगे. व्यक्ति के बदलाव देखना दर्दनाक हो सकता है. व्यक्तित्व इतना फ़र्क हो सकता है कि देखना मुश्किल हो जाए. बदले व्यवहार (जैसे कि उत्तेजना, आक्रमण वाला व्यवहार,गाली देना, इत्यादि) को संभालते हुए बहुत चोट पंहुच सकती है.

जैसे जैसे व्यक्ति की हालत बिगड़ेगी, आपके लिए देखना मुश्किल होगा. कुछ देखभाल कर्ता खुद सुस्त हो जाते हैं, कुछ पुरानी बातों को लेकर सोचने लगते हैं कि मैंने उस दिन पापा पर गुस्सा क्यों किया, मैं डिमेंशिया को समय पर समझ क्यों नहीं पायी. यह भी लग सकता है कि व्यक्ति के साथ साथ आपका बीता हुआ कल भी डूब रहा है. और यह भी हो सकता है कि जिसकी आप देखभाल कर रहे हैं उसके साथ आपके पहले के मनमुटाव हैं, व्यक्ति ने शायद आपको डिमेंशिया के दिनों से पहले बुरा-भला कहा हो और तंग किया हो, गुस्सा किया हो. शायद आपको इस व्यक्ति से कभी स्नेह न रहा हो, और अब आपको देखभाल करने पड़ रही है, इस पर आपको बहुत नाराजगी हो. इन भावनाओं से जूझना बहुत मुश्किल होता है. आपको यह समझना है कि यह भावनाएं आम हैं. देखभाल करने वाले भले ही समाज में यह सब बोल न पाएँ, पर इस तरह के दुःख, इस तरह की नाराजगी में आप अकेले नहीं हैं. यह ख़याल स्वाभाविक भी हैं, और सामान्य भी. स्थिति को यह सोच कर और कठिन न करने कि यह ख़याल गलत हैं और ऐसा सोचना बुरी बात है या पाप है. अपने आप को दोष न दें.

कुछ दिन अच्छे बीतेंगे, कुछ खराब–बुरे दिनों पर अच्छे दिनों की यादों का सहारा लें कुछ दिन आप पायेंगे कि देखभाल का काम आपको संतोष दे रहा है, खासतौर से अगर व्यक्ति आपकी मदद मुस्करा कर लें, या काम करने में सहयोग दें. पर अन्य दिन, जब आप थके हों या आपके अन्य काम ज्यादा हो या जब व्यक्ति शिकायत करें या चिल्लाएं या बात ही न करें, तब आपको लग सकता है कि इस सब देखभाल करने का तो कोई फायदा ही नहीं, और आप निराश हो सकते हैं. आप को इस उतर चढ़ाव के लिए तैयार रहना होगा. आपको यह याद रखना होगा कि अगर व्यक्ति किसी दिन ज्यादा दिक्कतें पेश कर रहे हैं, तो यह आपकी गलती नहीं, ऐसे उतार-चढ़ाव तो डिमेंशिया में होते ही हैं. तनाव से बचे रहने के लिए तरीके सीखें और अपनाएँ.

अपना ख़याल रखें और खुद को स्वस्थ रखें. थके-हारे होंगे, तनावग्रस्त होंगे तो आप देखभाल नहीं संभाल पाएंगे. आपको मदद की जरूरत पड़ेगी. आपको अपनी देखभाल भी करनी होगी.

सपोर्ट ग्रुप और अन्य साधन और सेवाओं का इस्तेमाल करें एक समस्या यह है कि देखभाल का काम दिन का इतना बड़ा हिस्सा ले लेता है, और आपको घर में इतना बाँध देता है कि आपका मिलना जुलना लगभग बंद हो सकता है. आपको सपोर्ट की जरूरत पड़ेगी, जो सपोर्ट ग्रुप और अन्य देखभाल कर्ताओं से मिल सकती है, क्योंकि ये लोग आपकी ही स्थिति में हैं, और सब आपस में किस्से बाँट सकते हैं. आपको अपने लिए समय भी निकालना होगा, और इसके लिए आपको अन्य साधन और सेवोओं का उपयोग करना होगा. घर पर व्यक्ति को संभालना संभव न हो, तो उनके लिए उचित ओल्ड-एज-होम ढूँढना होगा. अपने तनाव के लिए, या निर्णय लेने में मदद के लिए, काउंसेलिंग के बारे में भी सोच सकते हैं.

अपना ध्यान रखें, अपनी सेहत को सहेजें. देखभाल कर्ताओं में तनाव एक आम समस्या है. पर देखभाल करने के लिए, आपको खुद को स्वस्थ और खुशहाल रखना होगा वरना देखभाल भी नहीं कर पायेंगे, और आप खुद तकलीफों से घिर जायेंगे. आपको जतन करके अपने लिए समय निकालना होगा. खुद की देखभाल करना शायद आसान ना हो, पर बहुत जरूरी है. थोडा टाइम निकल कर सैर करें, गाने सुनें, नॉवेल पढ़ें, पेंटिंग करें. हो सके तो दोस्तों के साथ काफ़ी पीने जाएँ. पौष्टिक खाना खाएं, व्यायाम करें. योगा करें, मैडीटेट करें. आप तनाव महसूस करेंगे तो व्यक्ति आपके तनाव को देखकर और भी उत्तेजित या मायूस हो सकते हैं, जिससे दोनों के लिए स्थिति अधिक बिगड सकती है. आपका तनाव बढ़ रहा हो तो तनाव मुक्त होने के तरीके अपनाएं और काउंसेलिंग का भी इस्तेमाल करें. भारत में उचित प्रकार की सहायता मिलना मुश्किल है, और सामाजिक सपोर्ट भी कम हो सकती हैं, इसलिए आपको स्व-देखभाल के पहलू पर ज्यादा ध्यान देना होगा और रचनात्मक हल निकालने पड़ेंगे.

स्व-देखभाल (अपनी देखभाल) के लिए भी प्लान करें: जैसे कि व्यक्ति की देखभाल के लिए प्लान करना जरूरी है, वैसे ही अपनी खुद की देखभाल (स्व-देखभाल, self-care) के लिए भी आपको प्लान करना होगा. ये जानें कि समय के साथ देखभाल का कार्य-भार भी बढेगा, और आपको घर से निकल पाना भी मुश्किल हो सकता है. पहले से ही इस हिसाब से अपने कामों कॉ आयोजन करें कि बदते कार्य-भार को आप संभाल पाएँ, और स्व-देखभाल के लिए जरूरी सामान भी आपके पास हो. उदाहरण के तौर पर, शुरू में, जब देखभाल का काम कम हो, आप योगा या मेडीटेशन की क्लास अटेंड कर सकते हैं, ताकि बाद में आप योगा और मेडीटेशन घर पर अकेले कर पाएँ. घर पर व्यायाम करने के लिए कुछ सामन खरीद सकते हैं. आस-पास उपलब्ध घर के सामान और खाने के होम-डिलीवरी वालों को आजमा सकते हैं ताकि जिस दिन जरूरत हो, उस दिन आप उनका बे-झिझक इस्तेमाल कर पाएँ. घर पर ही डॉक्टर आ जाएँ, ऐसे डॉक्टर का पता चला सकते हैं ताकि आपकी तबीयत ठीक न हो तो आप को भी डॉक्टर की सलाह मिल पाए.

अंत में… हर देखभाल करने की स्थिति फ़र्क होती है, हर देखभाल करने वाले का यह सफर अलग होता है. हर कोई यह कार्यभार अलग तरह से संभालता है. अपने को औरों से तुलना करने नीचा न समझें. यह भी याद रखें कि इस सफर में आपका परिवार भी आपके साथ है, और अगर उन्हें भागीदार बनाएँ तो हो सकता है कि देखभाल साथ साथ करने से और काम बांटने से परिवार के सदस्य आपस में और जुड़ जाएँ. बच्चे भी देखभाल के पीछे की अच्छी भावनाओं को सीख पाएँ.

कुछ परिवारों की स्थिति बहुत ही कठिनाई भरी होती है. पैसे की कमी पड़ सकती है. थकान से देखभाल कर्ता हताश हो सकते हैं. हो सकता है किसी भी जगह से कोई सहारा न मिले, थोडा सा भी आराम न मिल पाए. हर एक दिन बिताना बोझ बन सकता है. ऐसे में हर एक टिप मूल्यवान है, चाहे कितनी ही चोटी हो, कुछ राहत दे सकती है. आप यह जानें कि आप अपने समर्थ में जितना हो सकता है, कर रहे हैं, और इससे ज्यादा किसी की कोई उम्मीद नहीं हो सकती.

देखभाल का काम अपनी अन्य जिम्मेदारियों के साथ संभालना संभव है, पर आसान नहीं. आपको अपनी जिंदगी के हर पहलू पर सोचना होगा, और देखभाल कर पाएँ, इसके लिए कई बदलाव भी करने होंगे. देखभाल की आदत पड़ने में टाइम लगेगा, और आप कई बार हताश भी होंगे. पर देखभाल करने में कई मधुर पल भी होंगे. कभी कभी जब व्यक्ति मुस्कुराते हैं, या कुछ ऐसा कहते या करते हैं जिसकी आप को उम्मीद नहीं थी, तो आपको एक सुखद एहसास होगा. देखभाल के काम से आपकी जिंदगी जो नया मोड़ लेगी, उससे शायद आपका जिंदगी के प्रति रवैय्या ही बदल जाएगा.

ऐसे दिन भी होंगे आप थके हों, खुद को हारा हुआ महसूस कर रहे हों, सब कुछ बेकार लग रहा हो, यह लग रहा हो कि आपकी जिंदगी तो इस देखभाल के काम में डूब गयी. ऐसे दिनों में देखभाल के मधुर पल आपको हिम्मत देंगे. यह भी सोचें कि आप जो रोल कर रहे हैं वह एक अत्यंत जरूरी रोल है, और किसी न किसी को यह करना है, और कल अगर आप बीमार हों तो आपके लिए भी कोई यह रोल अदा करेगा.

आप देखभाल का रोल निभाता निभाते अपने आप को सिर्फ एक देखभाल कर्ता न समझें. आपके कई पहलू हैं और हालात ऐसी हैं कि अभी यह एक रोल प्रमुख है और अन्य लोग आपको सिर्फ इस रोल में सीमित समझ रहे हैं, पर अन्य लोग करें या न करें, आप अपनी कद्र करते रहें.

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इन्हें भी देखें….

हिंदी पृष्ठ, इसी साईट से:

कुछ उपयोगी लेख, हमारे अन्य वेबसाइट से: ये लेख हमारे दूसरे वेबसाइट्स से हैं, और भारत की स्थिति को ध्यान में रखते हुए लिखे गए हैं. ये अँग्रेज़ी में हैं (नीचे देखें, हर लेख का छोटा सा हिंदी परिचय)

कुछ उपयोगी इंटरव्यू :

  • पत्नी की देखभाल के लिए पति एक सफल करियर छोड़ देते हैं, और यह भी देखते हैं कि देखभाल करने से उनका व्यक्तित्व ही बदल गया:She would hold me for support.
  • एक बहु अपनी सास की देखभाल के लिए अपना करियर स्थगित करती हैं: Caregiving challenges, trained ayahs, depression.
  • बड़ी उम्र में पत्नी बनीं प्रमुख देखभाल कर्ता (एक 78 साल की पत्नी का इंटरव्यू): A 78-year old caregiver speaks . और एक अन्य स्थिति, जिसमे 15 साल की उम्र की बेटी पर आया माँ की देखभाल का काम Thrust into caregiving at the age of fifteen.

कुछ उपयोगी लेख, केयरगिवर रोल पर अनुभव बांटने के लिए:

इस पृष्ठ का नवीनतम अँग्रेज़ी संस्करण यहाँ उपलब्ध है: Understand the caregiver’s role. अंग्रेज़ी पृष्ठ पर आपको विषय पर अधिक सामयिक जानकारी मिल सकती है. कई उपयोगी अँग्रेज़ी लेखों, संस्थाओं और फ़ोरम इत्यादि के लिंक भी हो सकते हैं. कुछ खास उन्नत और प्रासंगिक विषयों पर विस्तृत चर्चा भी हो सकती है. अन्य विडियो, लेखों और ब्लॉग के लिंक, और उपयोगी पुस्तकों के नाम भी हो सकते हैं.

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