फ़िल्में डिमेंशिया और उसकी देखभाल को समझने का एक असरदार ज़रिया हो सकती हैं, लेकिन इनसे गलत जानकारी भी फैल सकती है। लगभग एक दशक पहले तक, भारतीय फ़िल्मों में डिमेंशिया को शायद ही कभी दिखाया जाता था; इसलिए, जो कुछ फ़िल्में उपलब्ध थीं, वे डिमेंशिया और परिवार पर इसके असर को समझने का एक अहम ज़रिया थीं। अब हालात बदल गए हैं, और अधिक फिल्मों में डिमेंशिया का जिक्र होता है, लेकिन डिमेंशिया को दिखाने के तरीके की क्वालिटी और विश्वसनीयता में अकसर समस्याएं होती हैं। उदाहरण के तौर पर, कई फ़िल्मों में हम देखते हैं कि किसी बुज़ुर्ग किरदार को डिमेंशिया है, पर यह सिर्फ़ कहानी में ज़रूरी मोड़ लाने के लिए (एक “प्लॉट डिवाइस” के तौर पर) है, और चित्रण सही मेडिकल जानकारी पर आधारित नहीं होता है। दर्शक और क्रिटिक भी कभी-कभी किसी बुज़ुर्ग के कन्फ्यूज़न (भ्रम) को दिखाने वाली फ़िल्म को “डिमेंशिया फ़िल्म” कह देते हैं, भले ही फ़िल्म में डिमेंशिया होने की बात न कही गई हो — जिससे गलतफहमी पैदा होती है।
इस पेज में उन हिन्दी फ़िल्मों को शामिल किया गया है जिनकी कहानी पूरी तरह या ज़्यादातर भारत में स्थित है और जिनमें किसी मुख्य किरदार को डिमेंशिया है। फ़िल्मों को इस आधार पर ग्रुप में बांटा गया है कि उनमें डिमेंशिया को कितनी अहमियत और विश्वसनीयता के साथ दिखाया गया है — जैसे कि अहम और उपयोगी, अहम परंतु गुमराह करने वाली, कहानी में बस एक मोड़ के तौर पर छोटा सा ज़िक्र, और वे फ़िल्में जिन्हें सिर्फ़ जानकारी पूरी करने के लिए शामिल किया गया है क्योंकि उनके बारे में ज़्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है। रिव्यू और कमेंट्स, जब तक कि अलग से न बताया गया हो, हमारे फिल्म देखने के अनुभव पर आधारित हैं। आजकल फ़िल्मों में कहानी की किसी ज़रूरत को पूरा करने के लिए डिमेंशिया/अल्ज़ाइमर का ज़िक्र अक्सर किया जाता है, इसलिए यहां शामिल की जाने वाली फ़िल्मों को चुनते समय सावधानी बरती गई है; यह लिस्ट पूरी नहीं है। नीचे दिए गए रिव्यू और कमेंट्स में कहानी के खुलासे (स्पॉइलर) हो सकते हैं।
नीचे दी गई समीक्षाओं और टिप्पणियों में स्पॉइलर हैं ।
- डिमेंशिया चित्रण वाली प्रमुख फिल्में.
- ऐसी फिल्में जिनमें डिमेंशिया चित्रण प्रमुख है पर जो डिमेंशिया समझने के लिए उपयुक्त नहीं हैं
- फ़िल्में जिनमें डिमेंशिया संबंधी अंश या तो बहुत छोटा है या भ्रामक है.
- लघु फ़िल्में, जिनमें आमतौर पर डिमेंशिया वाले व्यक्तिओं से जुड़ा कोई प्रसंग दिखाया जाता है.
- अन्य फिल्म आदि
- डिमेंशिया को दर्शाने वाली फिल्मों के बारे में एक नोट.
डिमेंशिया चित्रण वाली प्रमुख फिल्में .
इस सेक्शन में ऐसी फ़िल्में शामिल हैं जिनमें डिमेंशिया कहानी का एक मुख्य और लगातार चलने वाला हिस्सा है, और डिमेंशिया या उसकी देखभाल को इस तरह दिखाया गया है जिससे बीमारी के लक्षणों, उसकी पहचान या देखभाल से जुड़ी चुनौतियों की काफ़ी हद तक सही और उपयोगी जानकारी मिलती है। ऐसी फ़िल्मों के बारे में ये सुझाव या राय डिमेंशिया को समझने में उनकी उपयोगिता के आधार पर दिए गए हैं, न कि फ़िल्म की कहानी, एक्टिंग या मनोरंजन के आधार पर।
आम तौर पर ऐसी फ़िल्में ज़्यादा समय तक सिनेमाघरों में नहीं चलतीं, लेकिन फ़िल्म फ़स्टिवल में दिखाई जा सकती हैं। ये अलग-अलग OTT प्लेटफ़ॉर्म या DVD पर भी मिल सकती हैं। कुछ मामलों में, प्रोड्यूसर या डायरेक्टर डिमेंशिया के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए इनकी स्पेशल स्क्रीनिंग करने के लिए भी तैयार हो सकते हैं।
माई.
माई 2013 में बनी एक पारिवारिक ड्रामा है, जिसमें आशा भोंसले ने अल्जाइमर रोग से पीड़ित एक माँ की भूमिका निभाई है, और पद्मिनी कोल्हापुरे उनकी बेटियों में से एक हैं। फिल्म पारिवारिक संघर्षों और नाटक के इर्द-गिर्द घूमती है, – जैसे कि किस भाई-बहन को माँ की देखभाल करनी चाहिए, और माई के बदले व्यवहार और उनकी स्थिति में बढ़ती समस्याएँ। फिल्म में अल्जाइमर में दिखने वाले कई तरह के बदले व्यवहार दिखाए गए हैं – जैसे भटकना, भ्रम, नौकरानी पर चोरी का आरोप लगाना । इनपर होने वाले सामान्य पारिवारिक प्रतिक्रियाएं भी दिखाए गए हैं। चिकित्सा कोण अच्छी तरह से दिखाया गया है और काफी पूर्ण है; हम देखते हैं कि डॉक्टर निदान के लिए उससे सवाल पूछ रहे हैं, और बेटी को यह भी बता रहे हैं कि आगे क्या-क्या हो सकता है। बेशक, डिमेंशिया चित्रण में कुछ शॉर्ट-कट हैं, लेकिन फिर यह एक फिल्म है, डाक्यूमेंट्री नहीं।
पारिवारिक ड्रामा का तत्व भाई-बहन के संघर्ष और देखभाल के बारे में नाराजगी के इर्द-गिर्द है, और दामाद और पोती द्वारा माई की उपस्थिति का विरोध करने की नाराजगी पर भी है। साथ ही लापरवाही के मुद्दे भी मौजूद हैं। पर माई की हालत में गिरावट बहुत तेजी से होती है, और दर्शकों और परिवार को स्थिति से तालमेल बिठाने का समय नहीं मिलता है, और फिल्म कई रोग-संबंधी कोणों को विकसित नहीं होने देती है। जहां फिल्म डिमेंशिया की चुनौतियों का चित्रण करने का एक अच्छा काम करती है, वहीं परिवार के दृष्टिकोण से यह आभास होता है कि इस स्थिति में और कुछ नहीं किया जा सकता था। परिवार वाले आपस में बातचीत करने या मुद्दों को हल करने या संकटों और समस्याओं को रोकने आदि की कोशिश नहीं करते हैं।
उपयोगिता/विश्वसनीयता पर नोट: फिल्म व्यवहार संबंधी चुनौतियों के प्रकारों और पारिवारिक स्थितियों और संघर्षों का एक उपयोगी चित्रण प्रदान करती है – कुछ परिवारों को ऐसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। परन्तु अगर कोई यह समझने की कोशिश कर रहा है कि डिमेंशिया वाले व्यक्ति की मदद कैसे की जाए, तो फिल्म परेशान करने वाली/भ्रामक/निराशाजनक हो सकती है, क्योंकि यह समस्याओं को नाटकीय रूप से प्रस्तुत करती है। फिल्म दर्शकों को यह सुझाव देने के लिए कोई संकेत या डेटा प्रदान नहीं करती है कि आपस में बातचीत बेहतर हो सकती है, और संघर्ष को कम करने और जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने के तरीके संभव हैं। फिल्म दर्शकों को गुमराह कर सकती है कि अल्जाइमर वाले व्यक्ति के साथ तालमेल बिठाने या उनकी मदद करने के लिए कुछ भी नहीं किया जा सकता है।
मैंने गाँधी को नहीं मारा.
मैंने गाँधी को नहीं मारा यह समीक्षकों द्वारा प्रशंसित 2005 की एक फिल्म है जिसमें एक सामाजिक संदेश है (यह “नैतिक” सन्देश फिल्म के अंत में स्पष्ट हो जाता है)। मुख्य पात्र, एक सेवानिवृत्त हिंदी प्रोफेसर, उत्तम चौधरी (अनुपम खेर) हैं, और उन में डिमेंशिया शुरू होने लगता है। फिल्म उनके बदलते हुए व्यवहार और परिवार के सामने आने वाली चुनौतियों को दर्शाती है। मुख्य रूप से बेटी त्रिशा (उर्मिला मातोंडकर) इनसे जूझने के लिए संघर्ष करती है। खेर और मातोंडकर दोनों ही अपने-अपने पात्रों को बहुत खूबी से चित्रित करते हैं। फिल्म शुरुआती लक्षणों, लक्षणों में वृद्धि, परिवार के सामने आने वाली समस्याओं, परिवार आपस में मिल कर इनका सामना कैसे करते हैं और पिता का समर्केथन कैसे करते हैं – फिल्म यह सब बहुत अच्छी तरह से दिखाती है। परिवार वालों के प्रेम और स्नेह को चित्रित किया गया है, और साथ ही उन कठिन परिस्थितियों को भी जो भ्रम और चुनौतीपूर्ण व्यवहार के कारण उत्पन्न होती हैं । पारिवारिक संघर्ष, सामाजिक समस्याएं और बेटी की भावी शादी की समस्याएं भी दिखाई गयी हैं। फिल्म में ऐसे दृश्य भी शामिल हैं जो दिखाते हैं कि परिवार के सदस्य किसी ऐसे व्यक्ति के साथ कैसे बातचीत कर सकते हैं जिसे भ्रम है / जिसके साथ संवाद करना मुश्किल है। अफ़सोस, फिल्म में एक ट्विस्ट एंडिंग भी है जो भ्रामक हो सकती है। इसके अलावा, दिखाई गयी निदान प्रक्रिया अस्पष्ट औरअधूरी है और “डिमेंशिया”, “स्यूडोडिमेंशिया”, “अल्जाइमर प्रकार के डिमेंशिया” जैसे शब्दों का उपयोग करती है। प्रासंगिक लिंक:: विकिपीडिया पेज: मैंने गाँधी को नहीं मारा (2005 फ़िल्म) Opens in new window, कहानी और अंत पर चर्चा करने वाली दो ब्लॉग एंट्री, जिसमें निर्देशक उनके बारे में क्या कहते हैं, यहाँ देखें a detailed review on swapnawrites.wordpress.com Opens in new window, a discussion on how fiction sometimes takes some license while depicting illnesses Opens in new window। इसके अलावा, जिस प्रकार के डिमेंशिया का उल्लेख किया गया है, उसके लिए यह विकिपीडिया पृष्ठ देखें Wikipedia page on Pseudodementia Opens in new window।
फिल्म के क्लाइमेक्स में हमें अंततः खेर की सोच, उनके तनाव, संघर्ष, अवसाद आदि के बारे में और अधिक जानकारी मिलती है, और फिल्म के अंत में एक अदालत के दृश्य में हमें फिल्म के “नैतिक” संदेश के बारे में सूचित किया जाता है। अफ़सोस, फिल्म का अंत यह भ्रामक धारणा छोड़ सकता है कि इस तरह के नाटकीय हस्तक्षेप डिमेंशिया को ठीक कर सकते हैं। फिल्म का यह मोड़ चिकित्सा साक्ष्य पर आधारित नहीं है।
फिल्म निदान के बारे में अपेक्षाकृत अस्पष्ट है। उपयोग किए जाने वाले वाक्यांश हैं- “डिमेंशिया, स्यूडोडिमेंशिया , अल्जाइमर प्रकार के डिमेंशिया” लेकिन इससे अधिक निश्चित कुछ भी नहीं कहा गया है। निदान प्रक्रिया को विस्तार से नहीं दिखाया गया है। (स्यूडोडिमेंशिया कुछ डॉक्टरों द्वारा उन स्थितियों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है जहां डिमेंशिया के लक्षण कुछ इलाज योग्य अंतर्निहित कारणों से होते हैं। इस शब्द का इस्तेमाल आमतौर पर डिप्रेसिव स्यूडोडिमेंशिया के लिए किया जाता है, जहां डिप्रेशन का इलाज करने से डिमेंशिया के लक्षण दूर हो सकते हैं।)
उपयोगिता/विश्वसनीयता पर नोट: फिल्म एक संभावित परिदृश्य को समझने के लिए एक उत्कृष्ट चित्रण प्रदान करती है – लक्षण कैसे प्रकट हो सकते हैं और वे किस प्रकार की चुनौतियां पेश कर सकते हैं, और देखभाल कैसे की जा सकती है। फिल्म में दिखाई गयी व्यवहार की चुनौतियाँ, पारिवारिक संघर्ष और सामाजिक समस्याएँ – ये सब संभावित समस्याओं के बारे में एक अंतर्दृष्टि प्रदान करती हैं। परन्तु निदान पहलू को अस्पष्ट छोड़ दिया गया है, और यह फिल्म दर्शकों को यह सोचने में गुमराह कर सकती है कि फिल्म में दिखाया गया नाटकीय हस्तक्षेप चिकित्सकीय रूप से सुरक्षित हैंऔर डिमेंशिया को ठीक करने में प्रभावी हैं। कौन से उचित हस्तक्षेप की कोशिश की जा सकती है, यह समझने के लिए दर्शकों को डॉक्टरों से बात करनी चाहिए ।
ऐसी फिल्में जिनमें डिमेंशिया चित्रण प्रमुख है पर जो डिमेंशिया समझने के लिए उपयुक्त नहीं हैं.
इस सेक्शन में ऐसी फ़िल्में शामिल हैं जिनमें डिमेंशिया कहानी का मुख्य और लगातार चलने वाला हिस्सा तो है, लेकिन उसे गलत, बढ़ा-चढ़ाकर या मेडिकल नज़रिए से भ्रामक तरीके से दिखाया गया है, जिससे दर्शकों को गलत जानकारी मिल सकती है। इनमें से कुछ फ़िल्में बहुत अच्छी मानी जाती हैं या उन्हें अच्छे रिव्यू मिले हैं — पर यहाँ, इस सेक्शन में उन्हें सिर्फ़ इस आधार पर शामिल किया गया है कि उनमें डिमेंशिया का चित्रण कितना सटीक, उपयोगी या भ्रामक है।
थ्री ऑफ अस.
थ्री ऑफ अस: यह 2023 की हिंदी ड्रामा फ़िल्म है जिसमें शैलजा देसाई (शेफ़ाली शाह), उनके पति दीपांकर देसाई (स्वानंद किरकिरे) और शैलजा के बचपन के प्रेमी प्रदीप कामत (जयदीप अहलावत) के बीच लव ट्राएंगल दिखाया गया है। फ़िल्म की शुरुआत मुंबई के कुछ दृश्यों से होती है, जिनमें दिखाया जाता है कि शैलजा कुछ कन्फ़्युशन और समय और स्थान के बोध में दिक्कतें महसूस कर रही है। चीज़ों को संभालने के लिए ‘टू-डू लिस्ट’ का इस्तेमाल करती हैं और अपनी नौकरी छोड़ने का फ़ैसला करती हैं – ये सभी डिमेंशिया की ओर इशारा करते हैं। वह अपने पति से कहती हैं कि वह वेंगुर्ला जाना चाहती हैं, जहाँ उन्होंने बचपन में (कक्षा 5 से 8 तक) कुछ साल पढ़ाई की थी; पति हैरान होते हैं, लेकिन मान जाते हैं। फ़िल्म का बाकी हिस्सा धीमी गति से चलता है और खूबसूरत कोंकण में स्थित है। जब वे वेंगुर्ला पहुँचती हैं और अपने बचपन के प्रेमी से मिलती हैं, तो मुंबई में दिखे हल्के लक्षण काफ़ी कम हो जाते हैं; वह ज़्यादा सहज और आत्मविश्वास के साथ चीज़ें संभालती हुई दिखती हैं, हालाँकि कभी-कभी वह थोड़ी खोई-खोई सी लगती हैं। लेकिन फ़िल्म में डिमेंशिया से निपटने के स्पष्ट तरीकों या भविष्य की योजना बनाने के बारे में नहीं दिखाया गया है।
हालाँकि फ़िल्म में एक्टिंग बहुत अच्छी है और कुछ भावुक, मार्मिक पल और भविष्य को लेकर डर और अनिश्चितता के भाव दिखाए गए हैं, लेकिन डिमेंशिया की जानकारी न रखने वाले दर्शक यह नहीं समझ पाते कि उनके व्यवहार के कौन से हिस्से सामान्य बदलाव हैं जो हम सभी महसूस करते हैं, और कौन से डिमेंशिया के कारण हो सकते हैं। यह भी स्पष्ट नहीं है कि भविष्य को लेकर उनकी कौन सी आशंकाएँ डिमेंशिया में होने वाली चीज़ों पर आधारित हैं और कौन सी गलत जानकारी के कारण हैं। जैसे कि, वह बार-बार यह डर जताती हैं कि वह अपनी बचपन की यादें खो देंगी – जबकि डिमेंशिया में आमतौर पर हाल की यादें खोने का खतरा होता है, जबकि पुरानी यादें ज़्यादा समय तक बनी रहती हैं। डिमेंशिया का ज़िक्र कुछ बार किया गया है लेकिन बीमारी की पहचान (डायग्नोसिस), मौजूदा लक्षणों, डिमेंशिया का उसकी ज़िंदगी पर असर, आगे क्या हो सकता है, और किस चीज़ की योजना बनानी चाहिए और यह कैसे किया जा सकता है, इस पर कोई चर्चा नहीं है।
यूं कहिए, यह फ़िल्म शुरुआती दौर के डिमेंशिया का पता चलने के बाद किसी व्यक्ति की पसंद और कामों का कलात्मक और संवेदनशील चित्रण करती है। लेकिन यह देखने वालों को डिमेंशिया को समझने में मदद नहीं करती है। इस फ़िल्म का इस्तेमाल किसी व्यक्ति और उनके परिवार पर ऐसी गंभीर बीमारी का असर समझने के लिए नहीं किया जा सकता – जैसे कि आम लक्षण और निदान होने पर प्रतिक्रिया —बीमारी की सच्चाई को न मानना, डिप्रेशन, गुस्सा, निराशा, अपनी ज़िंदगी पर असर समझना और आगे की योजना बनाना वगैरह। कुल मिलाकर, भले ही इसमें संवेदनशीलता के साथ अभिनय किया गया हो और इसे अच्छे रिव्यू मिले हों, लेकिन शुरुआती दौर के डिमेंशिया और उसके असर को दिखाने के मामले में यह फ़िल्म न तो उपयोगी है, न ही भरोसेमंद और न ही इसमें पूरी जानकारी दी गई है। यह दर्शकों को डिमेंशिया के बारे में उलझन में भी डाल सकती है। इसका विकिपिडिया पेज यहाँ देखें Opens in new window और IMDB पेज यहाँ देखें Opens in new window.
ब्लैक.
ब्लैक: यह 2005 की फिल्म एक समीक्षकों द्वारा प्रशंसित, सफल फिल्म है जिसमें अमिताभ बच्चन और रानी मुखर्जी हैं – फिल्म रानी मुखर्जी और उनकी कई चुनौतियों और अमिताभ बच्चन की एक शिक्षक के रूप में भूमिका पर केंद्रित है। बच्चन को बाद में अल्जाइमर रोग हो जाता है, और यह एक प्लाट में मोड़ जहां भूमिकाएं पलट जाती हैं और पूर्व छात्रा (मुखर्जी) अब अपने पूर्व शिक्षक (बच्चन) की मदद करती है। फिल्म में कुछ अच्छे दृश्य शामिल हैं जहां बच्चन डिमेंशिया के शुरुआती लक्षण दिखाते हैं – जैसे कि भ्रम और भटकना।
परन्तु फिल्म डिमेंशिया के बढ़ने और बिगड़ने को नहीं दिखाती और डिमेंशिया के दैनिक जीवन पर असर और अन्य समस्याओं को नहीं दिखाती है। अल्जाइमर की शुरुआत और प्रगति को स्पष्ट नहीं दिखाया गया है। चिकित्सा की स्थिति पर बहुत कम दिखाई देता है। बच्चन को एक अस्पताल में लोहे की जंजीरों से जकड़े हुए बिस्तर पर भी दिखाया गया है, जो एक अस्वीकार्य स्थिति है और सामान्य नहीं मानी जानी चाहिए; इस तरह का प्रतिबंध स्वीकार्य नहीं है और न ही ऐसी प्रक्रिया है जिसका अस्पतालों को पालन करना चाहिए। फिल्म को कभी-कभी “डिमेंशिया” की फिल्म के रूप में सूचीबद्ध किया जाता है। जबकि फिल्म “ब्लैक” डिमेंशिया का कुछ अंदाजा देती है, पर ऊपर दिए गए कारणों की वजह से डिमेंशिया को समझने के लिए ठीक नहीं है। प्रासंगिक लिंक: विकिपीडिया पेज: ब्लैक Opens in new window,a detailed review with respect to dementia depiction Opens in new window।
सैयारा (चेतावनी:इस फिल्म का डिमेंशिया चित्रण बहुत भ्रामक है).
सैयारा यह 2025 की एक म्यूज़िकल रोमांटिक ड्रामा फ़िल्म है जिसने बॉक्स ऑफ़िस पर बहुत अच्छा प्रदर्शन किया। इसे अक्सर डिमेंशिया/अल्ज़ाइमर वाली फ़िल्म के तौर पर भी जाना जाता है। कहानी में वाणी (अनीत पड्डा) नामक युवा लेखिका को कम उम्र में ही अल्ज़ाइमर (early-onset Alzheimer’s) हो जाता है। कहानी उसके और म्यूज़िशियन कृष (अहान पांडे) के रिश्ते और उसके बिगढ़ते अल्ज़ाइमर के इर्द-गिर्द घूमती है। अल्ज़ाइमर कहानी को रोचक तरह से बढ़ाने का एक जरिया है और कई ऐसी बातें दिखाई गई हैं जो मेडिकल नज़रिए से अल्ज़ाइमर की वास्तविकता से बहुत दूर हैं।
हालाँकि कहानी को लेकर क्रिटिक्स कि राय मिली-जुली राय पर कई दर्शकों को यह भावनात्मक रूप से बहुत छू लेने वाली फिल्म लगी है। अफसोस, इसमें अल्ज़ाइमर को जिस तरह दिखाया गया है, उसमें बहुत त्रुटियाँ हैं – इतनी कम उम्र में अल्ज़ाइमर का अचानक शुरू होना और लक्षणों का तेज़ी से बढ़ना या देखभाल के पहलू—ये सब स्क्रिप्ट की ज़रूरत के हिसाब से तय किए गए लगते हैं ताकि फ़िल्म को और ज़्यादा भावनात्मक और नाटकीय बनाया जा सके।
न्यूरोलॉजिस्ट और साइकियाट्रिस्ट ने भी इस गलत चित्रण पर टिप्पणी की है। जाने-माने साइकियाट्रिस्ट डॉ. ओम प्रकाश ने एक लेख में सख्त शब्दों में बताया है कि यह फ़िल्म कितनी गुमराह करने वाली है। इस लेख को शेयर करते हुए अपने ट्वीट Opens in new window में उन्होंने संक्षेप में कहा है: (ट्वीट का अनुवाद) “बॉलीवुड की फ़िल्म ‘सैयारा’ में 20-30 साल की उम्र की एक महिला में अल्ज़ाइमर दिखाया गया है — अचानक मेमोरी लॉस होना, हिंसा, पूरी तरह याददाश्त खो देना। मेडिकल नज़रिए से बहुत संदिग्ध (बहुत ही दुर्लभ)। लोगों को गुमराह करने वाला।” कुछ अन्य विशेषज्ञों ने भी इतनी कम उम्र में सदमे के कारण ऐसे अल्ज़ाइमर दिखाने को मात्र एक नाटकीय मोड देने का तरीका बताया है (देखें यह लेख Opens in new window) । चूँकि यह फ़िल्म मेडिकल सच्चाई के बजाय मेलोड्रामा को बहुत ज़्यादा और गलत तरीके से अहमियत देती है, इसलिए डिमेंशिया या उसकी देखभाल के बारे में कुछ भी समझने के लिए यह बिल्कुल भी ठीक नहीं है। विकिपिडिया पेज देखें Opens in new window, IMDB पेज देखें Opens in new window.
यू, मी और हम (चेतावनी: डिमेंशिया चित्रण फिल्म का प्रमुख हिस्सा है और बहुत भ्रामक है).
यू, मी और हम (U, Me Aur Hum) (हिंदी), 2005 की एक प्रेम कहानी फिल्म है, जिसमें काजोल और अजय देवगन हैं। फिल्म में दिखाया गया है कि जब पिया (काजोल) बीसवें दशक में होती है, तब वह चीज़ें भूलने लगती है। अजय (अजय देवगन) और पिया को प्यार हो जाता है, वे शादी कर लेते हैं और उनका एक बच्चा होता है। पिया के अजीब व्यवहार के एपिसोड होते रहते हैं, जिसमें भटकने के एपिसोड / अन्य समस्याएं भी शामिल हैं। एक बार पिया के कन्फ्यूज़न के कारण बच्चे के मरने का खतरा भी होता है। एक डॉक्टर सुझाव देता है कि पिया को किसी संस्था में डाल दिया जाए। यह एक निर्णय बिंदु साबित होती है। अजय, कुछ शुरुआती हिचकिचाने के बाद, संस्था में डालने के खिलाफ फैसला करता है, प्यार सभी दिक्कतों को पछाड़ देता है, और समस्याएं गायब हो जाती हैं और फिर हम काजोल को एक बड़े बेटे के साथ देखते हैं। कई वर्षों के डिमेंशिया के बाद भी, पिया पूरी तरह से सजी संवरी और और सुसंगत दिखती है, उसकी बोलचाल बिलकुल ठीक होती है, और वह अपने माहौल में कोई दिक्कत नहीं महसूस करती है । वैसे तो कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिन्हें बीस वर्ष की आयु में अल्जाइमर हो जाता है, पर ऐसा बहुत कम होता है। और अधिकांश ऐसे केस जिनमें कम उम्र में डिमेंशिया होता है, उन में डिमेंशिया तेजी से विकसित होता है पर फिल्म में काजोल को उनके पहले लक्षणों के प्रकट होने के दशकों बाद भी स्वतंत्र, अच्छी तरह से तैयार, सतर्क, स्मार्ट और मजाकिया दिखाया जाता है। काजोल के भटकने और अन्य समस्याओं को दर्शाने वाले सभी दृश्य उसके डिमेंशिया के पहले कुछ वर्षों में ही होते हैं और फिर गायब हो जाते हैं। यह फिल्म ऐसी कोई समस्याएं नहीं दिखाती है जो डिमेंशिया के कारण दिन-प्रतिदिन के जीवन में आती हैं, खासकर एक एकल परिवार में जिसमें एक कामकाजी पति और एक शिशु हो। फिल्इम से ऐसा लगता है कि एक बार पति द्वारा प्यार की बौछार शुरू होने के बाद कोई समस्या नहीं होती है। फिल्म में दिखाए गए इस डिमेंशिया के परिदृश्य की संभावना इतनी कम है कि फिल्म बेहद भ्रामक हो सकती है। रोमांस के लिए तरसने वाले सभी दर्शक इसे प्रेम और आशा और चमत्कारों की कहानी के रूप में देख सकते हैं, लेकिन फिल्म का उपयोग डिमेंशिया या देखभाल को समझने के लिए कतई नहीं किया जा सकता है, यहां तक कि शुरुआती डिमेंशिया को भी नहीं। विकिपीडिया पेज: यू मी और हम (2008 फ़िल्म) Opens in new window।
फ़िल्में जिनमें डिमेंशिया संबंधी अंश बहुत छोटा है
इस सेक्शन की फ़िल्मों में किसी किरदार को डिमेंशिया है — अक्सर कोई माता-पिता — लेकिन फ़िल्म में डिमेंशिया और उसके असर को बहुत कम दिखाया गया है। डिमेंशिया को ज़्यादातर किरदार के किसी अजीब व्यवहार को समझाने या कहानी को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया गया है, और डिमेंशिया चित्रण में गहराई नहीं है (इसे अक्सर “प्लॉट डिवाइस” कहा जाता है)। डिमेंशिया को समझने के लिए ये फ़िल्में इसलिए ठीक नहीं हैं क्योंकि इनमें बीमारी को बहुत कम दिखाया गया है चाहे वह कमज़ोर चित्रण सही हो या गुमराह करने वाला हो।
102 नॉट आउट.
102 नॉट आउट ( 102 not Out ) (हिंदी), 2018 की फिल्म है जिसमें अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर हैं और इसमें 102 वर्षीय पिता (बच्चन) और उनके 75 वर्षीय बेटे (कपूर) को दिखाया गया है। फिल्म उम्र बढ़ने, सकारात्मकता और बच्चों की देखभाल न करने जैसे सामाजिक मुद्दों आदि के बारे में है। इसमें दो मिनट का एक क्रम है जिसमें बच्चन कपूर की पत्नी की “तेजी से बढ़ते अल्जाइमर” से मृत्यु का वर्णन करता है, यह दिखाने के लिए कि कपूर का बेटा कितना नालायक है। यह छोटा विवरण बेहद भ्रामक हो सकता है और अल्जाइमर कैसे पेश हो सकता है और समय के साथ कैसे बिगड़ सकता है, यह समझने के लिए पूरी तरह से अनुपयुक्त है । वास्तव में, अल्जाइमर के अधिकांश मामलों में इतना बिगड़ने में कई साल लग जाते हैं। अल्जाइमर के अधिक तेजी से प्रगति करने वाले रूपों में भी आमतौर पर शुरुआती लक्षणों से लेकर मृत्यु तक 2 3 साल लगते हैं। फिल्म भ्रामक है और किसी को भी इस फिल्म से अल्जाइमर के बारे में जानकारी प्राप्त करने की सलाह नहीं दी जाती है।
उरी, द सर्जिकल स्ट्राइक (हिंदी और अन्य भाषाएँ).
उरी, द सर्जिकल स्ट्राइक (Uri, the Surgical Strike)(हिंदी और अन्य भाषाएँ ), (जनवरी 2019 रिलीज़) में डिमेंशिया का एक छोटा सा चित्रण है – फिल्म के नायक की माँ को अल्जाइमर है और उसके अल्जाइमर के कारण बेटा मान के साथ रहने के लिए दिल्ली जाता है। अल्जाइमर के पहलुओं को बहुत कम समझाया गया है – उसे चिकित्सकीय रूप से नहीं समझाया गया है और न ही देखभाल की योजना या लक्षणों की प्रगति को दिखाया गया है । एक बार जब बेटा दिल्ली आ जाता है तो वह “सर्जिकल स्ट्राइक” असाइनमेंट ले लेता है जिससे फिल्म आगे बढ़ती है। अल्जाइमर का पहलू दरकिनार कर दिया जाता है। फिल्म में एक संक्षिप्त उल्लेख यह दर्शाता है कि नायक की बहन देखभाल कर रही है। यह फिल्म किसी को भी डिमेंशिया के बारे में जानकारी देने के लिए उपयुक्त नहीं है, लेकिन अल्जाइमर का इसका संक्षिप्त चित्रण एक संवेदनशील और यकीनी तौर से सही अभिनय है। विकिपीडिया पृष्ठ विकिपीडिया पेज: :उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक Opens in new window ।
ऊंचाई.
ऊंचाई (हिंदी), (2022 में रिलीज़) में फिल्म के अंत की ओर पता चलता है कि एक मुख्य पात्र को अल्जाइमर रोग है। अल्जाइमर का चित्रण एक छोटा अंश है और ऐसा लगता है कि यह फिल्म में केवल एक रुचि/मोड़ देने के लिए एक प्लॉट डिवाइस के तौर पर है। उन एक दो दृश्यों को छोड़कर अल्ज़ाइमर के पहलुओं पर कुछ सामग्री नहीं है – निदान, व्यक्ति की क्षमताओं या समस्याओं पर प्रभाव, या समस्याओं को दूर करने के लिए की गई किसी भी योजना बनाने की प्रक्रिया को नहीं दिखाया गया है। फिल्म अल्जाइमर/ डिमेंशिया को मनोभ्रंश समझने के लिए उपयुक्त नहीं है, और अल्जाइमर के इस संक्षिप्त चित्रण से दर्शकों को यह भ्रम हो सकता है कि इसके साथ रहने वाले व्यक्तियों को डिमेंशिया कैसे प्रभावित करती है। विकिपीडिया पृष्ठ यहाँ देखें Opens in new window।
मैं वापस आऊँगा.
मैं वापस आऊँगा: यह 2026 की एक फ़िल्म है, जो 1947 के बंटवारे की वजह से दुखद रूप से खत्म हो चुके एक रोमांस के इर्द-गिर्द घूमती है। बंटवारे के कई दशकों बाद, एक पोता इस दुखद घटना को समझने और अपने मरते हुए दादा के लिए सुकून पाने की कोशिश करता है, जो अग्रिम अवस्था के डिमेंशिया और कई स्ट्रोक से जूझ रहे हैं। हालाँकि इसे बहुत संवेदनशीलता से बनाया गया है और क्रिटिक्स ने इसकी तारीफ़ की है, लेकिन इस फिल्म में डिमेंशिया/स्ट्रोक में मुख्यतः सिर्फ कहानी बढ़ाने का एक जरिया है – इस फिल्म से डिमेंशिया के बारे में हम बस इतना ही सीखते हैं कि डिमेंशिया/स्ट्रोक से कन्फ्यूजन, उलझी हुई और खोई हुई यादें, और कुल मिलाकर गिरावट हो सकती है। (विकिपीडिया पेज यहाँ Opens in new window।
Listen… अमाया.
Listen…अमाया(Listen… Amaya) (Hindi), (हिंदी), 2013 की एक फिल्म है जिसमें फारूक शेख, दीप्ति नवल और स्वरा भास्कर हैं। फिल्म में दिल्ली में रह रही लीला (एक विधवा जो दीप्ति नवल द्वारा अभिनीत एक पुस्तकालय कैफे चलाती है) है, साथ ही एक विधवा फोटोग्राफर, जयंत ‘जैज़’ (फारूक शेख) और लीला की बेटी, अमाया (स्वरा भास्कर द्वारा अभिनीत)। फिल्म एक किताब के बारे में है जिस पर अमाया और जैज़ मिल कर काम कर रहे हैं, और जिस के लिए उनको दिल्ली में घूमना होता है; यह फिल्म लीला और जैज़ के बीच विक्सित हो रहे संबंध और इसके इर्द-गिर्द के संघर्षों को दिखाती है। फिल्म का डिमेंशिया का चित्रण शुरू में बहुत हल्का, दबा हुआ है और अंत में डिमेंशिया का जिक्र सिर्फ जयंत के कुछ अजीब व्यवहार के स्पष्टीकरण के रूप में किया गया है।
यह फिल्म अल्जाइमर को समझने के लिए उपयोगी नहीं है, हालांकि यह कुछ शुरुआती संकेतों की एक हल्की झलक देती है। इसे देखने वाला इसे अल्जाइमर की फिल्म के रूप में याद रख सकता है और यह मान सकता है कि अल्जाइमर में सिर्फ ये दिखाए गए हल्के लक्षण ही होंगे। फिल्म को आमतौर पर “डिमेंशिया” फिल्म के रूप में सूचीबद्ध नहीं किया जाता है और किसी को भी डिमेंशिया पर जानकारी प्राप्त करने के लिए फिल्म उचित नहीं है। विकिपीडिया पृष्ठ: विकिपीडिया पेज:लिसन… अमाया Opens in new window।
लघु फ़िल्में, जिनमें आमतौर पर डिमेंशिया वाले व्यक्तिओं से जुड़ा कोई प्रसंग दिखाया जाता है.
लघु फ़िल्में आमतौर पर सिर्फ़ 20-25 मिनट की होती हैं और डिमेंशिया व देखभाल की स्थिति का बस एक पहलू दिखाती हैं। ये डिमेंशिया की एक अच्छी झलक तो दे सकती हैं पर इन से डिमेंशिया/ देखभाल पर विस्तृत जानकारी की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। नीचे की चर्चा में पढ़ें कि जिस पहलू पर लघु फिल्म बनाई गई है उस में उस को कितनी अच्छी तरह दिखाया गया है
The Broken Table
यह 23 मिनट की लघु फ़िल्म एक ऐसी घटना दिखाती है जिसमें साइकोलॉजी की एक स्टूडेंट, डिमेंशिया वाले एक व्यक्ति की देखभाल करने वाली (केयरटेकर) के तौर पर कुछ घंटे काम करती है। वह इसे डिमेंशिया वाले व्यक्ति को करीब से जानने के मौके के तौर पर देखती है, नोट्स लेती है और अपनी समझ के अनुसार उनसे बातचीत करने की पूरी कोशिश करती है। उस समय उसे कुछ निजी समस्याओं का भी सामना करना पड़ रहा होता है। डिमेंशिया वाले व्यक्ति के तौर पर नसीरुद्दीन शाह की बेहतरीन एक्टिंग वाली यह लघु फ़िल्म, शुरुआती डिमेंशिया की संवेदनशील और वास्तविक स्थिति दिखाती है। साथ ही, फिल्म यह भी दिखाती है कि डिमेंशिया वाले व्यक्ति कितना योगदान देते रहती हैं और ऐसे व्यक्ति के बारे में पहले से कोई राय बना लेना कैसे गलतफहमी पैदा कर सकता है। इसे यहाँ देखें: Royal Stag Barrel Select Large Short Films | The Broken Table | A Film by Chintan Sarda | Film Opens in new window.]।
अन्य फिल्म आदि
इस सेक्शन में दी गई फिल्म आदि का डिमेंशिया से कुछ संबंध तो है, पर हम इनकी समीक्षा नहीं जोड़ रहे हैं ; इसके कारणों में शामिल हैं – आइटम का उपलब्ध न होना, पेज में शामिल किए जाने के दायरे से बाहर होना, अभी भी फ़ेस्टिवल सर्किट में होना, या स्टेज प्ले जैसा सीमित पहुँच वाला माध्यम है। इन्हें केवल संदर्भ के लिए सूचीबद्ध किया गया है, और इनमें डिमेंशिया/देखभाल के चित्रण की गुणवत्ता या विश्वसनीयता पर कोई टिप्पणी नहीं की गई है।
एक हिंदी-उर्दू नाटक है, पाकिस्तान और अल्जाइमर, जो अल्जाइमर से पीड़ित 90+ व्यक्ति के जीवन में एक दिन (एक मोनोलॉग के माध्यम से) दिखाता है। नाटक को अच्छे रिव्यु मिले हैं, देखें: A tragic-comic take on the trauma of Partition Opens in new window और BWW Review: PAKISTAN AUR ALZHEIMER’S A Unique Must Watch Opens in new window।
September 21 यह 2026 की एक हिंदी और कन्नड़ ड्रामा फ़िल्म है जो अल्ज़ाइमर वाले व्यक्ति की ज़िंदगी और उनके केयरगिवर्स को होने वाली भावनात्मक और साइकोलॉजिकल मुश्किलों को दिखाती है। रिव्यू पेंडिंग है। इस बीच, कुछ रिव्यू यहाँ Opens in new window , विकिपीडिया पेज यहाँ Opens in new window, IMDB पेज यहाँ Opens in new window.
Someday(कुछ न्यूज देखें Opens in new window, विकिपीडिया पेज यहाँ Opens in new window ). लगता है अभी भी फेस्टिवल सर्किट में है और रिलीज़ नहीं हुई है।
The Kashmir Files (कुछ देखने वालों ने बताया है कि डिमेंशिया का ज़िक्र मुश्किल से एक वाक्य या उससे थोड़ा ज़्यादा है, और सिर्फ़ याददाश्त की कुछ कमियों को समझाने के लिए है; अभी रिव्यू नहीं हुआ है)।
वनवास . यह 2024 की एक फ़ैमिली ड्रामा फ़िल्म है, और कुछ रिव्यू में कहा गया है कि इसमें मुख्य किरदार (अभिनेता नाना पाटेकर) को डिमेंशिया है, पर उन्होंने एक इंटरव्यू में साफ़ तौर पर कहा है (इंटरव्यू यहाँ पढ़ें Opens in new window) कि इसमें डिमेंशिया का कोई ज़िक्र नहीं है। विकिपीडिया पेज यहाँ है Opens in new window.
डिमेंशिया को दर्शाने वाली फिल्मों के बारे में एक नोट.
हर फ़िल्म कुछ खास पहलुओं पर ध्यान देती है और कहानी की ज़रूरत के हिसाब से कुछ शॉर्टकट या काल्पनिक छूट लेती है। इसलिए, कोई भी फ़िल्म डिमेंशिया या उसकी देखभाल के सभी पहलुओं को नहीं दिखाती, और न ही चित्रण पूरी तरह से सटीक होता है। फ़िल्में डॉक्यूमेंट्री जैसी नहीं होतीं। कुछ बातें ध्यान में रखनी चाहिए:
- ज़्यादातर फ़िल्मों में डिमेंशिया वाले व्यक्ति को काफ़ी कम उम्र का या ज़्यादा से ज़्यादा साठ के दशक की उम्र का दिखाया जाता है। सच तो यह है कि हालांकि डिमेंशिया कम उम्र में भी हो सकता है, लेकिन अधिकांश केस बुजुर्गों में होते हैं।
- फ़िल्में आम तौर पर देखभाल से जुड़ी कठिनाईयां और थकाने/ परेशान करने वाले कार्य नहीं दिखातीं, जैसे कि हर दिन, पूरे दिन रोज़मर्रा के कामों में मदद करना। वे अजीब या बहुत ज़्यादा परेशान करने वाली समस्याओं को दिखाने से बचती हैं, जैसे कि पेशाब या मल पर नियंत्रण न रहना, अश्लील व्यवहार, आक्रामक व्यवहार, बहुत ज़्यादा गुस्सा, बीमारी के आखिरी चरण में देखभाल और ज़िंदगी के अंत संबंधी निर्णय लेने संबंधी उलझन। यहाँ तक कि यदि फ़िल्मों में मरीज़ की मौत दिखाई भी जाती है, तब भी अक्सर उस स्थिति को जल्दी से निपटा दिया जाता है और उसका सब पर क्या असर हो रहा है, यह नहीं दिखाया जाता।।
- फ़िल्मों में आम तौर पर या तो बहुत सधे हुए, सौम्य इंसान दिखाया जाता है या फिर बहुत आक्रामक स्थिति दिखाई जाती है। दर्शक को डिमेंशिया के बारे में जो जानकारी मिलती है, वह इस बात पर बहुत अलग हो सकती है कि उन्होंने ‘माई’ जैसी फ़िल्म देखी है या ‘गोधी बन्ना’ (कन्नड फिल्म) जैसी।
अगर आप डिमेंशिया और उसके असर को समझने के लिए फ़िल्में देख रहे हैं, तो यह याद रखना फ़ायदेमंद है कि फ़िल्म का मुख्य विषय और कहानी क्या है, और डिमेंशिया व देखभाल को समझने के लिए वह फ़िल्म कितनी भरोसेमंद है। हमारे नवीनतम संकलन और अन्य भारत में स्थिति फिल्मों (भारतीय भाषाओं या अंग्रेजी में) पर कुछ टिप्पणी के लिए देखें : Indian movies depicting dementia Opens in new window.
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