हिंदी फिल्मों में डिमेंशिया (Hindi movies depicting dementia)

वैसे तो हिंदी में हमेशा से वरिष्ठों की समस्याओं को दिखाया गया है, पर कुछ सालों से कुछ फिल्मों ने डिमेंशिया वाले व्यक्तियों को भी दिखाना शुरू किया है। डिमेंशिया के बारे में जानकारी प्राप्त करने के अवसर कम ही होते हैं और इसलिए कई दर्शक यह मान लेते हैं कि वे फिल्म में डिमेंशिया के बारे में जो देख रहे हैं (व्यवहार, समस्याएँ आदि) वह विश्वसनीय और सही है। वे यह भी सोच सकते हैं कि सभी डिमेंशिया संबंधी स्थितियां वैसी ही हैं जैसी उन्होंने फिल्म में देखी थीं। लेकिन फिल्में डाक्यूमेंट्री नहीं हैं, और वे दर्शकों को सभी प्रकार के डिमेंशिय और देखभाल स्थितियों की सही और व्यापक समझ प्रदान करने के लिए नहीं बनाई गई हैं।

इस पृष्ठ पर उन हिंदी फिल्मों को सूचीबद्ध करा गया है जहां एक मुख्य या महत्वपूर्ण चरित्र को डिमेंशिया है – चाहे उन्हें डिमेंशिया का निदान मिला है, या अस्पष्ट रूप से उनके संभावित डिमेंशिया का उल्लेख किया गया है। इस पृष्ठ पर प्रत्येक फिल्म का एक संक्षिप्त वर्णन दिया गया है ताकि पाठक यह जान सकें कि फिल्म में डिमेंशिया और देखभाल के कौन से पहलू शामिल हैं, और फिल्म का डिमेंशिया और देखभाल का चित्रण कितना विश्वसनीय है। पाठकों को यह जानने में भी मदद मिलेगी कि उस फिल्म के अन्य दर्शक डिमेंशिया के बारे में क्या धारणा बना सकते हैं। इस पृष्ठ पर उन फिल्मों को भी सूचीबद्ध करा गया जहां डिमेंशिया वाले व्यक्ति का रोल बहुत छोटा या सतही है (शायद केवल प्लाट में कोई जरूरी/ रोचक मोड़ देने के लिए) या जो फिल्म डिमेंशिया के बारे में पूरी तरह से भ्रामक हैं।

नीचे दी गई समीक्षाओं और टिप्पणियों में स्पॉइलर हैं ।

डिमेंशिया से संबंधित प्रमुख फिल्में (जों शायद अब भी देखने के लिए उपलब्ध हैं)

माई

माई 2013 में बनी एक पारिवारिक ड्रामा है, जिसमें आशा भोंसले ने अल्जाइमर रोग से पीड़ित एक माँ की भूमिका निभाई है, और पद्मिनी कोल्हापुरे उनकी बेटियों में से एक हैं। फिल्म पारिवारिक संघर्षों और नाटक के इर्द-गिर्द घूमती है, – जैसे कि किस भाई-बहन को माँ की देखभाल करनी चाहिए, और माई के बदले व्यवहार और उनकी स्थिति में बढ़ती समस्याएँ। फिल्म में अल्झाइमर में दिखने वाले कई तरह के बदले व्यवहार दिखाए गए हैं – जैसे भटकना, भ्रम, नौकरानी पर चोरी का आरोप लगाना । इनपर होने वाले सामान्य पारिवारिक प्रतिक्रियाएं भी दिखाए गए हैं। चिकित्सा कोण अच्छी तरह से दिखाया गया है और काफी पूर्ण है; हम देखते हैं कि डॉक्टर निदान के लिए उससे सवाल पूछ रहे हैं, और बेटी को यह भी बता रहे हैं कि आगे क्या-क्या हो सकता है। बेशक, डिमेंशिया चित्रण में कुछ शॉर्ट-कट हैं, लेकिन फिर यह एक फिल्म है, डाक्यूमेंट्री नहीं।

पारिवारिक ड्रामा का तत्व भाई-बहन के संघर्ष और देखभाल के बारे में नाराजगी के इर्द-गिर्द है, और दामाद और पोती द्वारा माई की उपस्थिति का विरोध करने की नाराजगी पर भी है। साथ ही लापरवाही के मुद्दे भी मौजूद हैं। पर माई की हालत में गिरावट बहुत तेजी से होती है, और दर्शकों और परिवार को स्थिति से तालमेल बिठाने का समय नहीं मिलता है, और फिल्म कई रोग-संबंधी कोणों को विकसित नहीं होने देती है। जहां फिल्म डिमेंशिया की चुनौतियों का चित्रण करने का एक अच्छा काम करती है, वहीं परिवार के दृष्टिकोण से यह आभास होता है कि इस स्थिति में और कुछ नहीं किया जा सकता था। परिवार वाले आपस में बातचीत करने या मुद्दों को हल करने या संकटों और समस्याओं को रोकने आदि की कोशिश नहीं करते हैं।

उपयोगिता/विश्वसनीयता पर नोट: फिल्म व्यवहार संबंधी चुनौतियों के प्रकारों और पारिवारिक स्थितियों और संघर्षों का एक उपयोगी चित्रण प्रदान करती है – कुछ परिवारों को ऐसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। परन्तु अगर कोई यह समझने की कोशिश कर रहा है कि डिमेंशिया वाले व्यक्ति की मदद कैसे की जाए, तो फिल्म परेशान करने वाली/भ्रामक/निराशाजनक हो सकती है, क्योंकि यह समस्याओं को नाटकीय रूप से प्रस्तुत करती है। फिल्म दर्शकों को यह सुझाव देने के लिए कोई संकेत या डेटा प्रदान नहीं करती है कि आपस में बातचीत बेहतर हो सकती है, और संघर्ष को कम करने और जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने के तरीके संभव हैं। फिल्म दर्शकों को गुमराह कर सकती है कि अल्जाइमर वाले व्यक्ति के साथ तालमेल बिठाने या उनकी मदद करने के लिए कुछ भी नहीं किया जा सकता है।

कैसे देखें (ऑक्टोबर 2022 को फिर से चेक किया गया): डीवीडी उपलब्ध है (उदाहरण के लिए, Amazon.in पर Opens in new window

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मैंने गाँधी को नहीं मारा

मैंने गाँधी को नहीं मारा (Maine Gandhi Ko Nahin Mara) यह समीक्षकों द्वारा प्रशंसित 2005 की एक फिल्म है जिसमें एक सामाजिक संदेश है (यह “नैतिक” सन्देश फिल्म के अंत में स्पष्ट हो जाता है)। मुख्य पात्र, एक सेवानिवृत्त हिंदी प्रोफेसर, उत्तम चौधरी (अनुपम खेर) हैं, और उन में डिमेंशिया शुरू होने लगता है। फिल्म उनके बदलते हुए व्यवहार और परिवार के सामने आने वाली चुनौतियों को दर्शाती है। मुख्य रूप से बेटी त्रिशा (उर्मिला मातोंडकर) इनसे जूझने के लिए संघर्ष करती है। खेर और मातोंडकर दोनों ही अपने-अपने पात्रों को बहुत खूबी से चित्रित करते हैं। फिल्म शुरुआती लक्षणों, लक्षणों में वृद्धि, परिवार के सामने आने वाली समस्याओं, परिवार आपस में मिल कर इनका सामना कैसे करते हैं और पिता का समर्केथन कैसे करते हैं – फिल्म यह सब बहुत अच्छी तरह से दिखाती है। परिवार वालों के प्रेम और स्नेह को चित्रित किया गया है, और साथ ही उन कठिन परिस्थितियों को भी जो भ्रम और चुनौतीपूर्ण व्यवहार के कारण उत्पन्न होती हैं । पारिवारिक संघर्ष, सामाजिक समस्याएं और बेटी की भावी शादी की समस्याएं भी दिखाई गयी हैं। फिल्म में ऐसे दृश्य भी शामिल हैं जो दिखाते हैं कि परिवार के सदस्य किसी ऐसे व्यक्ति के साथ कैसे बातचीत कर सकते हैं जिसे भ्रम है / जिसके साथ संवाद करना मुश्किल है। अफ़सोस, फिल्म में एक ट्विस्ट एंडिंग भी है जो भ्रामक हो सकती है। इसके अलावा, दिखाई गयी निदान प्रक्रिया अस्पष्ट औरअधूरी है और “डिमेंशिया”, “स्यूडोडिमेंशिया”, “अल्जाइमर प्रकार के डिमेंशिया” जैसे शब्दों का उपयोग करती है। प्रासंगिक लिंक:: विकिपीडिया पेज: मैंने गाँधी को नहीं मारा (2005 फ़िल्म) Opens in new window, कहानी और अंत पर चर्चा करने वाली दो ब्लॉग एंट्री, जिसमें निर्देशक उनके बारे में क्या कहते हैं, यहाँ देखें a detailed review on swapnawrites.wordpress.com Opens in new window, a discussion on how fiction sometimes takes some license while depicting illnesses Opens in new window। इसके अलावा, जिस प्रकार के डिमेंशिया का उल्लेख किया गया है, उसके लिए यह विकिपीडिया पृष्ठ देखें Wikipedia page on Pseudodementia Opens in new window

फिल्म के क्लाइमेक्स में हमें अंततः खेर की सोच, उनके तनाव, संघर्ष, अवसाद आदि के बारे में और अधिक जानकारी मिलती है, और फिल्म के अंत में एक अदालत के दृश्य में हमें फिल्म के “नैतिक” संदेश के बारे में सूचित किया जाता है। अफ़सोस, फिल्म का अंत यह भ्रामक धारणा छोड़ सकता है कि इस तरह के नाटकीय हस्तक्षेप डिमेंशिया को ठीक कर सकते हैं। फिल्म का यह मोड़ चिकित्सा साक्ष्य पर आधारित नहीं है।

फिल्म निदान के बारे में अपेक्षाकृतअस्पष्ट है। उपयोग किए जाने वाले वाक्यांश हैं- “डिमेंशिया, स्यूडोडिमेंशिया , अल्जाइमर प्रकार के डिमेंशिया” लेकिन इससे अधिक निश्चित कुछ भी नहीं कहा गया है। निदान प्रक्रिया को विस्तार से नहीं दिखाया गया है। (स्यूडोडिमेंशिया कुछ डॉक्टरों द्वारा उन स्थितियों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है जहां डिमेंशिया के लक्षण कुछ इलाज योग्य अंतर्निहित कारणों से होते हैं। इस शब्द का इस्तेमाल आमतौर पर डिप्रेसिव स्यूडोडिमेंशिया के लिए किया जाता है, जहां डिप्रेशन का इलाज करने से डिमेंशिया के लक्षण दूर हो सकते हैं।)

उपयोगिता/विश्वसनीयता पर नोट: फिल्म एक संभावित परिदृश्य को समझने के लिए एक उत्कृष्ट चित्रण प्रदान करती है – लक्षण कैसे प्रकट हो सकते हैं और वे किस प्रकार की चुनौतियां पेश कर सकते हैं, और देखभाल कैसे की जा सकती है। फिल्म में दिखाई गयी व्यवहार की चुनौतियाँ, पारिवारिक संघर्ष और सामाजिक समस्याएँ – ये सब संभावित समस्याओं के बारे में एक अंतर्दृष्टि प्रदान करती हैं। परन्तु निदान पहलू को अस्पष्ट छोड़ दिया गया है, और यह फिल्म दर्शकों को यह सोचने में गुमराह कर सकती है कि फिल्म में दिखाया गया नाटकीय हस्तक्षेप चिकित्सकीय रूप से सुरक्षित हैंऔर डिमेंशिया को ठीक करने में प्रभावी हैं। कौन से उचित हस्तक्षेप की कोशिश की जा सकती है, यह समझने के लिए दर्शकों को डॉक्टरों से बात करनी चाहिए ।

कैसे देखें (ऑक्टोबर 2022 से डेटा): डीवीडी खरीदी जा सकती है। डीवीडी खरीदने के लिए लिंक (शायद उपलब्ध न हो) : Flipkart.com लिंक Opens in new window

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अन्य फ़िल्में जिनमें कोई डिमेंशिया वाला व्यक्ति है – पर डिमेंशिया संबंधी अंश या तो बहुत छोटा है या भ्रामक है

इस सेक्शन की फिल्मों में डिमेंशिया के कुछ तत्व हैं, लेकिन डिमेंशिया की बेहतर समझ प्राप्त करने के लिए ये उपयोगी नहीं है। बहुतों में कोई ऐसा चरित्र हैं जिसे डिमेंशिया है, अक्सर माता या पिता, लेकिन फिल्म में डिमेंशिया और उसके प्रभाव का अंश फिल्म में बहुत छोटा है। आमतौर पर डिमेंशिया का उपयोग कथानक में सिर्फ कुछ ऐसी स्थिति को पेश करने के लिए किया गया है इस के कारण नायक/ नायिका को कुछ निर्णय लेने पड़ते हैं/या कुछ पहले के निर्स्पणयों का स्पष्टीकरण मिलता है (इस प्रकार के तंत्र को अक्सर “प्लॉट डिवाइस” कहा जाता है)। यह न्यूनतम डिमेंशिया चित्रण सटीक हो सकता है या रूढ़िवादी/भ्रामक हो सकता है। कुछ फिल्मों में डिमेंशिया वाला व्यक्ति एक प्रमुख चरित्र है, लेकिन डिमेंशिया का चित्रण या तो बहुत उथला है या सर्वथा भ्रामक है।

चूंकि ये फ़िल्में डिमेंशिया को समझने के लिए अनुशंसित नहीं हैं,, इसलिए नीचे दिए गए विवरण में उन्हें देखने के तरीके के लिंक शामिल नहीं हैं।

ब्लैक

ब्लैक (Black): यह 2005 की फिल्म एक समीक्षकों द्वारा प्रशंसित, सफल फिल्म है जिसमें अमिताभ बच्चन और रानी मुखर्जी हैं – फिल्म रानी मुखर्जी और उनकी कई चुनौतियों और अमिताभ बच्चन की एक शिक्षक के रूप में भूमिका पर केंद्रित है। बच्चन को बाद में अल्जाइमर रोग हो जाता है, और यह एक प्लाट में मोड़ जहां भूमिकाएं पलट जाती हैं और पूर्व छात्रा (मुखर्जी) अब अपने पूर्व शिक्षक (बच्चन) की मदद करती है। फिल्म में कुछ अच्छे दृश्य शामिल हैं जहां बच्चन डिमेंशिया के शुरुआती लक्षण दिखाते हैं – जैसे कि भ्रम और भटकना।

परन्तु फिल्म डिमेंशिया के बढ़ने और बिगड़ने को नहीं दिखाती और डिमेंशिया के दैनिक जीवन पर असर और अन्य समस्याओं को नहीं दिखाती है। अल्जाइमर की शुरुआत और प्रगति को स्पष्ट नहीं दिखाया गया है। चिकित्सा की स्थिति पर बहुत कम दिखाई देता है। बच्चन को एक अस्पताल में लोहे की जंजीरों से जकड़े हुए बिस्तर पर भी दिखाया गया है, जो एक अस्वीकार्य स्थिति है और सामान्य नहीं मानी जानी चाहिए; इस तरह का प्रतिबंध स्वीकार्य नहीं है और न ही ऐसी प्रक्रिया है जिसका अस्पतालों को पालन करना चाहिए। फिल्म को कभी-कभी “डिमेंशिया” की फिल्म के रूप में सूचीबद्ध किया जाता है। जबकि फिल्म “ब्लैक” डिमेंशिया का कुछ अंदाजा देती है, पर ऊपर दिए गए कारणों की वजह से डिमेंशिया को समझने के लिए ठीक नहीं है। प्रासंगिक लिंक: विकिपीडिया पेज: ब्लैक Opens in new window,a detailed review with respect to dementia depiction Opens in new window

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Listen… अमाया

Listen…अमाया(Listen… Amaya) (Hindi), (हिंदी), 2013 की एक फिल्म है जिसमें फारूक शेख, दीप्ति नवल और स्वरा भास्कर हैं। फिल्म में दिल्ली में रहे रही लीला (एक विधवा जो दीप्ति नवल द्वारा अभिनीत एक पुस्तकालय कैफे चलाती है) है, साथ ही एक विधवा फोटोग्राफर, जयंत ‘जैज़’ (फारूक शेख) और लीला की बेटी, अमाया (स्वरा भास्कर द्वारा अभिनीत)। फिल्म एक किताब के बारे में है जिस पर अमाया और जैज़ मिल कर काम कर रहे हैं, और जिस के लिए उनको दिल्ली में घूमना होता है; यह फिल्म लीला और जैज़ के बीच विक्सित हो रहे संबंध और इसके इर्द-गिर्द के संघर्षों को दिखाती है। फिल्म का डिमेंशिया का चित्रण शुरू में बहुत हल्का, दबा हुआ है और अंत में डिमेंशिया का जिक्र सिर्फ जयंत के कुछ अजीब व्यवहार के स्पष्टीकरण के रूप में किया गया है।

यह फिल्म अल्जाइमर को समझने के लिए उपयोगी नहीं है, हालांकि यह कुछ शुरुआती संकेतों की एक हल्की झलक देती है। इसे देखने वाला इसे अल्जाइमर की फिल्म के रूप में याद रख सकता है और यह मान सकता है कि अल्जाइमर में सिर्फ ये दिखाए गए हल्के लक्षण ही होंगे। फिल्म को आमतौर पर “डिमेंशिया” फिल्म के रूप में सूचीबद्ध नहीं किया जाता है और किसी को भी डिमेंशिया पर जानकारी प्राप्त करने के लिए फिल्म उचित नहीं है। विकिपीडिया पृष्ठ: विकिपीडिया पेज:लिसन… अमाया Opens in new window

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102 नॉट आउट

102 नॉट आउट ( 102 not Out ) (हिंदी), 2018 की फिल्म है जिसमें अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर हैं और इसमें 102 वर्षीय पिता (बच्चन) और उनके 75 वर्षीय बेटे (कपूर) को दिखाया गया है। फिल्म उम्र बढ़ने, सकारात्मकता और बच्चों की देखभाल न करने जैसे सामाजिक मुद्दों आदि के बारे में है। इसमें दो मिनट का एक क्रम है जिसमें बच्चन कपूर की पत्नी की “तेजी से बढ़ते अल्जाइमर” से मृत्यु का वर्णन करता है, यह दिखाने के लिए कि कपूर का बेटा कितना नालायक है। यह छोटा विवरण बेहद भ्रामक हो सकता है और अल्जाइमर कैसे पेश हो सकता है और समय के साथ कैसे बिगड़ सकता है, यह समझने के लिए पूरी तरह से अनुपयुक्त है । वास्तव में, अल्जाइमर के अधिकांश मामलों में इतना बिगड़ने में कई साल लग जाते हैं। अल्जाइमर के अधिक तेजी से प्रगति करने वाले रूपों में भी आमतौर पर शुरुआती लक्षणों से लेकर मृत्यु तक 2-3 साल लगते हैं। फिल्म भ्रामक है और किसी को भी इस फिल्म से अल्जाइमर के बारे में जानकारी प्राप्त करने की सलाह नहीं दी जाती है।

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यू, मी और हम (चेतावनी: डिमेंशिया चित्रण फिल्म का प्रमुख हिस्सा है और बहुत भ्रामक है)

यू, मी और हम (U, Me Aur Hum) (हिंदी), 2005 की एक प्रेम कहानी फिल्म है, जिसमें काजोल और अजय देवगन हैं। फिल्म में दिखाया गया है कि जब पिया (काजोल) बीसवें दशक में होती है, तब वह चीज़ें भूलने लगती है। अजय (अजय देवगन) और पिया को प्यार हो जाता है, वे शादी कर लेते हैं और उनका एक बच्चा होता है। पिया के अजीब व्यवहार के एपिसोड होते रहते हैं, जिसमें भटकने के एपिसोड / अन्य समस्याएं भी शामिल हैं। एक बार पिया के कन्फ्यूज़न के कारण बच्चे के मरने का खतरा भी होता है। एक डॉक्टर सुझाव देता है कि पिया को किसी संस्था में डाल दिया जाए। यह एक निर्णय बिंदु साबित होती है। अजय, कुछ शुरुआती हिचकिचाने के बाद, संस्था में डालने के खिलाफ फैसला करता है, प्यार सभी दिक्कतों को पछाड़ देता है, और समस्याएं गायब हो जाती हैं और फिर हम काजोल को एक बड़े बेटे के साथ देखते हैं। कई वर्षों के डिमेंशिया के बाद भी, पिया पूरी तरह से सजी संवरी और और सुसंगत दिखती है, उसकी बोलचाल बिलकुल ठीक होती है, और वह अपने माहौल में कोई दिक्कत नहीं महसूस नहीं करती है । वैसे तो कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिन्हें बीस वर्ष की आयु में अल्जाइमर हो जाता है, पर ऐसा बहुत कम होता है। और अधिकांश ऐसे केस जिनमें कम उम्र में डिमेंशिया होता है, उन में डिमेंशिया तेजी से विकसित होता है पर फिल्म में काजोल को उनके पहले लक्षणों के प्रकट होने के दशकों बाद भी स्वतंत्र, अच्छी तरह से तैयार, सतर्क, स्मार्ट और मजाकिया दिखाया जाता है। काजोल के भटकने और अन्य समस्याओं को दर्शाने वाले सभी दृश्य उसके डिमेंशिया के पहले कुछ वर्षों में ही होते हैं और फिर गायब हो जाते हैं। यह फिल्म ऐसी कोई समस्याओं नहीं दिखाती है जो डिमेंशिया के कारण दिन-प्रतिदिन के जीवन में आती हैं, खासकर एक एकल परिवार में जिसमें एक कामकाजी पति और एक शिशु हो। फिल्इम से ऐसा लगता है कि एक बार पति द्वारा प्यार की बौछार शुरू होने के बाद कोई समस्या नहीं होती है। फिल्म में दिखाए गए इस डिमेंशिया के परिदृश्य की संभावना इतनी कम है कि फिल्म बेहद भ्रामक हो सकती है। रोमांस के लिए तरसने वाले सभी दर्शक इसे प्रेम और आशा और चमत्कारों की कहानी के रूप में देख सकते हैं, लेकिन फिल्म का उपयोग डिमेंशिया या देखभाल को समझने के लिए कतई नहीं किया जा सकता है, यहां तक ​​कि शुरुआती डिमेंशिया को भी नहीं। विकिपीडिया पेज: यू मी और हम (2008 फ़िल्म) Opens in new window

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उरी, द सर्जिकल स्ट्राइक (हिंदी और अन्य भाषाएँ)

उरी, द सर्जिकल स्ट्राइक (Uri, the Surgical Strike)(हिंदी और अन्य भाषाएँ ), (जनवरी 2019 रिलीज़) में डिमेंशिया का एक छोटा सा चित्रण है – फिल्म के नायक की माँ को अल्जाइमर है और उसके अल्जाइमर के कारण बेटा मान के साथ रहने के लिए दिल्ली जाता है। अल्जाइमर के पहलू को बहुत कम समझाया गया है – उसे चिकित्सकीय रूप से नहीं समझाया गया है और न ही देखभाल की योजना या लक्षणों की प्रगति को दिखाया गया है । एक बार जब बेटा दिल्ली आ जाता है तो वह “सर्जिकल स्ट्राइक” असाइनमेंट ले लेता है जिससे फिल्म आगे बढ़ती है। अल्जाइमर का पहलू दरकिनार कर दिया जाता है। फिल्म में एक संक्षिप्त उल्लेख यह दर्शाता है कि नायक की बहन देखभाल कर रही है। यह फिल्म किसी को भी डिमेंशिया के बारे में जानकारी देने के लिए उपयुक्त नहीं है, लेकिन अल्जाइमर का इसका संक्षिप्त चित्रण एक संवेदनशील और यकीनी तौर से सही अभिनय है। विकिपीडिया पृष्ठ विकिपीडिया पेज: :उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक Opens in new window

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डिमेंशिया पर कुछ नाटक

इस सेक्शन में डिमेंशिया के इर्द-गिर्द ऐसे नाटकों के नाम शामिल करे जायेंगे जिन्हें अच्छे रिव्यु मिले हैं ताकि यदि वे उपलब्ध हों, तो आप उन्हें देखने पर विचार कर सकें।

एक हिंदी-उर्दू नाटक है, पाकिस्तान और अल्जाइमर, जो अल्जाइमर से पीड़ित 90+ व्यक्ति के जीवन में एक दिन (एक मोनोलॉग के माध्यम से) दिखाता है। नाटक को अच्छे रिव्यु मिले हैं, देखें: A tragic-comic take on the trauma of Partition Opens in new window और BWW Review: PAKISTAN AUR ALZHEIMER’S A Unique Must Watch Opens in new window

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डिमेंशिया को दर्शाने वाली फिल्मों के बारे में एक नोट

जैसा कि ऊपर से देखा जा सकता है, कोई भी फिल्म डिमेंशिया की समस्याओं, पारिवारिक स्थितियों, देखभाल के सभी पहलुओं आदि को नहीं दर्शाती है। प्रत्येक फिल्म कुछ पहलुओं पर केंद्रित होती है, और क्या किया जा सकता है / क्या उपलब्ध है, आदि, इन के बारे में कुछ काल्पनिक स्वतंत्रताओं का भी उपयोग कर सकती है। इसलिए किसी भी फिल्म में डिमेंशिया और देखभाल का पूर्ण और पर्याप्त चित्रण नहीं है और इसे डाक्यूमेंट्री की तरह नहीं माना जा सकता है। साथ ही, दर्शकों को बांधे रखने और कहानी को आकर्षक बनाए रखने के लिए, कुछ पहलुओं को सभी फिल्मों में अधिक देखा जाता है, और कुछ पहलुओं को शायद ही कभी चित्रित किया जाता है। कुछ पॉइंट्स:

  • अधिकांश फिल्में में डिमेंशिया वाले व्यक्ति युवा या साठ के दशक के होते हैं, इस से अधिक उम्र के नहीं । पर वास्तव में, हालांकि डिमेंशिया कम उम्र में हो तो सकता है, लेकिन अधिकाँश केस अधिक उम्र में होते हैं।
  • फिल्में आमतौर पर देखभाल करने के बहुत से मुश्किल और थकाऊ पहलुओं को नहीं दिखाती हैं, जैसे कि पूरे दिन, हर दिन दैनिक गतिविधियों की पूरी श्रृंखला में मदद करने का कार्यभार और थकान। वे असंयम, अश्लील व्यवहार और अत्यधिक आक्रामकता जैसी कठिन समस्याओं का चित्रण करने से भी बचती हैं। डिमेंशिया के अग्रिम / अंतिम चरण में देखभाल और जीवन के अंत से संबंधी निर्णय और संघर्ष को फिल्मों में शायद जगह न मिले। हालांकि कुछ फ़िल्में व्यक्ति की मृत्यु दिखाती हैं, अक्सर उस स्उथिति को जल्दी से निपटा दिया जाता है और उसका सब पर क्या असर हो रहा है, यह नहीं दिखाया जाता।
  • फिल्में आमतौर पर या तो एक बहुत ही सधे हुए, सौम्य व्यक्ति को दिखती हैं या एकदम आक्रामक स्थिति को दिखाती हैं, और इसलिए दर्शक फिल्म के आधार पर डिमेंशिया की क्या धारणा बनाते हैं यह बहुत भिन्न भिन्न हो सकता है।

फिल्म में जब किसी डिमेंशिया वाले व्यक्ति को दिखाया जाए, ध्यान रखें कि चित्रण कितना भी सटीक हो, वह पूर्ण नहीं हो सकता है और लेखक ने कथानक को रोचक और तेजी से बढ़ने वाला बनाने के लिए कुछ कलात्मक छूट का इस्तेमाल करा होगा। हम फिल्म देखते समय उस से भावनात्मक रूप से जुड़ते हैं और इस माध्यम से देखी गयी कहानी हम पर उसी विषय पर कुछ विवरण पढने से ज्यादा असर करती है। यदि आप फिल्म डिमेंशिया को समझने के लिए देख रहे हों, तो याद रखें कि फिल्म का मकसद आपको डिमेंशिया पर शिक्षित करना नहीं है – यह समझें कि फिल्म का क्या फोकस है, फिल्म में डिमेंशिया के कौन से पहलू फिल्म दिखाए जा रहे हैं और कौन से नहीं, और कहानी को दिलचस्प बनाने के लिए शायद फिल्म के लेखक डिमेंशिया के तथ्यों के साथ कुछ स्वतंत्रताएं लें रहे हैं।

ध्यान दें कि लघु फिल्में केवल डिमेंशिया और देखभाल की स्थिति का एक छोटा सा अंश दर्शाती हैं। ऐसी फिल्मों से कोई अच्छी शैक्षिक अंतर्दृष्टि मिलने की उम्मीद करना अवास्तविक है, लेकिन ये लघु फिल्में एक झलक पाने के लिए उपयुक्त हो सकती हैं, खासकर अगर फिल्संम वेदनशील रूप से बनाई गई हो।

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डिमेंशिया केयर नोट्स (हिंदी )