निदान, उपचार, बचाव (Dementia Diagnosis, Treatment, Prevention)

किसी व्यक्ति को डिमेंशिया (मनोभ्रंश) है या नहीं, ये सिर्फ डॉक्टर बता सकते हैं, और वह भी सिर्फ उचित जांच के बाद. यदि आप किसी व्यक्ति में डिमेंशिया के लक्षण देखें, तो सही रोग-निदान (diagnosis) के लिए डॉक्टर से सलाह करें. डॉक्टर निर्धारित करेंगे कि व्यक्ति को डिमेंशिया है या नहीं, और है तो किस रोग के कारण है, और उपचार क्या है.

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डिमेंशिया किसी को भी हो सकता है

डिमेंशिया किसी को भी हो सकता है. यह जात-बिरादरी, भाषा, प्रान्त, मज़हब, अमीरी-गरीबी, सामाजिक स्तर, नर-मादा, किसी का भी भेद-भाव नहीं करता. इसकी संभावना उम्र के साथ बढ़ती ज़रूर है, और 65 साल के बाद ज्यादा पाई जाती है, पर कुछ लोगों को डिमेंशिया 30, 40, या 50 की उम्र में भी हो जाता है.

लोगों में एक आम धारणा है कि बुद्धिमान और सक्रिय लोगों को डिमेंशिया नहीं होगा. वे कहते हैं, “हम तो रोज शब्द-पहेली (crossword)/ सू-डो-कू (sudoku) करते हैं, हमें डिमेंशिया नहीं होगा”. पर यह धारणा गलत है. कई ऐसे व्यक्ति, जो जिन्दगी भर शारीरिक और मानसिक रूप से सक्रिय रहे हैं, वे आज डिमेंशिया से ग्रस्त हैं.

मीडिया में डिमेंशिया को अकसर बुजुर्गों के रोग के तौर से पेश किया जाता है, या भूलने की बीमारी कहा जाता है. यह गलत है, और इससे व्यक्ति और आस-पास वालों की लक्षणों के प्रति सतर्कता कम हो सकती है. डॉक्टर भी इस भ्रम में हो सकते हैं, जिससे निदान मिलने में भी देर हो सकती है.

भारत में, क्योंकि डिमेंशिया के प्रति जागरूकता कम है, हमें डिमेंशिया के लक्षणों के प्रति अधिक सतर्क रहना चाहिए ताकि हम शुरुआती अवस्था में ही इसे पहचान सकें और इसका निदान करवा सकें, और व्यक्ति की देखभाल के लिए अपने-आप को ढाल सकें.

कुछ जाने-माने डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति: अमरीकन प्रेसिडेंट रोनाल्ड रीगन, इंग्लेंड की पूर्व प्रधान मंत्री मार्गरेट थैचेर
और भारत से: तेजी बच्चन (अमिताभ बच्चन के माँ) जोर्ज फर्नांडीस, सरोजिनी नायडू

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शुरू की अवस्था में ही निदान (early diagnosis) क्यों ज़रूरी है

लक्षणों को शुरुआती चरण में न पहचान पाना एक आम समस्या है. याददाश्त में प्रॉब्लम हो भी तो इसे बढ़ती उम्र का नतीजा समझा जाता है, और व्यक्ति या परिवार डॉक्टर से सामान्य चेक-उप के वक्त इसका ज़िक्र तक नहीं करते. यह डर हो भी कि शायद समस्या गंभीर है, फिर भी डॉक्टर के पास जाने में संकोच होता है. अन्य समस्याओं में भी–जैसे कि कन्फ्यूशन, उदासीनता, चरित्र में बदलाव–लोग यह नहीं सोचते कि यह किसी बीमारी के कारण हैं, और डॉक्टर से सलाह नहीं करते. कहता हैं, डॉक्टर कुछ नहीं कर पायेंगे.

प्रारंभिक अवस्था में निदान का सबसे बड़ा फायदा यह है कि कुछ रोग ऐसे हैं जिन से डिमेंशिया जैसे लक्षण होते हैं, पर इन रोगों का इलाज है (reversible causes), और इलाज करने से लक्षण दूर हो जाते हैं. यदि डॉक्टर के पास जाएँ, तो व्यक्ति की स्थिति फिर से सामान्य हो सकती है. ऐसे रिवर्सब्ल रोग के उदाहरण: थाइरोइड हार्मोन की कमी, अवसाद, तनाव, वगैरह (इस विषय पर विस्तृत चर्चा के लिए कुछ लिंक नीचे “इन्हें भी देखें” सेक्शन में हैं)

अधिकाँश डिमेंशिया इर्रिवर्सिब्ल है, यानि कि दवाई से रोग के कारण जी हानि ठीक नहीं हो सकती. फिर भी, इन में से कुछ डिमेंशिया ऐसे हैं जिन में प्रारंभिक अवस्था में दवाई के लक्षणों में कुछ देर तक कुछ राहत मिल सकती है. निदान हो, तो व्यक्ति को कुछ तो राहत मिलने की संभावना है.

अगर डिमेंशिया किसी ऐसे रोग की वजह से है जो लाइलाज है, और जिसमे राहत भी संभव नहीं, फिर भी निदान होने से परिवार वाले स्थिति को समझ पायेंगे. वे आगे के बारे में सोच सकते हैं और देखभाल की योजना बना सकते हैं.

अकसर लक्षण प्रकट होने के बाद भी व्यक्ति और परिवार निदान करवाने की कोशिश नहीं करते.

याददाश्त में समस्या होना कई प्रकार के डिमेंशिया का एक शुरुआती लक्षण है. परन्तु कई लोग याददाश्त के कमज़ोर होने को उम्र-बढ़ने का सामान्य भाग समझते हैं, और इसलिए डॉक्टर से चेक-अप के दौरान इसका ज़िक्र नहीं करते और न ही सलाह लेते हैं. कुछ अन्य लोग, जिन्होंने डिमेंशिया के बारे में सुना है, वे डर के मारे किसी को अपनी समस्या के बारे में नहीं बताते क्योंकि डिमेंशिया की समाज में जानकारी अधूरी है, और कई लोग इसे मानसिक रोग या पागलपन कह देते हैं, और इसका होने शर्मनाक समझा जाता है. इन कारणों की वजह से, कई डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्तियों का शुरुआती समय में निदान नहीं होता, और परिवार वाले व्यक्ति को डॉक्टर के पास तभी के जाते हैं जब डिमेंशिया मध्य या अग्रिम अवस्था में होता है और इसके लक्षणों के कारण इतनी तकलीफ होने लगती है कि उन्हें नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता.

डिमेंशिया के अन्य प्रारंभिक लक्षण भी हो सकते हैं, जैसे कि व्यक्तित्व में बल्दाव, बोलने में दिक्कत होना, सामाजिक तौर-तरीके भूल जाने, चलने या संतुलन में दिक्कत, लोगों से कटे कटे रहना, वगैरह. यह भी हो सकता है कि याददाश्त सही रहे, पर अन्य लक्षण नज़र आएँ. यदि व्यक्ति और परिवार वाले सतर्क हों, तो वे डॉक्टर से सलाह कर के सही निदान पा सकते हैं.

इस तरह निदान देर से करने से व्यक्ति और परिवार, दोनों को नुक्सान होता है.

यह भी संभव है कि व्यक्ति को ऐसे प्रकार का डिमेंशिया है जो दवाई से दूर नहीं किया जा सकता (और अधिकांश डिमेंशिया इसी प्रकार के होते हैं). पर इस स्थिति में भी, कुछ ऐसी दवाइयां हैं जो रोग तो नहीं दूर कर सकतीं, पर प्रकट लक्षण कम कर सकती हैं, जिससे व्यक्ति को (और परिवार को) राहत मिल सकती है, और व्यक्ति का जीवन पहले से अधिक सामान्य हो सकता है. शायद याददाश्त थोड़ी बेहतर हो जाए, तो कुछ तो आराम मिले. निदान को टालते रहने से व्यक्ति और परिवार इस राहत से वंचित रहते हैं. अधिकांश ऐसी दवाइयां प्रारंभिक अवस्थी में ज्यादा कारगर होती हैं.

जब शुरू में व्यक्ति कठिनाई महसूस करते हैं, तो वे घबरा जाते हैं, या शर्म महसूस करते हैं, क्योंकि वे समझ नहीं पाते कि उन्हें क्या हो रहा है. या तो वे औरों से बच कर रहने लगते हैं और सहमे सहमे रहते हैं, या बात बात पर गुस्सा करते हैं या शक करते हैं कि अन्य लोग ही कुछ कर रहे होंगे जिससे उन्हें प्रॉब्लम हो रही हैं. यह भी एक कारण है जिसकी वजह से व्यक्ति डॉक्टर के पास जाने की नहीं सोचते. डिमेंशिया की जागरूकता फैलेगी तो यह समस्या कम होगी.

जब व्यक्ति और परिवार यह नहीं जानते कि व्यक्ति की दिक्कतें किसी बीमारी के कारण हैं, तो वे रहने का, बातचीत करने का, और मदद करने का तरीका नहीं बदलते, और व्यक्ति से उम्मीद की जाती है कि वह एक सामान्य स्वस्थ बुज़ुर्ग की तरह अपने सब काम कर पायेगा और बातों को समझ पायेगा. जब यह नहीं होता, तो सभी परेशान हो जाते हैं, और परिवार का माहौल बिगड़ने लगता है. लोग एक दूसरे पर गुस्सा करते हैं, या दुखी रहते हैं. परन्तु यदि सही समय पर व्यक्ति का निदान हो जाए, तो परिवार वाले भी अपने तरीके बीमारी की समस्याओं के अनुरूप बदल पाते हैं और घर में तनाव कम हो जाता है. देखभाल के सही तरीके सीखना और उपयोग में लाना तभी हो सकता है जब परिवार समझे कि व्यक्ति को डिमेंशिया है, और फिर उस के लिए बोलचाल और अन्य तरीके बदले. शुरू की अवस्था में निदान हो जाए तो सालों का तनाव बच सकता है.

इन सब कारणों का ख़याल रखते हुए, यही अच्छा है कि परिवार वाले सतर्क रहें, और अगर लक्षण देखें तो डॉक्टर से जांच करा लें.

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किस से सलाह करें

अगर आप देखें कि कोई व्यक्ति डिमेंशिया जैसे लक्षण दिखा रहा है, तो आप फैमिली डॉक्टर या GP से सलाह कर सकते हैं. डॉक्टर कुछ जांच करके, यदि ज़रूरी हो, तो विशेषज्ञ के पास भेज देंगे. पर अफ़सोस, कई डॉक्टर भी डिमेंशिया के बारे में अधिक नहीं जानते और बढ़ती उम्र के लोगों की समस्या को यह कह कर टाल देते हैं कि उम्र बढ़ेगी तो यह सब तो होगा ही. कुछ तो हंस कर मजाक भी उड़ा देते हैं. या अगर व्यक्तित्व में बदलाव है तो उसे घर का अंदरूनी मामला कह देते हैं या मानसिक रोग का निदान दे देते हैं. जल्दी शुरू होने वाले डिमेंशिया को पहचानने में अकसर देर होती है, क्योंकि डॉक्टर भी इसी भ्रमित ख़याल में रहते हैं कि डिमेंशिया बुजुर्गों में पाया जाता है.

यदि आप डॉक्टर की बात से संतुष्ट न हों, या आप देखें कि डॉक्टर आपकी बात को गंभीरता से नहीं ले रहा, तो अन्य किसी डॉक्टर के पास जाएँ. ऐसे डॉक्टर को ढूँढें जिन्हें डिमेंशिया का अनुभव हो. आप सीधे विशेषज्ञ के पास भी जा सकते हैं.

स्पष्ट निदान पाने के लिए अनेक टेस्ट ज़रूरी हैं, और अकसर ये विशेषज्ञ ही करेंगा. विशेषज्ञ यह भी बताएंगे कि डिमेंशिया किस रोग के कारण है. आप किसी भी अस्पताल के न्यूरोलॉजी विभाग के बाह्य रोगी विभाग (OPD) से सम्पर्क करके मिलने का समय के सकते हैं. अन्य डिपार्टमेंट जहाँ आपके उचित विशेषज्ञ मिल सकते हैं: मनोचिकित्सा (साईकाइट्री, psychiatry), जीरियाट्रिक्स (geriatrics). कुछ अस्पतालों में मेमोरी क्लिनिक भी होते हैं. अगर आपके शहर में ARDSI का चैप्टर है, तो आप उनसे भी सम्पर्क कर सकते हैं. कुछ शहरों में मेमोरी क्लिनिक भी हो सकते हैं, जहाँ सलाह मिल सकती है.

कभी कभी लक्षण दिखाने वाला व्यक्ति यह नहीं मानता कि उसे कोई प्रॉब्लम है, और डॉक्टर के पास जाने से साफ़ इंकार कर देता है. ऐसे में परिवार वाले डॉक्टर से मिल कर निवेदन कर सकते हैं कि डिमेंशिया की जांच उस व्यक्ति के सामान्य, नियमित चेक-उप में जोड़ दी जाए, और जब व्यक्ति को अन्य चेक-उप के लिए डॉक्टर के पास ले जाएँ, तब डॉक्टर डिमेंशिया के टेस्ट भी कर लें.

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निदान (Diagnosis)

डिमेंशिया के निदान में कई कदम है, और अनेक टेस्ट होते हैं. सिर्फ एकाध सवाल पूछ कर डिमेंशिया का निदान नहीं किया जा सकता. डिमेंशिया का निदान सिर्फ डॉक्टर कर सकते हैं. यह एक क्लिनिकल (चिकित्सकीय) निदान है. यह निदान डॉक्टर व्यक्ति की सही प्रकार से जांच करने के बाद ही कर सकते हैं.

निदान करने के लिए डॉक्टर के लिए सबसे प्रमुख जानकारी है व्यक्ति का इतिहास और यह समझना कि व्यक्ति को किस किस प्रकार की समस्याएँ हैं और वे कौन सी दवाइयाँ ले रहे हैं, और क्या वे अपने काम कर पा रहे हैं या नहीं. परिवार वालों को सब फाइल और मेडिकल रिकॉर्ड पेश करने के लिए तैयार रहना चाहिए और लक्षण समझाने के लिए भी तैयार रहना चाहिए.

डॉक्टर लक्षणों से पीड़ित व्यक्ति से कई सवाल पूछेंगे, जैसे कि तारीख क्या है, अपना नाम और पता बताएं, कुछ छोटे जोड़ने/ घटाने के सवाल. वे व्यक्ति से कुछ छोटे काम भी करायेंगे, जैसे कि कोई चित्र को कॉपी करना, चित्र पहचानना, एक सूची में दिए गए शब्द याद करके दोहराना. इन सबसे डॉक्टर उस व्यक्ति की संज्ञानात्मक बाधकता (cognitive impairment) का अंदाजा लगाएंगे. आपने जो लक्षण बताए हैं, और इस सवाल-जवाब का नतीजा देख कर, वे आगे के टेस्ट के बारे में तय करेंगे.

रक्त के टेस्ट करके डॉक्टर अन्य चीज़ों को देखेंगे, जैसे कि थाइरोइड हार्मोन (thyroid hormones) की कमी, विटामिन B12 की कमी, वगैरह.

दिमाग का स्कैन (MRI, PET scans, CT scans) करके डॉक्टर चेक करेंगे कि सामान्य दिमाग की तुलना में क्या इस व्यक्ति के दिमाग में कहीं कोई विकार है, या कुछ अधिक सिकुडन है, या अन्य कोई समस्या है जो लक्षणों का कारण हो सकती है. वे यह भी देखेंगे कि दिमाग के कौन से भाग सक्रिय हैं, और कौन से नहीं.

डॉक्टर यह समझने की कोशिश करेंगे कि प्रस्तुत लक्षण के क्या क्या कारण हो सकते हैं. यह कारण डिमेंशिया वाले रोग हैं, या अन्य रोग.

इन सब जांच के बाद ही डॉक्टर निदान करेंगे, और रोग के बारे में जानने पर, आगे क्या हो सकता है, परिवार वालों को यह अंदाजा मिलेगा.

परिवार वालों को डॉक्टर से अन्य संसाधन के बारे में भी पूछ लेना चाहिए, जैसे कि सपोर्ट ग्रुप, डिमेंशिया समर्थन संस्थाएं, सेवाएं देने वाली एजेंसी, कॉउसेलोर, इत्यादि. डॉक्टर का ध्यान अकसर सिर्फ दवाई और इलाज पर होता है, और वे बिना पूछे शायद यह जानकारी न दें.

कभी कभी निदान डिमेंशिया का नहीं, बल्कि मंद संज्ञानात्मक बाधकता (mild cognitive impairment) का होता है. यह डिमेंशिया नहीं है. मंद संज्ञानात्मक बाधकता से पीढित कुछ व्यक्ति सुधार दिखाते हैं या उसी स्तर पर रहते हैं, पर कुछ को डिमेंशिया हो सकता है. क्योंकि मंद संज्ञानात्मक बाधकता वाले व्यक्तियों में आगे बढ़कर डिमेंशिया होने की संभावना ज्यादा होती है, इसलिए इस निदान की स्थिति में अगला चेक-अप कब कराएं, यह डॉक्टर की सलाह से तय कर लेना चाहिए.

यह नोट करें कि जीन परीक्षा (genetic testing)निदान का भाग नहीं है, न ही कोई ऐसा खून का टेस्ट है जिससे अल्ज़ाइमर (Alzheimer’s Disease) का निदान हो सके. निदान के वक्त डॉक्टर यह देखते हैं कि क्या व्यक्ति को डिमेंशिया है (किसी भी रोग से होने वाला ऑल-कौज़ डिमेंशिया) (all-cause dementia, dementia that may be caused by anything) और यह भी देखने की कोशिश करते हैं कि डिमेंशिया का कौन सा कारक रोग है: अल्ज़ाइमर रोग (Alzheimer’s Disease), संवहनी मनोभ्रंश (नाड़ी-संबंधी, Vascular dementia), फ्रंटो-टेम्पोरल (Frontotemporal dementia), लुई बॉडी (Lewy Body Dementia), पार्किन्सन (Parkinson’s), इत्यादि).

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निदान-संबंधी समस्याएँ (Problems related to diagnosis)

भारत में डिमेंशिया का सही और पूरा निदान मिलना इतना आसान नहीं है, क्योंकि डिमेंशिया के बारे में कई डॉक्टरों को भी ठीक से जानकारी नहीं है, और उनका डिमेंशिया-निदान का अनुभव भी कम है. ऊपर से डिमेंशिया का निदान किसी एक टेस्ट या स्कैन से तय नहीं किया जा सकता. व्यक्ति को डिमेंशिया है या नहीं, और अगर है तो किस रोग के कारण है, और साथ में अन्य कौन कौन सी समस्याएं हैं, यह सब जान पाना पेचीदा काम है.

निदान में भूल-चूक कई प्रकार की हो सकती हैं. नीचे देखें कुछ उदाहरण (यह पूरी सूची नहीं है):

  • लक्षण को अनदेखा करना: डिमेंशिया के आरम्भ में, जब लक्षण मंद होते हैं, तो आस-पास के लोग ही नहीं, डॉक्टर भी लक्षण यह कह कर टाल देते हैं कि यह तो बुढापे का सामान्य अंश है.
  • किसी (डिमेंशिया से भिन्न) रोग का निदान देना: यह खासकर तब होता है जब व्यक्ति की स्थिति और प्रारंभिक लक्षण आम स्थिति और लक्षण से अलग है. अधिकांश डिमेंशिया बड़ी उम्र में ही होता है, और शुरुआती चिह्न है याददाश्त की समस्या है. इसलिए अगर डिमेंशिया 40-50 या उससे भी कम उम्र में हो, या जब शुरू के लक्षण उत्तेजना या अनुचित व्यवहार हों तो डॉक्टर शायद डिमेंशिया को न पहचान पाएँ. वे शायद कह दें कि समस्या मनोवैज्ञानिक है, या स्ट्रेस का प्रभाव है.
  • रोग ऐसा है जो इलाज से सुधर सकता है (reversible/ treatable cause), पर निदान किसी इर्रिवर्सबिल डिमेंशिया (irreversible dementia) का हो: डिमेंशिया के लक्षण कई कारण से पैदा हो सकते हैं. इन में ऐसे कारण भी हैं जो इलाज से ठीक हो सकते हैं, जैसे कि अवसाद (depression), थाइरोइड हार्मोन में कमी (hypothyroidism), कुछ प्रकार के संक्रमण (infections), और विटामिन B12 की कमी (vitamin B12 deficiency), वगैरह. जांच ठीक से न हो या पूरे न हो तो डॉक्टर गलत निदान दे सकते है, और इस गलत निदान के कारण व्यक्ति का सही इलाज नहीं होगा. व्यक्ति की समस्या दवाई से ठीक हो सकती थी, पर क्योंकि निदान गलत है, व्यक्ति को तकलीफ होती रहेगी.
  • किस इर्रिवर्सबिल डिमेंशिया (irreversible dementia) के कारण लक्षण हैं, इस पहचान में गलती: डिमेंशिया रोग कई तरह के हैं. डॉक्टर शायद यह तो पहचान पाएँ कि व्यक्ति के लक्षण का कारण कोई ऐसे रोग है जो इर्रिवर्सबिल (irreversible) है, पर इन में से कौन सा irreversible dementia है, यह गलत पहचानें. यह समस्या पैदा कर सकता है, क्योंकि कुछ ऐसी दवाइयाँ है जो एक प्रकार के डिमेंशिया रोग में मदद करती हैं, पर अन्य प्रकार के डिमेंशिया रोग में काम नहीं करतीं, बल्कि नुकसान भी कर सकती हैं. एक उदाहरण है लुई बॉडी डिमेंशिया वाले व्यक्ति को गलती से अल्ज़ाइमर रोग का निदान मिलना.
  • डिमेंशिया लक्षण कई रोगों के कारण हों, पर सिर्फ एक कारण पहचाना जाए: ऐसे में व्यक्ति का इलाज भी उसी पहचाने गए डिमेंशिया रोग के लिए करा जाएगा. हो सकता है कि अन्य रोग दवाई से सुधर सकते थे, जिससे लक्षण में सुधार हो सकता था, पर क्योंकि निदान पूरा नहीं है, व्यक्ति सही इलाज से वंचित रहेगा. बढ़ती उम्र में अकसर लोगों को अनेक बीमारियां होती हैं; यह सोचना कि लक्षण सिर्फ एक ही कारण से हैं शायद गलत हो. समय के साथ, जब लक्षण बिगड़ते हैं, तब भी यह गलती हो सकती है–शायद लक्षण किसी अन्य रोग के कारण बिगड रहे हों पर ये रोग इसलिए न पहचाने जाएँ क्योंकि डॉक्टर और परिवार यह सोचते रहें कि बिगड़ती हालत सब पहले के उस एक रोग के ही कारण हैं.

व्यक्ति की जांच ठीक तरह से हो, और निदान पूरा और सही हो, इसके लिए परिवार वालों को सक्रिय रहना होगा. उन्हें डिमेंशिया के लक्षण और पैदा करने वाले रोगों के बारे में जानकारी होनी चाहिए, और जांच के समय सतर्क रहना चाहिए, और कुछ संदेह हो तो डॉक्टर से प्रश्न पूछने में हिचकना नहीं चाहिए. डॉक्टर के निदान करने के तरीके से, या निर्णय से संतोष न हो तो अन्य डॉक्टर से सलाह कर लेनी चाहिए. पर ध्यान रखें, निदान सिर्फ डॉक्टर से करवाएं, खुद न सोच लें कि यह तो डिमेंशिया ही है, और डिमेंशिया लाइलाज है तो डॉक्टर के पास जाने के कोई ज़रूरत नहीं.

निदान में दिक्कतें और गल्तियाँ किस प्रकार की हो सकती हैं, इस पर इस पृष्ठ के अँग्रेज़ी संस्करण पर अधिक विस्तार से चर्चा है: लिंक नीचे “इन्हें भी देखें” सेक्शन में है

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निदान के बाद (After the diagnosis)

डिमेंशिया का निदान व्यक्ति और परिवार को हिला कर रख देता है, पर सही परामर्श के और समर्थन के साथ, व्यक्ति और परिवार सामान्य जिंदगी बिताने की कोशिश कर सकते हैं. डिमेंशिया है, इसका मतलब यह नहीं कि व्यक्ति अब कुछ नहीं कर पायेगा–सिर्फ करने के तरीके बदलेंगे औद कुछ सीमायें होंगी, जिन को समझने से व्यक्ति और परिवार अपनी जिंदगी उसके अनुरूप बदल सकते हैं. उचित जानकारी प्राप्त करके और परामर्श प्राप्त करके निदान के साथ समन्वय किया जा सकता है, और आगे की ज़िंदगी नियोजित करी जा सकती है. कुछ डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्तियों ने अपनी ज़िंदगी के बारे में विस्तार से लिखा है, और कुछ ने निदान के प्रति अपनी प्रतिक्रिया का वर्णन भी करा है. निदान से समन्वय कैसे करें, इस पर कुछ पत्रिकाएँ भी हैं. अधिक चर्चा के लिए इस पृष्ठ के अँग्रेज़ी संस्करण को देखें: लिंक नीचे “इन्हें भी देखें” सेक्शन में है.

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उपचार, शोध (Treatment and research)

फिलहाल अधिकांश डिमेंशिया के रोग लाइलाज हैं, पर कुछ दवाइयां हैं जो लक्षणों में आराम पंहुच सकता है. इस विषय पर लिंक के लिए इस पृष्ठ के अँग्रेज़ी संस्करण को देखें: लिंक नीचे “इन्हें भी देखें” सेक्शन में है.

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डिमेंशिया का फैलाव और होने की संभावना (Prevalence and risk factors)

डिमेंशिया से बचाव कैसे हो, और इसका इलाज कैसे हो, यह शोध का एक मुख्य विषय है, और इस विषय पर लिंक के लिए इस पृष्ठ के अँग्रेज़ी संस्करण को देखें: लिंक नीचे “इन्हें भी देखें” सेक्शन में है.

डिमेंशिया इंडिया रिपोर्ट (Dementia India Report 2010) के अनुसार डिमेंशिया की संभावना बढ़ने के दो किस्म के कारक हैं: (क) ऐसे कारक जिन को हम बदल नहीं सकते (Non-modifiable risk factors), जैसे कि उम्र, कुछ जीन, हमारे परिवार में अन्य लोगों की बीमारियों का इतिहास, इत्यादि, और (ख) ऐसे कारक जिन्हें हम अपनी जीवन शैली में परिवर्तन करके बदल सकते हैं, जैसे कि मोटापा कम करना, पौष्टिक भोजन का सेवन, धूम्रपान न करना, शराब का सेवन न करना, उच्च रक्तचाप (hypertension) और मधुमेह (शूगर, diabetes) जैसी बीमारियों से बचे रहना.

कुछ ऐसी बीमारियाँ हैं जिन का डिमेंशिया के साथ सम्बन्ध है, और जिन के होने पर डिमेंशिया की संभावना ज्यादा होती है. पार्किन्सन रोग से ग्रस्त व्यक्तियों में आगे जाकर करीब एक-तिहाई (1/3) व्यक्तियों में डिमेंशिया हो सकता है. स्ट्रोक के बाद करीब बीस प्रतिशत लोगों को डिमेंशिया हो जाता है, अवसाद (डिप्रेशन) और डिमेंशिया में सम्बन्ध है, और ये दोनों अकसर साथ साथ पाए जाते हैं, हलाकि इन के बीच यह सम्बन्ध किस प्रकार का है, इस पर अभी रिसर्च चल रहा है. इन रोगों पर, और इन के डिमेंशिया के साथ के सम्बन्ध पर अधिक जानकारी के लिए नीचे दिए लिंक देखें.

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बचाव (risk reduction)

वर्तमान जानकारी के अनुसार हम डिमेंशिया के सब संभव कारणों से बच पाएँ, ऐसा अभी कोई रास्ता नहीं है. इसलिए हमें अपना ध्यान डिमेंशिया के कारक को कम करने में लगाना चाहिए. उदाहरणतः, हम अगर अपना रक्तचाप सही रखें, तो संवहनी डिमेंशिया की सम्भावना कम कर सकते हैं. डॉक्टरों का मानना है कि स्वस्थ जीवन शैली अपनाने से हम डिमेंशिया होने की संभावना कम कर सकते हैं. इसमें शामिल है:

  • अपने वज़न का नियंत्रण, पौष्टिक भोजन लें, अच्छी मात्रा में ताज़े फल और सब्जी खाएं
  • नियमित व्यायाम करें
  • मानसिक रूप से सक्रिय रहें(जैसे कि नई चीज़ें सीखते रहें)
  • उचित कदम लेकर ह्रदय रोग की संभावना कम करें
  • मेल-जोल और दोस्तियां बनाए रखें

डिमेंशिया की संभावना कम करने के लिए हम क्या कर सकते हैं, यह समझने और याद रखने के लिए एक उपयोगी मंत्र है: “What is good for your heart is good for your brain”. जो कदम स्वस्थ हृदय के लिए फायदेमंद हैं, वे स्वस्थ दिमाग के लिए भी अच्छे हैं. इसका मतलब यह नहीं कि डिमेंशिया होगा ही नहीं, पर स्वस्थ ह्रदय के लिए अपनाई जीवन शैली से डिमेंशिया की संभावना कुछ हद तक कम होगी. (यह ज़रूर याद रखें कि डिमेंशिया से पूरी तरह बचे रहने का कोई तरीका नहीं है)

और हाँ, सर को चोट से बचाए रखें 🙂 (सर पर गंभीर चोट से भी डिमेंशिया हो सकता है)

डिमेंशिया की संभावना कम कैसे करें, इस विषय पर अधिक चर्चा के लिये इस पृष्ठ के अँग्रेज़ी संस्करण को देखें: लिंक नीचे “इन्हें भी देखें” सेक्शन में है.

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आनुवंशिकी (यदि किसी करीबी रिश्तेदार को डिमेंशिया हो)(Genetics risk if close relatives have dementia)

घर में नज़दीकी रिश्तेदार में डिमेंशिया देखने पर घबराहट हो सकती है कि क्या डिमेंशिया अनुवांशिक है? फिलहाल डिमेंशिया के अनेक रोगों की आनुवंशिकी समझने के लिए शोध (रिसर्च) जोरों से चल रहा है. इस विषय पर लिंक्स और कुछ चर्चा और रिपोर्ट से लिए देखें हमारे इस पृष्ठ के अँग्रेज़ी संस्करण पर–लिंक नीचे “इन्हें भी देखें” सेक्शन में है.

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इन्हें भी देखें

पृष्ठ पर जिस रिपोर्ट का ज़िक्र है: डिमेंशिया इंडिया रिपोर्ट (Dementia India Report 2010)(PDF file)

हिंदी पृष्ठ, इसी साईट से:

डिमेंशिया के लक्षण किन रोगों के कारण हो सकते हैं, इसके लिए देखें:डिमेंशिया किन रोगों के कारण होता है

डिमेंशिया से सम्बंधित अन्य रोगों पर हिंदी में विस्तृत पृष्ट देखें:

इस विषय पर हिंदी सामग्री, कुछ अन्य साईट पर: यह याद रखें कि इन में से कई लेख अन्य देश में रहने वालों के लिए बनाए गए हैं, और इनमें कई सेवाओं और सपोर्ट संबंधी बातें, कानूनी बातें, इत्यादि, भारत में लागू नहीं होंगी.

इस पृष्ठ का नवीनतम अँग्रेज़ी संस्करण यहाँ उपलब्ध है: Diagnosis, Treatment, Prevention. अंग्रेज़ी पृष्ठ पर आपको विषय पर अधिक सामयिक जानकारी मिल सकती है. कई उपयोगी अँग्रेज़ी लेखों, संस्थाओं और फ़ोरम इत्यादि के लिंक भी हो सकते हैं. कुछ खास उन्नत और प्रासंगिक विषयों पर विस्तृत चर्चा भी हो सकती है. अन्य विडियो, लेखों और ब्लॉग के लिंक, और उपयोगी पुस्तकों के नाम भी हो सकते हैं. इस अँग्रेज़ी पृष्ठ पर डिमेंशिया से बचाव के लिए, और विभिन्न डिमेंशिया रोगों के निदान और उपचार के लिए अनेक उपयोगी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और अँग्रेज़ी वेबसाइट पर जानकारी है.

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