दूसरे शहर या देश से देखभाल में ज़िम्मेदारी बांटना (Long-Distance Caregiving for Dementia Patients in India)

कभी कभी डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल का इंतजाम दूसरे शहर या देश से संभालना होता है

देखभाल करने वाले क्या कर सकते हैं:  नियमित तौर पर व्यक्ति की स्थिति को समझें, और देखभाल जिस शहर में हो रही है, वहाँ क्या सेवाएँ और सुविधाएँ उपलब्ध हैं, उनके बारे में जानें. ऐसा इंतजाम करें जिससे व्यक्ति की देखभाल भी हो, और देखभाल पर नज़र भी रहे, और अगर एक व्यवस्था में गड़बड़ हो तो अन्य व्यवस्था का इस्तेमाल हो. निरंतर देखभाल की जानकारी प्राप्त करें, ताकि कुछ भी गड़बड़ हो तो आप तुरंत कोई दूसरा उपाय दूर से ही लागू कर सकें. इमर्जेंसी के लिए तैयार रहें. उस शहर में रहते हुए अपने रिश्तेदार और मित्रों से सम्पर्क में रहें, और उनका समर्थन प्राप्त करें.

जब डिमेंशिया (मनोभ्रंश) से ग्रस्त व्यक्ति एक शहर में हो, और परिवार के सदस्य दूसरे शहरों में या दूसरे देशों में, तो देखभाल एक चुनौती बन जाती है. इस स्थिति पर चर्चा और टिप्स कई नामों से होती है, जैसे कि long-distance caregiving, remote caregiving, और overseas caregiving. दूरी के कारण इंतजाम करना मुश्किल होता है, स्थिति को समझने में भी मुश्किल है, और किसी समस्या पर शीघ्र प्रतिक्रिया भी मुश्किल होती है. इस पृष्ठ पर दूर से देखभाल करने के विभिन्न पहलूओं पर चर्चा है, और सुझाव भी.

दूर से देखभाल करने के विभिन्न पहलू समझें

हो सकता है कि डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्तियों के बच्चे अपनी पढाई या करियर की वजह से दूसरे शहर या देश में रहते हों, और जब माँ-बाप को डिमेंशिया और उससे सम्बंधित समस्याएँ होने लगें, तब बच्चे आकर उनके साथ न रह पाएँ क्योंकि अब उनकी अपनी ज़िम्मेदारियाँ हैं, अपने बच्चे हैं, और सब कुछ उखाड कर माँ-बाप के साथ फिर से रहना बहुत कठिन हो. ऐसे में उन्हें दूर से ही स्थिति समझनी होती है और देखभाल करनी होती है.

दूर रहकर देखभाल करने के लिए जरूरी है कि व्यक्ति का डिमेंशिया किस स्टेज पर है, यह समझें. यह जानें कि व्यक्ति क्या कर पा रहे हैं, क्या नहीं, और किस किस तरह की दिक्कतें हो रही हैं. व्यक्ति का मूड कैसा रहता है. यह सोचें और समझें कि देखभाल कितनी चाहिएगी, किन कामों में चाहिए, समर्थन और सेवाएं कैसी होनी चाहियें.

देखभाल की प्लान बनाने के लिए व्यक्ति के आसपास, उसी शहर में एक शुभचिंतकों की टीम की जरूरत है, जिस में ऐसे लोग हों जो मदद करने के लिए, या देखभाल पर नज़र रखने के लिए तैयार हों. देखभाल एक दो दिन की बात नहीं है, यह तो महीनों और सालों चलेगी, और इसलिए इंतजाम अच्छा होना चाहिए. कभी भी समस्या बढ़ सकती है, कोई एमरजेंसी हो सकती है, इसलिए देखभाल के इंतजाम करते हुए इसके बारे में भी सोचना होता है. कुछ हादसा हो तो तुरंत कुछ कर पाएँ, इसके लिए संपर्क हमेशा रहना चाहिए.

डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की दूर से देखभाल करना अन्य रोगियों की देखभाल से फ़र्क इसलिए है क्योंकि इस स्थिति में व्यक्ति अपनी हालत के बारे में न तो ठीक बता पाते हैं, न सोच पाते हैं. उन्हें खुद ही नहीं पता होता कि क्या हो रहा है. आप फोन करें, और वे कह भी दें कि वे ठीक हैं तो आप उनके कहने पर नहीं जा सकते. और अगर वे आसपास की चीज़ों या लोगों से घबरा गए या अपने अंदर में घुसने लगे या उत्तेजित हो गए, तो उन्हें इससे उभारना दूर से मुमकिन नहीं है.

भारत में रहने वाले किसी डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति के दूर से देखभाल करना तो और भी चुनौती का काम है. दूर की देखभाल के कोई भी व्यवस्था उस शहर में मौजूद सेवाओं और संस्थानों पर निर्भर होती हैं, पर भारत में ऐसे साधन बहुत ही कम हैं. अन्य समर्थक सेवाएँ, जैसे कि अस्पताल और पुलिस भी डिमेंशिया के समर्थन में पीछे हैं, और सभी जगह डिमेंशिया की जानकारी इतनी कम है कि चाहते हों तब भी लोग ठीक से व्यक्ति की सहायता नहीं कर पाते. समाज का मानना है कि वृद्ध लोगों को तो अपने परिवारों के साथ रहना चाहिए, और उनकी देखभाल उनके बच्चों को या रिश्तेदारों को करनी चाहिए, इसलिए अधिक संस्थाओं और सेवाओं की जरूरत नहीं है.

पृष्ठ के अन्य सेक्शन में फोकस भारत में रहने वाले डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्तियों की दूर से देखभाल पर है.

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दूर से देखभाल के संभावित परिस्थितियाँ

कई ऐसी परिस्थितियां हैं जिन में भारत में रह रहे डिमेंशिया वाले व्यक्ति की देखभाल किसी दूसरे शहर या देश से संभालने की जरूरत पड़े. ऐसी कुछ मुख्य परिस्थितियाँ:

  • परिवार का कोई भी सदस्य भारत में डिमेंशिया व्यक्ति के साथ पूरे वक्त नहीं रह रहा है.
    • कोई भी परिवार वाले व्यक्ति के साथ नहीं रह रहा है. देखभाल पूरी तरह दूर से संभाली जा रही है. इस कार्य के लिए परिवार वाले व्यक्ति के शहर में मौजूद पेशेवर सहायक और सहायक सेवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं. भारत में ऐसी स्थिति बहुत कम देखने को मिलती है क्योंकि ऐसा इंतजाम संतोषजनक तरह से करना बहुत मुश्किल है. शुरू की अवस्था में तो कुछ परिवार यह करने की कोशिश करते हैं, हालाँकि इसमें खतरा है. पर बाद की डिमेंशिया अवस्था में यह और भी मुश्किल है.
    • व्यक्ति वैसे तो भारत में अकेले रह रहे हैं, पर परिवार वाले बारी बारी से भारत आकर व्यक्ति के देखभाल का कार्य भार उठाते हैं. वे इस बात का ध्यान रखते हैं कि आपस में उनका ठीक से इंतजाम हो, ताकि किसी भी वक्त व्यक्ति के पास कम से कम एक परिवार वाला रह रहा हो.
  • व्यक्ति भारत में किसी परिवार वाले के साथ हैं. यह शायद उनका बेटा/ बेटी हो, या पति/ पत्नी. अन्य परिवार वाले दूर रहते हैं, पर दूर से योगदान करके देखभाल में मदद करने की कोशिश करते हैं. दूर से देखभाल करने वाले परिस्थितियों में यह सबसे आम परिस्थिति है.

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भारत में डिमेंशिया और देखभाल की सच्चाई जानें

अगर आप भारत के बाहर रहते हैं तो मुमकिन है कि भारत में डिमेंशिया और संबंधी देखभाल के सिस्टम के बारे में आप ज्यादा न जानते हों. कई अन्य देशों में डिमेंशिया की जानकारी व्याप्त है, देखभाल पर चर्चा खुल कर होती है, और समर्थक सेवाएं ज्यादा हैं.

उदाहरण के तौर पर, यदि अमेरिका में डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति भटक जाए (when a patient wanders, goes missing, or gets lost) तो वहाँ की पुलिस तुरंत व्यापक खोज शुरू कर देती हैं, जिस में हेलिकॉप्टर का और टीवी का इस्तेमाल भी शामिल होता है. वहाँ व्यक्ति “ब्रेसलेट” (bracelet) भी पहनते हैं जिन पर लिखा होता है कि व्यक्ति के मिलने पर किस से सम्पर्क करें. सब लोग जानते हैं कि कोई कंफ्यूसड बुजुर्ग नज़र आये को शायद वह भटका हुआ डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति है, और वे पुलिस को सूचित कर देते हैं. पर भारत में पुलिस इतने तुरंत और व्यापक तौर से खोज नहीं करती, न ही ब्रेसलेट का प्रयोग प्रचलित है, और न ही लोग भटकते हुए व्यक्ति के प्रति इतने सतर्क हैं

आप अगर भारत से बाहर रहते हैं, तो यह जरूरी है कि भारत में डिमेंशिया की जानकारी कितनी है, और देखभाल को कितना समझा जाता है, इसके बारे में समझें, वरना आप जो सोचेंगे या इंतजाम करना चाहेंगे वह यहाँ फिट नहीं होगा और आपका अन्य परिवार वालों से झगड़ा भी हो सकता है.

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भारत में उपयोगी संस्थाओं के बारे में जानें

भारत से बाहर रहते हों तो यहाँ उपलब्ध सेवाओं के बारे में पता चलाना आसान नहीं है.

ऑनलाइन उपलब्ध जानकारी अधिकतर अप-टू-डेट नहीं होती है. कई स्वयंसेवक संस्थाएं इन्टरनेट और कंप्यूटर के बारे में अधिक नहीं जानतीं, और उनका शायद कोई वेबसाइट न हो. अन्य संस्थाएं कंसल्टेंट की मदद से एक बार वेबसाइट तो बना लेती हैं, पर उस को नियमित रूप से अपडेट नहीं करतीं, और उन पर सालों साल वही पड़ा रहता है जो शुरू में डाला गया था. उदाहरणतः, हो सकता है किसी ने 2005 में एक विस्तृत साईट बनाया जिस में अनेक सेवाओं के बारे में लिखा है. तब से सेवाएँ भी कम हो गयी हैं, टाइमिंग बदल गए हैं, रेट बदल गए हैं, फोन नंबर बदल गए हैं, ईमेल बदल गए हैं, पर साईट पर अब भी पुरानी जानकारी ही पडी है. इसलिए आप दूर से यह नहीं सोच सकते कि इन्टरनेट पर है तो ठीक होगा, आपको फोन करके पता चलाना होगा, और शायद शहर में कुछ दोस्तों से कहना होगा कि दिए गए पते पर जाकर असलियत का पता करें.

संस्थाओं की सही और वर्तमान जानकारी उनके वेबसाइट के मुकाबले कई बार “Ask me” जैसी सेवाओं पर ज्यादा ठीक होती है! कुछ ऐसी संस्थाएं और समुदाय भी हैं जिनसे जानकारी मिल सकती है, और हेल्पलाइन भी हैं. कुछ जानकारी ऐसी संस्थाओं से भी मिल सकती है जो वृद्धों के क्षेत्र में पूरे भारत में काम कर रहीं हैं. एल्डर हेल्प लाइन और पुलिस हेल्प लाइन से भी शायद मदद मिल पाए. प्राप्त जानकारी की एक से ज्यादा स्रोत से पुष्टि करें.

आपने जो जानकारी इन्टरनेट या फोन करके इकट्ठा करी है, वह ठीक है या नहीं, यह चेक करने के लिए भारत में रहने वाले मित्रों और सहकर्मियों से मदद मांगें. आपके माँ-बाप के दोस्त और सहकर्मी और उनके बच्चों से भी शायद मदद मिल पाए. पुराने पड़ोसी भी काम आ सकते हैं. अपनी पुरानी एड्रेस बुक देखें, पुराने स्कूल/ कालेज के फोटो देखें, माँ-बाप के आफिस की पार्टी के फोटो देखें, और पुरानी जान-पहचान वालों से और दोस्तों से सम्पर्क करें. आप सब जानकारी बाँट कर, और अन्य तरीकों से एक दूसरे की मदद कर सकते हैं.

टीम के तरह काम करें, तो देखभाल ज्यादा आसान होगी.

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दूर से देखभाल का इंतजाम करें और उसे संभालें

देखभाल की प्लान बनाने के लिए, और देखभाल सुचारु ढंग से करने के लिए शुरू में स्थिति को पूरी तरह समझना होगा, और नियमित रूप से स्थिति के समझते रहना होगा. क्या जानना चाहिए, क्या चेक करते रहना चाहिए, इसकी चेकलिस्ट (सूची) बनाएँ. ऊपर के सेक्शन और लिंक में ऐसी सूची के लिए कुछ सुझाव हैं, और आप इनमें अपनी स्थिति और समझ के हिसाब से जो जरूरत हो, जोड़ें. कुछ जानकारी प्राप्त करना ज्यादा कठिन है, खास कर क्योंकि आप दूर रहते हैं. लोग कुछ बातों का बुरा मान सकते हैं, इसलिए शान्ति और धैर्य से काम लें.

एक आम समस्या यह है कि माँ-बाप अपने पैसों और निवेश (इन्वेस्टमेंट) के बारे में बच्चों से बात नहीं करते. टीवी पर इतने सीरियल में बच्चों को लालची दिखाया जाता है कि कई लोग सोचते हैं कि बच्चे अगर पैसे के बारे में पूछ रहे हैं तो उनकी नीयत में खोट है, वे शायद मकान हड़प करने की कोशिश करेंगे या सारे पैसे पर हाथ मार लेंगे. अगर वे औरों से इसका जिक्र करें कि आप पैसों के बारे में पूछ रहे थे, तो और लोग भी आपको शक की निगाह से देख सकते हैं. डिमेंशिया के निदान के बारे में कहें, तो लोग सोचते हैं कि माँ-बाप को पागल करार कर, आप उनके पैसे के पीछे हैं. पर सच तो यह है कि पैसे संभालने तो हैं, टैक्स भी भरना है, वगैरह, और व्यक्ति को तो याद भी नहीं होगा कि यह कैसे करना होता है. कुछ केस में व्यक्ति से मीठी बातें करके कुछ चालबाज उनका मकान या पैसे ले लेते हैं या किसी फर्जी दान की स्कीम में सब कुछ लगवा देते हैं. लॉकर की चाबी ढूँढें, तो पता चलता है कि कोई लॉकर भी खाली करवा चुका है.

क्योंकि डिमेंशिया की समस्याओं को समाज नहीं पहचानता, व्यक्ति पर सामान्य बने रहने का दबाव बना रहता है, व्यक्ति इस दबाव में अपनी दिक्कतें छुपाते हैं और गलत निर्णय ले सकते हैं, जिससे उन्हें नुकसान हो. अकेले रहते व्यक्ति, या वृद्ध दम्पति में एक जने को डिमेंशिया हो तो इस तरह की प्रॉब्लम ज्यादा होती हैं.

यह भी ध्यान रखें कि व्यक्ति को बच्चों पर शक हो सकता है. ऐसे कई टीवी सीरियल हैं जिन में लालची बच्चे माँ-बाप के पैसे हड़प करने की कोशिश में लगे रहते हैं, और समाज में भी ऐसे कई धारणाएं हैं कि बच्चे लाचार माँ-बाप का शोषण करते हैं. अपने जान-पहचान के विश्वसनीय लोगों को स्थिति समझाएं, और उनसे सहायता और परामर्श लें. धीरे धीरे, मदद करने के साथ साथ भरोसा भी बनाए रखे.

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यदि व्यक्ति परिवार वालों के साथ न रह रहे हों, ऐसी स्थिति के भिन्न भिन्न रहने के इंतजाम

रहने के कई इंतजाम किये जा सकते हैं, पर भारत में डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति बिलकुल अकेले रह पाए, यह बहुत ही मुश्किल है. डिमेंशिया चाहे शुरुआती चरण में हो, तब भी व्यक्ति का अकेला रहना खतरनाक है. अकेले रहते व्यक्ति के केस में होने वाली समस्याओं के कुछ उदाहरण:

  • व्यक्तियों को मालूम ही नहीं चलेगा कि अब वे अकेले रहने की स्थिति में नहीं हैं, या उन्हें मदद लेनी चाहिए. फोन पर वे कुछ कह नहीं सकेंगे. यह उम्मीद करना गलत होगा कि व्यक्ति अपनी स्थिति का ठीक वर्णन कर पाएंगे.
  • व्यक्ति अगर कुछ गलत निर्णय लें, जैसे कि अपना सारा पैसा और अपना घर किसी अनजान आदमी को दे देना, तो यह बात जानने वाला, या व्यक्ति को रोकने वाला कोई पास नहीं होगा, न ही कोई परिवार वालों को पता चलेगा.
  • व्यक्ति घर से बाहर निकलें या खो जाएँ, यह भी नहीं पता चलेगा. ढूँढना शुरू करना चाहिए, यह भी किसी को नहीं पता चलेगा.
  • पड़ोसी और अन्य लोग नहीं समझते कि सहायता कैसे करें, क्या करें, क्या न करें. पुलिस और अस्पताल वाले भी ऐसे अकेले रहते व्यक्ति की इतनी सहायता नहीं कर पाते कि व्यक्ति अकेले रहता रहे और उसे कोई हानि न पहुंचाए . भारत में आम धारणा यही है कि अगर व्यक्ति को कोई दिक्कत है, तो परिवार वाले उनके साथ रह कर उनकी देखभाल करेंगे, व्यक्ति को अकेला नहीं रहना पड़ेगा.

दूर रहते हुए अगर आप व्यक्ति की देखभाल का इंतजाम कर रहे हैं, तब भी व्यक्ति बिलकुल अकेला रहे, ऐसा करने से पहले बहुत अच्छी तरह से सोच लें, क्योंकि इसमें बहुत खतरा है. किसी भी तरह के अकेले रहने को कम करने की कोशिश करें.

डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति सिर्फ नौकरों के सहारे किसी शहर में अकेला रहे, यह भी मुश्किल है. अगर व्यक्ति के लिए आप विश्वसनीय नौकर और सहायक रखें ताकि व्यक्ति की हर जरूरत का दिन रात, पूरे वक्त कोई न कोई खयाल रख रहा हो, तब भी आपको इस व्यवस्था पर नज़र रखने के लिए दोस्तों या रिश्तेदारों की मदद चाहियेगी. बिना निगरानी के कर्मचारियों पर व्यक्ति की देखभाल छोडने में खतरा है.

कुछ सुझाव:

  • व्यक्ति की देखभाल के लिए एक से ज्यादा सहायक लगाएं, ताकि अगर एक काम पर न आये तो दूसरा मौजूद हो, और व्यक्ति बिना सहायता के न रहे. दवाई टाइम पर मिलती रहे, इसकी खास तौर से निगरानी होनी चाहिए, क्योंकि व्यक्ति ठीक दवाई ठीक समय पर लेंगे, इस पर भरोसा करना अनुचित है. कभी कभी व्यक्ति भूल जाते हैं कि उन्हें कोई बीमारी है (जैसे कि उक्त रक्तचाप) और इसलिए दवाई फेंक देते हैं.
  • घर के अन्य कामों के लिए भी भरोसे वाले नौकर रखें, जैसे कि ड्राईवर, बावर्ची (कुक), घर में काम वाली बाई, वगैरह.
  • व्यक्ति को समर्थक स्कीम में एनरोल करें, जैसे कि होम नर्सिंग या डॉक्टर-आन-व्हीलस. ऐसे सिस्टम बनाएँ कि एमरजेंसी में तुरंत सहायता मिले. डॉक्टर के पास कभी भी जाना पड़े, या एमरजेंसी हो, तो व्यक्ति के अपडेटड मेडिकल रिकॉर्ड आसानी से मिलने चाहियें. व्यवस्था सोचते वक्त यह याद रखें कि व्यक्ति की तबीयत ठीक न भी हो तो उन्हें शायद ख़याल न आये कि अब डॉक्टर के पास जाने की जरूरत है.
  • व्यवस्था ऐसी हो कि अगर कोई काम करने वाला ड्यूटी पर नहीं आये तो दूसरा काम करने वाला वह काम करेगा, और बिना व्यक्ति के बुलाये आएगा(क्योंकि व्यक्ति शायद बुला न पाएँ). सुरक्षा के लिए सभी काम करने वालों के पहचान पत्र और अन्य जानकारी आपके पास रहनी चाहिए. सब काम करने वालों के ई.डी (I.D.) और पते की कॉपी जरूर रखें. पुलिस वेरीफिकेशन हो पाए तो कराएं.
  • सुरक्षा का ख़याल रखें. छोटी मोटी चोरी से बचना तो मुश्किल है, पर घर को ऐसे रखें कि घर में बड़ी चोरी के लायक कुछ नज़र न आये, और किसी को चोरी करने का लालच न हो.
  • पास के पुलिस स्टेशन में इत्तला कर दें कि इस घर में कोई बुज़ुर्ग अकेले, नौकरों के भरोसे रह रहा है.
  • पड़ोसियों से कहें कि वे भी नज़र रखें, और कुछ गड़बड़ होने पर सहायता करें और आपको भी तुरंत बता दें
  • कई बार फोन करें (कई दूर रहने वाले दिन में दो-तीन बार फोन करते हैं). क्या हो रहा है, क्या समस्या है, इसकी खबर लेते रहे, और व्यक्ति से बात कर सकें तो करें. जरूरत हो तो व्यक्ति को फोन पर आश्वासन दें. आप वीडियो स्काइप का भी इस्तेमाल कर सकते हैं, जिससे घर को और व्यक्ति को देख सकेंगे.
  • शहर में रह रहे दोस्तों और रिश्तेदारों से कहें कि वे घर आकर देख जाया करें.
  • इस स्थिति में व्यक्ति पर पैसे का काम छोडना मुश्किल पैदा कर सकता है. व्यक्ति के हाथ में ज्यादा रकम न आने दें, क्योंकि व्यक्ति उसे खो सकते हैं, और काम करने वालों को भी लालच आ सकता है. इंतजाम ऐसा करें कि खर्च संभालने का काम आप दूर से ही कर पाएँ. बिल ऑनलाइन भरें, और किसी भी वक्त रुपये-पैसे का काम पूरी तरह से लेने के लिए तैयार रहें.

अगर आप ऐसी कंपनी में काम करते हैं जिसका उस शहर में आफिस है, तो लोकल ब्रांच वालों से भी नज़र रखने के लिए मदद मांग सकते हैं.

जितनी बार हो सके, खुद आकर देखें कि व्यक्ति की देखभाल कैसी हो रही है, और अब व्यक्ति पर डिमेंशिया का कितना और किस प्रकार का असर है. अगर आपके भाई-बहन हैं जो आपकी तरह दूर से देखभाल का काम बाँट रहे हैं, तो आप सब बारी बारी आ कर व्यक्ति की स्थिति का अंदाज़ा लगाएं और व्यक्ति के साथ कुछ देर रहें ताकि व्यक्ति कम देर अकेले रहे.

डिमेंशिया के बढ़ने पर इस तरह सहायकों के साथ अकेले छोड़ने से अच्छा होगा किसी उपयुक्त assisted living facility में व्यक्ति को दाखिल करना. इसके बारे में पता चलायें और सोचें.

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कुछ विषय, जिन पर शायद निर्णय लेना हो

दूर से देखभाल का काम बांटने या नियोजित करने वाले अकसर इस बात से दुःखी रहते हैं कि वे अपने माँ-बाप के बुढापे में उनकी पूरी तरह से देखभाल नहीं कर पा रहे हैं. उन्हें लगता है कि वे अपना फ़र्ज़ पूरा नहीं कर रहे हैं.

दूर रहने वाले बच्चे अपना घर उजाड कर वापस माँ-बाप के साथ रहें, यह आसान नहीं है, खास-तौर से अगर वे दूसरे देश में रह रहे हैं. बच्चे स्कूल में हैं, उन्हें वहाँ की प्रणाली से पढ़ाई कतरनी है, करियर वहीं जमा है, सास-ससुर और अन्य रिश्तेदारों की देखभाल का भी कम हो सकता है, वगैरह, और सब कुछ छोड़ कर लंबे अरसे के लिए माँ-बाप के पास आना मुमकिन नहीं होता. न ही वे माँ-बाप से कह सकते हैं कि आप अब हमारे पास आ कर रहें, क्योंकि माँ-बाप इसके लिए राज़ी नहीं होते, और उनके लिए दूसेर शहर या देश में इस उम्र में एडजस्ट करना मुश्किल है. कभी कभी माँ-बाप को बुलाने का खर्चा भी बहुत होता है, क्योंकि बड़ी उम्र में इंश्योरंस नहीं मिलती. वैसे भी डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति जगह बदलने पर और अधिक दिक्कतें महसूस करते हैं.

दूसरे देश में रहने वाले बच्चे अकसर सोचते हैं कि क्या उन्हें देखभाल के लिए वापस भारत जाना चाहिए,या माँ-बाप को विदेश बुलाना चाहिए. इस विषय पर कई फोरम में चर्चा होती रहती है, और आप इन्हें देखकर औरों की राय जान सकते हैं.

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दूर से भारत में रह रहे व्यक्ति और देखभाल करने वालों की सहायता करें.

अगर व्यक्ति अकेले नहीं, बल्कि अन्य परिवार वालों के साथ रह रहे हैं तो आपके लिए दूर से देखभाल में मदद करना ज्यादा आसान होगा.

पहले उस स्थिति के बारे में चर्चा करें जिसमे डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति के साथ जो रह रहा है और अकेले देखभाल के लिए ज़िम्मेदार है, वह कोई बुज़ुर्ग है. जैसे कि, वृद्ध पति या पत्नी, या कोई भई बहन या अन्य रिश्तेदार. देखभाल कर्ता की घर में उपस्थिति के कुछ फायदे हैं…जैसे कि, अगर दिन की शिफ्ट का सहायक काम पर न आये, तो साथ रहने वाले कम से कम एजेंसी को फोन करके दूसरे सहायक की मांग तो कर सकते हैं. या वे पहचान सकते हैं कि डिमेंशिया वाले व्यक्ति की तबीयत ठीक नहीं लग रही और किसी को बुलाना चाहिए. पर वृद्ध देखभाल कर्ता खुद भी कमज़ोर हो सकते हैं और उनको भी गंभीर बीमारियाँ हो सकती हैं. देखभाल का काम शारीरिक और मानसिक रूप से थकाने वाला होता है. दूर रहते बच्चों को वृद्ध देखभाल कर्ता पर नज़र रखने के लिए और उनकी सहायता के लिए भी सिस्टम सेट करने होंगे. डिमेंशिया वाले व्यक्ति, और उनके वृद्ध देखभाल कर्ता, दोनों के लिए ही मेडिकल और अन्य सपोर्ट के लिए व्यवस्था होनी चाहिए. शायद दोनों को ही ऐसी सेवाओं में एनरोल करा लेना चाहिए जिन से घर बैठे सहायता मिल पाए, जैसे कि होम नर्सिंग स्कीम.

एक समस्या जो हो सकती है (और, अफसोस, अकसर होती भी है) वह यह कि वृद्ध देखभाल कर्ता बीमार पड़ जाते हैं या उन्हें स्ट्रो़क या दिल का दौरा पड़ जाता है, पर घर में साथ रह रहे डिमेंशिया वाले व्यक्ति को तो पता ही नहीं चलता कि कोई प्रॉब्लम है. बीमार देखभाल कर्ता की मदद के लिए कोई नहीं आता. डिमेंशिया वाला व्यक्ति भी, क्योंकि अब कोई निगरानी नहीं रख रहा, खुद को नुक्सान पंहुचा सकते हैं. निरंतर स्थिति देखते रहने से यह संभावना कम हो सकती है. जैसे कि, दिन में दो बार वीडियो काॅल हो. या कोई दिन-रात काम करने वाले भी हों घर में जो तुरंत मदद के लिए किसी को बुला पाएँ. आसपास वाले और रिश्तेदार भी ऐसी अनहोनी के लिए सतर्क रह सकते हैं और नियमित रूप से नज़र रख सकते हैं.

एक अन्य परिस्थिति यह है कि डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति भारत में आपके भाई या बहन या अन्य संबंधी के साथ रहते हैं, और आप दूसरे शहर या देश में हैं. इस स्थिति में आपका देखभाल संबंधी तनाव कम रहेगा पर अन्य समस्याएँ हो सकती हैं, जैसे कि काम और खर्च कैसे बातें, या देखभाल के तरीकों और निर्णयों पर मतभेद, मकान-ज़मीन को लेकर लड़ाई, वगैरह.

साथ रहने वाले देखभाल कर रहे और दूर रहने वाले भई बहन में अकसर कुछ मतभेद रहते हैं. उनकी परिस्थितियाँ और नज़रिए अलग होते हैं, और इसलिए दूर रहने वाले भई बहन को सुझाव देते वक्त खास ध्यान रखना होता है कि वे संवेदनशील रहें.

ध्यान रखें: आप शायद दूर रहते हुए भी खुद को देखभाल कर्ता समझते हों, पर अकसर व्यक्ति के साथ रह रहे परिवार जन दूर रहने वालों को देखभाल कर्ता नहीं मानते. उनके हिसाब से दूर रहने वाले कोई देखभाल के काम नहीं कर रहे हैं, और न ही वे रोज रोज की जिम्मेदारी और तनाव से घिरे हुए हैं, इसलिए दूर रहने वाले देखभाल कर्ता नहीं हैं. साथ रह रहे परिवारजन के साथ बात करते समय और उनकी मदद की कोशिश करते समय यह याद रखें कि साथ रहने पर कार्यभार और तनाव कहीं ज्यादा होता है, और आपके बात करने का तरीका ऐसा न हो कि उन्हें लगे आप निंदा या हस्तक्षेप कर रहे हैं. पुराने गीले-शिकवे भी आगे आ सकते हैं, और देह्भाल पर मतभेद भी. आप दूर से मदद करने की कोशिश करते समय ध्यान रखें कि आप ऐसे न बोलें जिससे साथ रहकर देखभाल करने वाले सोचें कि आप उनपर हुकूमत करने की या निंदा करने की कोशिश कर रहे हैं. मदद करने के कई तरीके हैं, जैसे कि जानकारी या सुझाव देना, कुछ काम अपने ऊपर ले लेना, भारत के ट्रिप लगाकर कुछ दिन कार्य भार संभालना, खर्च बांटना, इत्यादि– पर यह सब संवेदनशील तरह से करना होता है.

अगर परिवार वाले अनेक शहरों में बिखरे हों तो देखभाल पर चर्चा करना और उसका इंतजाम करना अधिक मुश्किल होता है, और अगर कुछ परिवार के सदस्य दूसरे देशों में हों तो देखभाल के काम को मिलकर करना और भी मुश्किल हो जाता है. भारत में रहने वाले भाई-बहन यह भी सोच सकते हैं कि आप तो अमीर देश में ऐशोआराम की निश्चिंत जिन्दगी बिता रहे हैं जबकि वे सारा काम कर रहे हैं. कुछ टिप्स:

  • भारत में रहने वाले रिश्तेदार शायद डिमेंशिया का निदान (diagnosis) न समझें या न स्वीकारें, या यह न समझें कि डिमेंशिया में देखभाल के विशेष तरीके होते है और सामान्य वृद्धों से बातचीत के तरीके काम नहीं करेंगे
  • सुझाव देने से पहले यह जरूर जानें कि भारत में देखभाल कर्ताओं की ट्रेनिंग के बहुत कम उपाय हैं, और सेवाएं भी बहुत कम हैं.
  • भारत में डिमेंशिया वाले परिवार के इर्द-गिर्द बहुत लोग हैं जो डिमेंशिया और देखभाल को नहीं समझते और दिन-रात ऐसे सुझाव देते रहते हैं जो स्थिति को और बिगाड़ देंगे. वे हर बात पर गलती भी निकालते रहते हैं. इससे भारत में रहकर देखभाल करने वालों पर निरंतर दबाव रहता है. अगर आप भारत के बाहर रहते हैं और फोन पर कुछ अलग बात कहते हैं, तो वह इन सब बातों के बीच छोटी सी रहती है, और देखभाल करने वाले लोग यही सोचेंगे के आप तो स्थिति में हैं नहीं और उसे समझते नहीं हैं, इसलिए आपके सुझाव पर गौर करने का कोई फायदा नहीं. रहना तो आसपास के लोगों के साथ है, तो उनकी बात ज्यादा मायने रखती है.
  • भारत में संस्थाएं और समर्थन अन्य देशों से इतना फ़र्क है कि दूर बैठे आप शायद कल्पना नहीं कर पायेंगे कि यहाँ देखभाल की सच्चाई क्या है. कुछ दिन भारत में रहें, खुद देखभाल करें, तो आपको अंदाज़ा पड़ जाएगा.

दूर से कैसे मदद करें, इसके लिए कुछ सुझाव:

  • भारत में देखभाल करने वाले अपने भाई-बहन या रिश्तेदारों को उपयोगी डिमेंशिया और देखभाल पर किताबें, DVD, और मैनुअल दें. उन्हें जो रोज रोज औरों की बातों का सामना करना पड़ता है, वे समस्याएं समझें और लोगों को क्या बताएं और कैसे बताएं, इस पर सुझाव दें.
  • ऐसे सहायक उपकरण जो भारत में आसानी से न मिलते हों, वे लाकर दें.
  • भारत में रहकर देखभाल करने वाले अपने परिवार के सदस्यों की बातों को शांत होकर, बिना टिप्पणी सुनें, ताकि उनका अकेलापन दूर हो और तनाव भी कम हो. अपने सुनने के ढंग को समर्थन वाला रखें
  • इस बात के लिए खासतौर से सतर्क रहें कि आपके सुझाव ऐसे न लगें जैसे कि आप गलती निकल रहे हैं. आप अब दूसरे सामाजिक वातावरण में हैं, और सुनने वाले तो यही सोचेंगे कि आप उनकी स्थिति नहीं समझते और ना ही समझने की कोशिश कर रहे हैं. दूरी और बढ़ेगी.

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इन्हें भी देखें…

हिंदी लेख, इसी साईट से:

दूर से देखभाल करने वाले अन्य परिवार वालों के साथ मिलजुल कर देखभाल संभालनी होती है. इस विषय पर विस्तार से चर्चा के लिए देखें: परिवार वालों के साथ मिलकर करें देखभाल .

हमारे अँग्रेज़ी साईट से कुछ लेख, जो भारत में देखभाल के संदर्भ में लिखे गए हैं:

कुछ उपयोगी इंटरव्यू:

  • माँ एक शहर में पिता की देखभाल कर रहीं है, और बच्चे दूसरे शहरों में रहते हैं, पर वे अनेक सेवाओं का इस्तेमाल कर, और माँ के पास बारी बारी से आकर देखभाल में हिस्सा लेते हैं और माँ को देखभाल अकेली करनी पड़े, यह नहीं होने देते: Our presence here makes a difference to her.
  • भाई-बहनों में माँ की देखभाल संबंधी निर्णयों को लेकर संघर्ष: Conflicts between siblings.
  • एक देखभाल कर्ता, जो दूसरे शहर से माँ की देखभाल को संभालते हैं, अपनी दिक्कतों के बारे में बात करते हैं: Siblings arrange remote care.
  • दूर से देखभाल मैनेज करना, टेक्नालॉजी और अनेक उपकरणों के इस्तेमाल से, और सब परिवार वालों से नियमित फोन कॉल और ई-मेल से: Long distance caregiving challenges and approach.

इस विषय पर उपलब्ध अधिकांश सामग्री अँग्रेज़ी में है, और अन्य देशों के संदर्भ में तैयार करी गयी है. पर अन्य देशों में डिमेंशिया के प्रति जागरूकता ज्यादा है, और सेवाएं और समर्थन भी ज्यादा है. इसलिए ये लेख पूरी तरह भारत में लागू नहीं होते. इन लेखों को भारत में कैसे इस्तेमाल करें, क्या लागू होगा, क्या बदलना या नकारना होगा, यह समझने के लिए कुछ उपयोगी लिंक: India’s cultural context and its impact on care और Apply available dementia/ caregiving material to the Indian context हैं.

इस पृष्ठ का नवीनतम अँग्रेज़ी संस्करण यहाँ उपलब्ध है: Long-Distance Caregiving for Dementia Patients in India. अंग्रेज़ी पृष्ठ पर आपको विषय पर अधिक सामयिक जानकारी मिल सकती है. कई उपयोगी अँग्रेज़ी लेखों, संस्थाओं और फ़ोरम इत्यादि के लिंक भी हो सकते हैं. कुछ खास उन्नत और प्रासंगिक विषयों पर विस्तृत चर्चा भी हो सकती है. अन्य विडियो, लेखों और ब्लॉग के लिंक, और उपयोगी पुस्तकों के नाम भी हो सकते हैं.

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