स्ट्रोक (आघात) और डिमेंशिया (मनोभ्रंश) (Stroke and Dementia)

स्ट्रोक (आघात, पक्षाघात, सदमा, stroke) एक गंभीर रोग है। हम कई बार देखते और सुनते हैं कि किसी को स्ट्रोक हुआ है। इस के बाद कुछ लोग फिर से अच्छे हो पाते हैं, पर अन्य लोगों में पूरी तरह शारीरिक और मानसिक क्षमताएं ठीक नहीं हो पातीं।शायद हम यह भी जानते हैं कि करीब 25%[1] केस में स्ट्रोक जानलेवा सिद्ध होता है। पर स्ट्रोक क्या है, किन बातों से इस के होने का खतरा है, इस से कैसे बचें, इन सब पर जानकारी इतनी व्याप्त नहीं है। अधिकाँश लोग यह भी नहीं जानते कि स्ट्रोक होने के कुछ ही महीनों में कुछ व्यक्तियों को स्ट्रोक-सम्बंधित डिमेंशिया (मनोभ्रंश, dementia) भी हो सकता है।

इस पोस्ट में:.

स्ट्रोक क्या है, क्यों होता है, और इस के लक्षण क्या हैं।

मस्तिष्क के ठीक काम करने के लिए यह जरूरी है कि मस्तिष्क में खून की सप्लाई ठीक रहे। इस काम के लिए हमारे मस्तिष्क में रक्त वाहिकाओं (खून की नलिकाएं, blood vessels) का एक जाल (नेटवर्क) है, जिसे वैस्कुलर सिस्टम कहते है। ये रक्त वाहिकाएं मस्तिष्क के हर भाग में आक्सीजन और जरूरी पदार्थ पहुंचाती हैं।

स्ट्रोक में इस रक्त प्रवाह में रुकावट होती है. इस के दो मुख्य कारण हैं।

  • अरक्तक आघात, इस्कीमिया (ischemia): रक्त का थक्का (clot) रक्त वाहिका को बंद कर सकता है। अधिकाँश स्ट्रोक के केस इस प्रकार के होते हैं।[1]
  • रक्तस्रावी आघात (हेमरेज, haemorrhage) : रक्त वाहिका फट सकती है।

खून सप्लाई में कमी के कुछ कारण का यह चित्रण देखें।

इस रुकावट के कारण हुई हानि इस पर निर्भर है कि मस्तिष्क के किस भाग में और कितनी देर तक रक्त ठीक से नहीं पहुँच पाया। यदि कुछ मिनट तक रक्त नहीं पहुँचता, तो प्रभावित भाग में मस्तिष्क के सेल मर सकते हैं। इस को इनफार्क्ट या रोधगलितांश कहते हैं।

स्ट्रोक के लक्षण अकसर अचानक ही, या कुछ ही घंटों के अन्दर-अन्दर पेश होते हैं।

  • एक तरफ के चेहरे और हाथ-पैर का सुन्न होना/ उनमें कमजोरी, चेहरे के भाव पर, और अंगों पर नियंत्रण नहीं रहना।
  • बोली अस्पष्ट होना, बोल न पाना, दूसरों को समझ न पाना।
  • एक या दोनों आँखों से देखने में दिक्कत।
  • चक्कर आना, शरीर का संतुलन बिगड़ना, चल-फिर न पाना।
  • बिना किसी स्पष्ट कारण के तीव्र सर-दर्द होना।

अफ़सोस, कई बार व्यक्ति और आस पास के लोग स्ट्रोक को पहचान नहीं पाते, या पहचानने में और डॉक्टर के पास जाने में देर कर देते हैं, जिस से हानि अधिक होती है।

एक खास स्थिति है “मिनी-स्ट्रोक” (mini stroke, अल्प आघात)। इस में लक्षण कुछ ही देर रहते हैं, क्योंकि रक्त सप्लाई में रुकावट खुद दूर हो जाती है। इस मिनी-स्ट्रोक का असर तीस मिनट से लेकर चौबीस घंटे तक रहता है। इसे ट्रांसिएंट इस्कीमिक अटैक्स (transient ischemic attack, TIA) या अस्थायी स्थानिक अरक्तता भी कहते हैं। व्यक्ति को कुछ देर कुछ अजीब-अजीब लगता है, पर वे यह नहीं जान पाते कि यह कोई गंभीर समस्या है। कुछ व्यक्तियों में ऐसे मिनी स्ट्रोक बार बार होते हैं, पर पहचाने नहीं जाते। कुछ केस में ऐसे मिनी स्ट्रोक के थोड़ी ही देर बाद व्यक्ति को बड़ा और गंभीर स्ट्रोक हो सकता है।

नोट: कुछ लोग स्ट्रोक और दिल के दौरे में कन्फ्यूज होते हैं। स्ट्रोक और दिल का दौरा, दोनों ही रक्त के प्रवाह से संबंधी रोग हैं (हृदवाहिनी रोग, cardiovascular disease)। पर स्ट्रोक में इस नाड़ी संबंधी समस्या का असर दिमाग पर होता है, हृदय पर नहीं। यूं कहिये, स्ट्रोक को हम एक मस्तिष्क का दौरा मान सकते हैं।

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स्ट्रोक में तुरंत इलाज बहुत जरूरी है।

इलाज में जितनी देर करें, व्यक्ति की स्थिति उतनी ही बिगड़ती जायेगी। जान भी जा सकती है। इसलिए स्ट्रोक का शक होते ही जल्द से जल्द व्यक्ति को अस्पताल ले जाएं। डॉक्टर शायद व्यक्ति की जान बचा पायें। सही समय पर इलाज करने से शायद डॉक्टर स्ट्रोक के बाद होने वाली दिक्कतों को भी कम कर पायें। दुबारा स्ट्रोक न हो, इस के लिए सलाह भी मिलेगी।

स्ट्रोक के बाद उचित कदम उठाने से कुछ व्यक्ति तो ठीक हो पाते हैं, पर अन्य व्यक्तियों में कुछ समस्याएँ बनी रहती हैं। उनकी रिकवरी पूरी नहीं होती। स्ट्रोक-पीड़ित कई व्यक्ति बाद में भी कुछ हद तक दूसरों पर निर्भर रहते हैं। उन्हें डिप्रेशन (अवसाद) भी हो सकता है, जिस के कारण वे भविष्य के स्ट्रोक से बचने के लिए कदम उठाने में भी दिक्कत महसूस करते हैं।

एक अन्य आम समस्या है मस्तिष्क की क्षमताओं पर असर। यदि व्यक्ति को बार बार स्ट्रोक (या मिनी-स्ट्रोक) हो, तो क्षमताओं में हानि ज्यादा हो सकती है। व्यक्ति की मानसिक काबिलियत कम हो जाती है। व्यक्ति को डिमेंशिया हो सकता है।

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स्ट्रोक और डिमेंशिया (मनोभ्रंश)।

संवहनी डिमेंशिया (वैस्कुलर डिमेंशिया, Vascular dementia) एक प्रमुख प्रकार का डिमेंशिया है। यह आक्सीजन की कमी की वजह से मस्तिष्क के सेल मरने से हो सकता है। इस का एक कारण है बार बार स्ट्रोक या मिनी-स्ट्रोक होना। इस प्रकार के संवहनी डिमेंशिया को स्ट्रोक से सम्बंधित डिमेंशिया के नाम से भी जाना जाता है।

अल्ज़ाइमर सोसाइटी UK की “What is vascular dementia?” [2] पत्रिका के अनुसार स्ट्रोक होने के बाद तकरीबन 20% व्यक्तियों में छह महीने में स्ट्रोक से सम्बंधित डिमेंशिया हो सकता है। एक बार स्ट्रोक हो, तो फिर से स्ट्रोक की संभावना बढ़ जाती है, इस लिए डिमेंशिया का खतरा भी बढ़ जाता है।

संवहनी डिमेंशिया पर विस्तृत हिंदी लेख के लिए देखें [3]

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स्ट्रोक से बचने के उपाय।

स्ट्रोक होने के बाद व्यक्ति को दुबारा स्ट्रोक होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है। कुछ स्टडीज़ के अनुसार, इलाज न करें तो अगले पांच साल में फिर स्ट्रोक होने की संभावना 25% है। दस साल में स्ट्रोक होने की संभावना 40% है। इसलिए स्ट्रोक के बाद आगे स्ट्रोक न हो, इस के लिए खास ध्यान रखना होता है। [4]

स्ट्रोक की संभावना कम करने के लिए उपयुक्त दवा लें और उचित जीवन-शैली के बदलाव अपनाएं। उच्च रक्त-चाप (हाइपरटेंशन, हाई बी पी) और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखें। डायबिटीज से बचें, या उस पर नियंत्रण रखें। जीवन-शैली बदलाव करें। उदाहरण हैं: सही और पौष्टिक खाना, वजन नियंत्रित रखना, शारीरिक रूप से सक्रिय रहना (व्यायाम इत्यादि), तम्बाकू सेवन और धूम्रपान बंद करना, तनाव कम करना, और मद्यपान कम करना। डॉक्टर से बात करें, ताकि आपको सही सलाह मिले।

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स्ट्रोक कितना व्याप्त और गंभीर है, उस पर कुछ तथ्य/ आंकड़े।

  • स्ट्रोक एक बहुत आम समस्या है। यह माना जाता है कि हर चार व्यक्तियों में से एक को अपने जीवन-काल में स्ट्रोक होगा।[5]
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्ट्रोक साठ साल और ऊपर की उम्र के लोगों की मृत्यु के कारणों में दूसरे स्थान पर है।
  • कम उम्र में भी स्ट्रोक का खतरा काफी ज्यादा है। 15 से 59 उम्र वर्ग में मृत्यु के कारणों में स्ट्रोक पांचवे स्थान पर है। [6]
  • अफ़सोस, भारत में स्ट्रोक का खतरा अन्य कई देशों से ज्यादा है क्योंकि यहाँ के लोगों में हाईपरटेंशन और अन्य रिस्क फैक्टर की संभावना ज्यादा है। ऊपर से यह भी अनुमान है कि भारत में स्ट्रोक का खतरा समय के साथ बढ़ रहा है। [7]
  • विश्व भर में स्ट्रोक डिसेबिलिटी का एक मुख्य कारण है, और डिसेबिलिटी के कारणों  मेंतीसरे स्थान पर है। [8]

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हम क्या कर सकते हैं।

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सबसे पहले तो हमें पहचानना होगा कि स्ट्रोक एक आम समस्या हैं, और इसके नतीजे भी बहुत गंभीर हैं। 60% लोग स्ट्रोक से या तो बच नहीं पाते, या बचते भी हैं तो उन की शारीरिक या मानसिक क्षमताएं ठीक नहीं हो पातीं। वे दूसरों पर निर्भर हो सकते हैं। उन्हें डिमेंशिया भी हो सकता है।

हम सब स्ट्रोक और अन्य नाड़ी संबंधी बीमारियों से बचने के लिए अपने जीवन में कई कदम उठा सकते हैं। अपने और अपने प्रियजनों के स्वास्थ्य का ख़याल रखें तो स्ट्रोक और सम्बंधित समस्याओं की संभावना कम होगी। यह मंत्र याद रखें: हृदय स्वास्थ्य के लिए जो कदम उपयोगी है, वे रक्त वाहिका की समस्याओं से बचने के लिए भी उपयोगी हैं।

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नोट्स: अधिक जानकारी के लिए लिंक।

संवहनी डिमेंशिया पर विस्तृत हिंदी लेख देखें: संवहनी डिमेंशिया (वैस्कुलर डिमेंशिया, Vascular dementia): एक परिचय

स्ट्रोक और सम्बंधित विषयों के लिए कुछ उपयोगी शब्दावली:

  • मिनी-स्ट्रोक और उस में पाए डिमेंशिया से संबंधित कुछ शब्द हैं मिनी-स्ट्रोक, ट्रांसिऐंट इस्कीमिक अटैक्स (transient ischemic attack, TIA) या अस्थायी स्थानिक अरक्तता।
  • मस्तिष्क में हुई हानि के लिए कुछ उपयोगी शब्द हैं इनफार्क्ट (रोधगलितांश, infarct).
  • बार-बार के मिनी-स्ट्रोक से संबंधित डिमेंशिया के लिए कुछ शब्द हैं मल्टी- इनफार्क्ट डिमेंशिया (multi-infarct dementia), बहु-रोधगलितांश डिमेंशिया।
  • संवहनी डिमेंशिया के लिए कुछ शब्द/ वर्तनी हैं वास्कुलर डिमेंशिया, वैस्क्युलर डिमेंशिया, नाड़ी-संबंधी डिमेंशिया, संवहनी मनोभ्रंश, Vascular dementia.

डिमेंशिया का कुछ अन्य रोगों से भी सम्बन्ध है। इन रोगों पर हिंदी में विस्तृत पृष्ठ देखें।

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अल्ज़ाइमर रोग (Alzheimer’s Disease, AD) : एक परिचय

अल्जाइमर रोग (Alzheimer’s Disease, AD) सबसे ज्यादा पाया जाने वाला डिमेंशिया है (50-75%)। इस पर जानकारी अन्य डिमेंशिया रोगों से ज्यादा आसानी से मिलती है। इस पृष्ठ पर प्रस्तुत है इस पर एक सरल परिचय और कुछ उपयोगी चित्र, और हिंदी साइट और वीडियो के लिंक भी हैं|

डिमेंशिया के अन्य तीन मुख्य प्रकारों पर प्रकाशित पोस्ट  के लिए ये लिंक देखें : संवहनी डिमेंशिया (वैस्कुलर डिमेंशिया, Vascular dementia), लुई बॉडी डिमेंशिया (Lewy Body Dementia), और फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया (Frontotemporal Dementia, FTD) |

अल्ज़ाइमर रोग क्या है (What is Alzheimer’s Disease)|

अल्ज़ाइमर रोग सबसे ज्यादा पाया जाने वाला डिमेंशिया है*1 |

  • इस डिमेंशिया में मस्तिष्क में हुई हानि को दवा से वापस ठीक नहीं किया जा सकता| यह इर्रिवर्सिबल (irreversible) है|
  • Dementia India Report 2010 के अनुसार इर्रिवार्सिब्ल डिमेंशिया के केस में से 50 – 75% लोगों को अल्ज़ाइमर रोग होता है|
  • अल्ज़ाइमर रोग अन्य डिमेंशिया के साथ-साथ भी पाया जाता है, जैसे कि वैस्कुलर डिमेंशिया के साथ। इस को मिश्रित डिमेंशिया (मिक्स्ड डिमेंशिया) कहते हैं|
Table 1.1 from Dementia India Report 2010

अल्ज़ाइमर रोग सबसे पहले डॉक्टर अलोइस अल्झाइमर ने पहचाना था| इस लिए यह रोग उन के नाम से जाना जाता है। पर यह रोग नया नहीं है। इस के लक्षण तो हम सदियों से देखते आ रहे हैं, बस हम यह नहीं जानते थे कि ये लक्षण मस्तिष्क में हो रहे बदलाव के कारण हैं।

Alzheimer's disease-neuron death
  • अल्ज़ाइमर रोग में मस्तिष्क में हो रही हानि की खास पहचान हैं बीटा-एमीलायड प्लैक और न्यूरोफिब्रिलरी टैंगल| सरलता के लिए इन्हें अकसर सिर्फ प्लैक और टैंगिल  भी बुलाया जाता है|
  • इन असामान्य खण्डों की वजह से मस्तिष्क के सेल (कोशिकाएं, न्यूरोन) मरने लगते हैं|
  • सेल एक दूसरे को सन्देश ठीक से नहीं पहुंचा पाते|
  • मस्तिष्क सिकुड़ने लगता है|
  • हानि अकसर मस्तिष्क के हिप्पोकैम्पस भाग में शुरू होती है, और धीरे धीरे सभी भागों में फैलने लगती है|
  • जैसे-जैसे हानि बढ़ती है, मस्तिष्क के अनेक भाग भी ठीक काम नहीं कर पाते|

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अल्ज़ाइमर रोग के लक्षण (Symptoms of Alzheimer’s Disease)|

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अकसर हिप्पोकैंपस क्षेत्र अल्ज़ाइमर में सबसे पहले प्रभावित होता है। इस क्षेत्र का सम्बन्ध सीखने और याददाश्त से है।
  • अल्ज़ाइमर रोग में शुरू का आम लक्षण है याददाश्त की समस्या। इस लिए इस रोग को कई लोग भूलने की बीमारी कहते हैं|
  • यह स्मृति-लोप की समस्या बहुत धीरे-धीरे बढ़ती हैं| यह विशेष तौर से हाल में हुई बातों को याद करने की कोशिश करते वक्त नजर आती है|
  • अन्य शुरू के लक्षण हैं डिप्रेशन (यानि कि अवसाद), अरुच और उदासीनता|

मस्तिष्क ठीक काम नहीं कर पाता, इसलिए अन्य लक्षण भी नजर आते हैं| कुछ उदाहरण पेश हैं:

  • जगह और समय क्या है, यह ठीक से मालूम नहीं होना| भटकने की समस्या आम है|  |
  • साधारण रोज-रोज के काम करने में दिक्कत होना, काम बहुत धीरे-धीरे करना या उन में मदद की जरूरत होना|
  • ध्यान लगाने में दिक्कत|
  • नई चीजें न सीख पाना |
  • अपनी बात बताने में दिक्कत|  दूसरों की बातें समझने में दिक्कत| भाषा की दिक्कत,| लिखने में दिक्कत|
  • चीजें पहचानने में दिक्कत| चित्रों को पहचान ना पाना| दूरी का अंदाजा ठीक से नहीं लगा पाना|
  • सोचने में और तर्क करने में दिक्कत| हिसाब करने में दिक्कत| समस्याएँ ना सुलझा पाना|  निर्णय लेने में दिक्कत |
  • व्यक्तित्व और मूड में बदलाव, जैसे कि दूसरों से दूर रहने लगना, चिड़चिड़ा होना |
  • भ्रम होना|

अल्ज़ाइमर रोग में कई उप-प्रकार हैं, जिन में कुछ असामान्य अल्ज़ाइमर रोग (Atypical Alzheimer’s Disease) भी हैं, और इन में लक्षण सामान्य अल्ज़ाइमर रोग से कुछ अलग होते हैं।
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समय के साथ अल्ज़ाइमर रोग का बढ़ना (Progression of Alzheimer’s Disease)|

अल्ज़ाइमर रोग एक प्रगतिशील रोग है। इस में समय के साथ-साथ हानि बढ़ती रहती है, और लक्षण भी उसी प्रकार गंभीर होते जाते हैं। शुरू में अकसर सिर्फ हिप्पोकैम्पस में हानि होती है, पर यह हानि  फैलती जाती है।

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अल्ज़ाइमर में मस्तिष्क के सेल (न्यूरोन) में हानि

रोग का व्यक्ति पर असर किस रफ्तार से और किस तरह बढ़ेगा यह हर केस में फर्क होता है। अंतिम चरण तक पहुँचते पहुँचते व्यक्ति सभी कामों के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं। व्यक्ति का चलना फिरना, बोल पाना, यहाँ तक कि खाना निगल पाना, सभी बहुत मुश्किल हो जाता है|  वे पूरे समय बिस्तर पर ही रहते हैं।

अल्ज़ाइमर रोग में मस्तिष्क में किस प्रकार हानि होती है, और समय के साथ यह कैसे बढ़ती है, यह देखने के लिए कुछ चित्रण पेश हैं , National Institute on Aging  USA के सौजन्य से|

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अल्ज़ाइमर रोग: कुछ अन्य तथ्य (Some other facts about Alzheimer’s Disease)|

बढ़ती उम्र और अल्ज़ाइमर  होने की  संभावना में सम्बन्ध है|

  • अल्ज़ाइमर की संभावना उम्र के साथ बढ़ती है, और खास तौर से 65  साल और अधिक होने  के बाद ज्यादा होती है। अधिकांश केस 65 और उससे  ज्यादा आयु  वाले लोगों में पाए जाते हैं|
  • एक जरूरी तथ्य यह है कि अल्ज़ाइमर रोग 65 से कम उम्र के लोगों में भी हो सकता है। इस को यंगर ऑनसेट अल्ज़ाइमर रोग (Younger Onset Alzheimer’s Disease, YOAD) या अर्ली ऑनसेट अल्ज़ाइमर रोग कहते हैं (Early Onset Alzheimer’s Disease, EOAD)|

अल्ज़ाइमर के कारक पर उपलब्ध जानकारी :

  • अल्ज़ाइमर रोग किसी को भी हो सकता है। इस का कोई स्पष्ट कारक नहीं मालूम है।
  • उम्र के साथ-साथ अल्ज़ाइमर रोग की संभावना बहुत बढ़ती है| उम्र बढ़ने को इस रोग का सबसे प्रमुख कारक माना जाता है|
  • यदि परिवार में किसी को अल्ज़ाइमर है, तो बच्चों में अल्ज़ाइमर की संभावना ज्यादा होती है। इस आनुवंशिकता को ठीक से समझने के लिए अभी रिसर्च चल रहा है।

अवधि:

  • यह रोग प्रगतिशील है और ला-इलाज भी, और इस की अवधि शुरू के लक्षण से लेकर व्यक्ति के मौत तक है। यह अवधि हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग है| ये अवधि कुछ साल से लेकर एक या दो दशक तक की हो सकती है।
  • कुछ अनुमान के अनुसार प्रारंभिक लक्षण से अंत तक व्यक्ति को औसतन आठ साल लगते हैं|

बचाव:

  • अल्ज़ाइमर से बचने का कोई पक्का तरीका अब तक मालूम नहीं है। इस पर जोर-शोर से शोध चल रहा है।
  • अब तक की समझ के हिसाब से कुछ चीजें  हैं जिन्हें अपनाने से इसकी संभावना कम होगी|
    • स्वस्थ जीवनशैली अपनाना, जैसे कि नियमित व्यायाम और पौष्टिक भोजन |हृदय स्वास्थ्य में इस्तेमाल तरीके अल्ज़ाइमर रोग से बचाव के लिए भी अपना सकते हैं|
    • सक्रिय और सकारात्मक जीवन बिताना, और अर्थपूर्ण काम करना|
    • अवसाद, यानि कि  डिप्रेसन से बचना|
    • ऐसे काम करना जिन से मस्तिष्क सक्रिय रहे|
    • लोगों से मिलना-जुलना| सामाजिक गतिविधियों में भाग लेना|
    • कुछ स्वास्थ्य समस्याओं से खास तौर बचना, जैसे कि मधुमेह, उच्च रक्तचाप, उच्च कोलेस्ट्रोल, और हृदय रोग। यह  समस्याएँ हों  तो इन को नियंत्रण में रखना|
    • तंबाकू सेवन बंद करना|
    • मद्यपान सीमित रखना|

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अल्ज़ाइमर रोग-निदान और उपचार (Diagnosis and Treatment of Alzheimer’s Disease)|

अल्ज़ाइमर रोग-निदान के लिए कोई एक विशिष्ट टेस्ट नहीं है। विशेषज्ञ अल्ज़ाइमर का डायग्नोसिस  पूरी चिकित्सीय जाँच के बाद ही दे सकते हैं। वे व्यक्ति के लक्षण समझने की कोशिश करते हैं, व्यक्ति की अन्य बीमारियों की जानकारी प्राप्त करते हैं, फैमिली मेडिकल हिस्ट्री लेते हैं, और परिवार वालों से भी बात करते हैं। खून के टेस्ट, मानसिक अवस्था के लिए टेस्ट, याददाश्त और सोचने-समझने के लिए टेस्ट, ब्रेन स्कैन, इत्यादि,  ये सब इस चिकित्सीय मूल्यांकन का भाग हैं।

रोग-निदान में गलतियाँ हो सकती है। कुछ उदाहरण पेश हैं|

  • लक्षण धीरे धीरे बढ़ते हैं| कई बार इन्हें बुढ़ापे की आम समस्या समझ कर नजरअंदाज कर दिया जाता है|
  • यदि व्यक्ति में अल्ज़ाइमर रोग सामान्य तरह से पेश नहीं हो, तो यह शायद न पहचाना जाए| उदाहरण है  कम उम्र में अल्ज़ाइमर होना|
  • क्योंकि अल्ज़ाइमर रोग के बारे में अन्य डिमेंशिया रोगों से ज्यादा जानकारी और जागरूकता है, इसलिए कभी-कभी मिलते-जुलते लक्षण देखने पर, बिना पूरी जाँच करे, व्यक्ति को अल्ज़ाइमर का रोग-निदान मिल सकता है। व्यक्ति को कोई दूसरी बीमारी है, यह शायद पहचाना न जाए। इस स्थिति में:
    • व्यक्ति को अन्य मौजूद बीमारी का इलाज नहीं मिल पाता है|
    • कुछ दवा जो अल्ज़ाइमर रोग में कारगर हैं, वे अन्य रोगों में नुकसान भी कर सकती हैं|

अच्छा यही होगा कि परिवार वाले संतोष कर लें कि रोग-निदान के समय सब जाँच हुई है|

रोग-निदान जितनी जल्दी हो, उतना अच्छा है, ताकि व्यक्ति उपलब्ध दवा का लाभ उठा सकें, और व्यक्ति और परिवार वाले, सब आगे के लिए योजना बना पाएँ|

इसका पूरा उपचार अब तक उपलब्ध नहीं है| 

  • वर्तमान में, दवा से अल्ज़ाइमर रोग न तो रुक सकता है, न ही उसकी प्रगति धीमी करी जा सकती हैं|
  • हालांकि मस्तिष्क में हो रही हानि के लिए कोई दवा नहीं है, पर ऐसी कुछ दवा हैं जिन से अल्ज़ाइमर के रोगियों को कुछ राहत मिल सकती है|
    • ये दवाएं लक्षणों में कुछ सुधार लाने के लिए इस्तेमाल होती हैं। यह कुछ लोगों में कारगर होती हैं, पर सब में नहीं, और यह शुरू की अवस्था में ज्यादा कारगर होती हैं।

दवा के अतिरिक्त, अन्य भी कई तरीके हैं जिन से व्यक्ति की सहायता करी जा सकती है| उदाहरण हैं घर और वातावरण में बदलाव, और देखभाल और बातचीत के बेहतर तरीके इस्तेमाल करना। व्यक्ति की खुशहाली के लिए इन्हें अपनाना बहुत जरूरी है|
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उपलब्ध जानकारी और सपोर्ट पर कुछ कमेन्ट (Available information and resources: some comments)|

डिमेंशिया अनेक रोगों की वजह से हो सकता है, और इन में से अल्ज़ाइमर रोग पर सब से ज्यादा चर्चा होती है। डिमेंशिया समर्थन पर काम करने वाली संस्थाओं के नाम में अकसर अल्ज़ाइमर शब्द होता है, जैसे कि “अल्ज़ाइमर असोसिअशन” या “अल्ज़ाइमर सोसाइटी”। भारत में राष्ट्रीय स्तर के संगठन के नाम में भी अल्ज़ाइमर शब्द है: Alzheimer’s and Related Disorders Society of India (ARDSI)। लेखों में, खबरों में, अन्य जागरूकता के लिए करे गए कार्यक्रमों में, सब में अल्ज़ाइमर और डिमेंशिया दोनों शब्दों का अदल-बदल कर इस्तेमाल होता है। इस कारण यह नाम भी कई लोग पहचानते हैं| पर इस में क्या लक्षण हैं, और उन का व्यक्ति और परिवार पर क्या असर होता है, इस पर जानकारी कम है।

कई लोग अल्ज़ाइमर को भूलने की बीमारी समझते हैं या इसे वृद्धों की बीमारी के रूप में ही जानते हैं। लोग यह नहीं जानते कि व्यक्ति को बहुत तरह की दिक्कतें होती हैं और समय के साथ-साथ व्यक्ति पूरी तरह लाचार हो जाते हैं, या यह कम उम्र में भी हो सकता है। यानि कि, नाम की पहचान तो है, पर इस रोग का किस-किस पर और कितना गंभीर असर होता है, इस के बारे में  कई गलत धारणाएँ हैं।

परिवार में यदि किसी को अल्ज़ाइमर है, तो देखभाल की जरूरत होती है, और व्यक्ति की सहायता का काम समय के साथ बढ़ता जाता है। देखभाल कई साल करनी होती है| इस के लिए परिवार को सही जानकारी, सलाह और सेवाओं की जरूरत होती है। पर भारत में ऐसी बहुत ही कम संस्थाएं और सेवाएं हैं जो उचित जानकारी और सहायता दे सकती हैं।

अफ़सोस, कुछ लोग अल्ज़ाइमर रोग से संबंधित आशंका और भय का फायदा उठाते हैं। वे अपनी संस्था या सेवा के लिए दावा करते हैं कि वे अल्ज़ाइमर रोगियों को उचित सहायता और सेवा प्रदान कर पायेंगे| वे  कभी-कभी यह भी गलत दावा करते है कि वे अधिकृत संस्थाओं से जुड़े हैं। पर वास्तव में उनकी जानकारी बहुत ही सीमित होती है। किसी के भी दावे पर विश्वास करने से पहले ऐसे दावों की पुष्टि करनी जरूरी है।

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अल्ज़ाइमर रोग: मुख्य बिंदु (Salient Points of Alzheimer’s Disease)

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  • अल्ज़ाइमर रोग डिमेंशिया का सबसे आम कारण है|  यह डिमेंशिया के करीब 50 से 75% केस के लिए जिम्मेदार है|
    • यह अकेले भी पाया जाता है, और अन्य डिमेंशिया के साथ भी मौजूद हो सकता है (जैसे कि संवहनी मनोभ्रंश या लुई बॉडी डिमेंशिया के साथ)|
  • शुरू में इस का आम लक्षण है याददाश्त की समस्या। अन्य आम शुरू के लक्षण हैं अवसाद और अरुचि।
    • लक्षण धीरे धीरे बढ़ते हैं, और शुरू में पता नहीं चलता कि कुछ गड़बड़ है|
    • समय के साथ लक्षण बढ़ते जाते हैं और मस्तिष्क के सभी कामों में दिक्कत होने लगती है|
    • अंतिम चरण में व्यक्ति पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं|
  • इस को रोकने या ठीक करने के लिए दवा नहीं है, पर लक्षणों से राहत देने के लिए कुछ दवा और गैर-दवा वाले उपचार हैं|
  • इस से बचने के लिए कोई पक्का तरीका मालूम नहीं है| पर यह माना जाता है कि स्वस्थ जीवन शैली से, व्यायाम से, सक्रिय जीवन बिताने से कुछ बचाव होगा
    • हृदय स्वास्थ्य के लिए जो कदम उपयोगी है, वे इस से बचाव में भी उपयोगी हैं (What is good for the heart is good for the brain).

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(नोट्स: अधिक जानकारी के लिए लिंक और श्रेय) (Notes: Links and Credits)|

*1अन्य प्रमुख डिमेंशिया और उनके लिए लिंक हैं  संवहनी डिमेंशिया (वैस्कुलर डिमेंशिया, Vascular dementia), लुई बॉडी डिमेंशिया (Lewy Body Dementia), और फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया (Frontotemporal Dementia, FTD)|

और जानकारी के लिए देखें:
मस्तिष्क में बदलाव पर हिंदी में वीडियो |
एक वीडियो परिचय, डिमेंशिया सलाहकार Atiq Hassan (Bradford,UK)द्वारा:

अल्जाइमर रोग पर एक तीन मिनट का हिंदी “पॉकेट” वीडियो: एल्ज़ाइमर्ज़ रोग क्या है|

इस विषय पर हमारे हिंदी पृष्ठ भी देखें:  डिमेंशिया किन रोगों के कारण होता है (Diseases that cause dementia),निदान, उपचार, बचाव (Dementia Diagnosis, Treatment, Prevention)|
कुछ अन्य हिंदी लिंक हैं भारत में स्थित “वाइट स्वान फ़ाउंडेशन फ़ॉर मेंटल हेल्थ”के वेबसाइट पर दो पृष्ठ: अल्ज़ाइमर रोग की समझ Opens in new window और अल्ज़ाइमर रोग Opens in new window, और अमरीका में स्थित Alzheimer’s Association, USA का पृष्ठOpens in new window.
कुछ अंग्रेज़ी लिंक:
What Is Alzheimer’s?(Alzheimer’s Association, USA) Opens in new window और Alzheimer’s disease? (Alzheimer’s Society, UK) (अंग्रेज़ी PDF डाउनलोड उपलब्ध) Opens in new window|

अल्ज़ाइमर रोग और संबंधित विकारों के लिए कुछ शब्द/ वर्तनी पेश है:

  • अल्ज़ाइमर रोग, अल्जाइमर, अल्जाइमर्ज़, अलजाइमर, अलज़ाइमर, एलसायमरस, अलज़ाईमर, एल्ज़ाइमर्ज़, एल्ज़ाइमर, बीटा-एमीलायड प्लैक, न्यूरोफिब्रिलरी टैंगिल|
  • Alzheimer’s Disease, beta amyloid plaque, neurofibrillary tangles, young onset Alzheimer’s Disease, early-onset Alzheimer’s Disease, mixed dementia, Atypical Alzheimer’s disease, Posterior cortical atrophy (PCA), Logopenic aphasia, Frontal variant Alzheimer’s disease.
श्रेय: (Public domain pictures) neuron death picture: 7mike5000 [CC BY-SA 3.0], via Wikimedia Commons, hippocampus: By Derivative work: Looie496 (File:Gray739.png) [Public domain], via Wikimedia Commons, Pictures of brain changes in AD, and brain shrinkage: By National Institute on Aging [Public domain], via Wikimedia Commons, brain lobes image: Henry Vandyke Carter [Public domain], via Wikimedia Commons.

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डिमेंशिया/ अल्ज़ाइमर देखभाल पर हिंदी वेबसाइट (Informational Hindi websites on dementia / caregiving)

डिमेंशिया/ देखभाल जानकारी वाले वेबसाइट. अल्जाइमर (Alzheimer’s Disease) की राष्ट्रीय या प्रांतीय संस्थाएं. अन्य डिमेंशिया रोगों की राष्ट्रीय/ अंतर-राष्ट्रीय संस्थाएं. फोरम. कई साईट में केयरगिवर मैनुअल डाउनलोड के लिए उपलब्ध. …

पूरे पोस्ट के लिए यहाँ क्लिक करें : डिमेंशिया/ अल्ज़ाइमर देखभाल पर हिंदी वेबसाइट (Informational Hindi websites on dementia / caregiving)

इन्टरनेट पर डिमेंशिया (मनोभ्रंश)/ अल्ज़ाइमर सम्बंधित अधिकांश जानकारी अँग्रेज़ी में है. इस प्रकार की जानकारी विभिन्न देशों के अल्ज़ाइमर / डिमेंशिया संस्थाओं द्वारा उनके वेबसाइट पर उपलब्ध है. कई साईट Alzheimer’s Disease के राष्ट्रीय या प्रांतीय संस्थाओं के हैं. अन्य प्रकार के डिमेंशिया के भी राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय वेबसाइट हैं, जैसे कि फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया (Fronto Temporal Dementia, FTD) या लुई-बॉडी डिमेंशिया (Lewy Body Dementia, LBD). इन में खास डिमेंशिया रोग (FTD, LBD, etc.) और सम्बंधित देखभाल पर जानकारी और सलाह मौजूद है. कई साईट पर देखभाल कर्ताओं के लिए उपयोगी डाउनलोड भी हैं. कुछ साईट पर ऑनलाइन समुदाय (कम्यूनिटी, caregiver community) भी हैं जहाँ देखभाल करने वाले आपस में समस्याओं और सुझावों का आदान प्रदान कर सकते हैं.

कुछ अल्ज़ाइमर संगठनों ने अल्ज़ाइमर/ डिमेंशिया जानकारी अनेक भाषाओं में भी उपलब्ध कराई है. अपने देश के प्रवासियों की सुविधा के लिए कुछ राष्ट्रों की Alzheimer’s Association ने कुछ सरल पत्रिकाएँ अन्य भाषाओं में भी प्रकाशित करी हैं. उदाहरण के तौर पर, ऑस्ट्रेलिया में ऐसे कई लोग रहते हैं जो अँग्रेज़ी के अलावा अन्य भाषाएँ बोलते हैं–उनकी सुविधा के लिए ऑस्ट्रेलिया के डिमेंशिया संगठन के वेबसाइट पर डिमेंशिया जानकारी अनेक भाषाओं में उपलब्ध है–इन भाषाओं में हिंदी और कुछ अन्य भारतीय भाषाएँ भी हैं. अन्य देशों के Alzheimer’s Association वेबसाइट पर भी कुछ हिंदी पत्रिकाएँ हैं.

अन्य देशों द्वारा उपलब्ध कराई गयी जानकारी डिमेंशिया के लक्षण और उपचार को समझने के लिए बहुत उपयोगी हैं. देखभाल पर भी अच्छी जानकारी है. पर इन पत्रिकाओं में जानकारी उस देश में रहने वालों के लिए है, और सहयोगी सेवाओं पर चर्चा करते हुए इन में यह माना गया है कि डिमेंशिया से जूझ रहे परिवारों को उचित और पर्याप्त सहायता मिल पायेगी. यह जानकारी जिन देशों के लिए लिखी गयी है वहाँ डिमेंशिया की जागरूकता अधिक है, और उपलब्ध सहायता भी ज्यादा और अनेक किस्म की है. भारत में स्थित परिवारों के लिए आज-कल के हालत में यह सच नहीं है.

भारत में भी कुछ अल्ज़ाइमर/ डिमेंशिया और देखभाल जानकारी हिंदी में इन्टरनेट पर उपलब्ध है. यह जानकारी भारत में रहने वालों के लिए लिखी गयी है.

हिंदी में जानकारी आपको इन लिंक पर मिल सकती हैं: [अस्वीर्करण]

हिंदी के अतिरिक्त अन्य भारतीन भाषाओं में इन्टरनेट पर डिमेंशिया/ देखभाल पर पत्रिकाएं और वेबसाइट के बारे में जानकारी हमारे अँग्रेज़ी वेबसाइट पर देखें: Dementia Information in Bengali, Gujarati, Hindi,Malayalam, Marathi, Punjabi, Tamil, Telugu, Urdu Opens in new windowयहाँ आपको बंगाली, गुजराती, मलयालम, मराठी, पंजाबी, तमिल, तेलगू, और उर्दू भाषाओं में उपलब्ध जानकारी के लिए लिंक मिलेंगे.

इस पृष्ठ का अँग्रेज़ी संस्करण यहाँ उपलब्ध है: Informational websites on dementia / caregiving Opens in new window. इस अँग्रेज़ी पृष्ठ पर डिमेंशिया और देखभाल के विषय पर अँग्रेज़ी और अनेक भारतीय भाषाओं में उपलब्ध जानकारी के लिए कई लिंक हैं. भिन्न-भिन्न प्रकार के डिमेंशिया के कारक रोगों के लिए वेबसाइट लिंक (अँग्रेज़ी) आप यहाँ देख सकते हैं: डिमेंशिया किन रोगों के कारण होता है(Diseases that cause dementia)

उपयोगी अँग्रेज़ी पुस्तकों और DVD पर जानकारी के लिए हमारे अँग्रेज़ी पृष्ठ को देखें: Books and DVDs Opens in new window

अस्वीकरण: ये लिंक सिर्फ यहाँ आपकी सुविधा के लिए दिए गए हैं. हम इन लिंक पर उपलब्ध जानकारी की विश्वसनीयता, सटीकता, समयबद्धता और वास्तविकता के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं.

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डिमेंशिया और अल्ज़ाइमर में फ़र्क क्या है (What is the Difference between Dementia and Alzheimer’s?)

लोग अकसर पूछते हैं कि डिमेंशिया और अल्जाइमर में फ़र्क क्या है.

इस वीडियो में, सरल तरीके से, रेखा चित्र का इस्तेमाल करके डिमेंशिया और अल्जाइमर के बीच का सम्बन्ध समझाया गया है. यह वीडियो हिंदी और अँग्रेज़ी में उपलब्ध है.

हिंदी और अँग्रेज़ी वीडियो को पृष्ठ पर प्लेयर में देखें, या यूट्यूब के लिंक का इस्तेमाल करें.

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लोग अकसर पूछते हैं कि डिमेंशिया और अल्जाइमर में फ़र्क क्या है.

इस वीडियो में, सरल तरीके से, रेखा चित्र का इस्तेमाल करके डिमेंशिया (मनोभ्रंश) और अल्ज़ाइमर के बीच का सम्बन्ध समझाया गया है. यह वीडियो हिंदी और अँग्रेज़ी में उपलब्ध है.

हिंदी में देखें (यदि वीडियो प्लेयर नीचे लोड न हो रहा हो तो आप इस हिंदी वीडियो को सीधे यूट्यूब पर भी देख सकते हैं Opens in new window)

अँग्रेज़ी में देखें: (यदि वीडियो प्लेयर नीचे लोड न हो रहा हो तो आप इस अँग्रेज़ी वीडियो को सीधे यूट्यूब पर भी देख सकते हैं Opens in new window)

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निदान, उपचार, बचाव (Dementia Diagnosis, Treatment, Prevention)

किसी व्यक्ति को डिमेंशिया है या नहीं, ये सिर्फ डॉक्टर बता सकते हैं, और वह भी सिर्फ उचित जांच के बाद. यदि आप किसी व्यक्ति में डिमेंशिया के लक्षण देखें, तो सही रोग-निदान (diagnosis) के लिए डॉक्टर से सलाह करें. डॉक्टर निर्धारित करेंगे कि व्यक्ति को डिमेंशिया है या नहीं, और है तो किस रोग के कारण है, और उपचार क्या है.

इस पृष्ठ पर:

  • डिमेंशिया किसी को भी हो सकता है.
  • शुरू की अवस्था में ही निदान (early diagnosis) क्यों ज़रूरी है.
  • किस से सलाह करें>.
  • निदान (Diagnosis)
  • निदान-संबंधी समस्याएँ (Problems related to diagnosis)
  • निदान के बाद (After the diagnosis)
  • उपचार, शोध (Treatment and research)
  • बचाव (risk reduction)
  • आनुवंशिकी (यदि किसी करीबी रिश्तेदार को डिमेंशिया हो)(Genetics risk if close relatives have dementia)
  • इन्हें भी देखें.

डिमेंशिया किसी को भी हो सकता है

पूरे पोस्ट के लिए यहाँ क्लिक करें : निदान, उपचार, बचाव (Dementia Diagnosis, Treatment, Prevention)

किसी व्यक्ति को डिमेंशिया (मनोभ्रंश) है या नहीं, ये सिर्फ डॉक्टर बता सकते हैं, और वह भी सिर्फ उचित जांच के बाद. यदि आप किसी व्यक्ति में डिमेंशिया के लक्षण देखें, तो सही रोग-निदान (diagnosis) के लिए डॉक्टर से सलाह करें. डॉक्टर निर्धारित करेंगे कि व्यक्ति को डिमेंशिया है या नहीं, और है तो किस रोग के कारण है, और उपचार क्या है.

क्या आप डिमेंशिया की गंभीरता पहचानते हैं, और इस से बचने की लिए क्या करें, यह जानना चाहते हैं? देखें: डिमेंशिया/ अल्जाइमर से कैसे बचें: चित्रण और प्रस्तुति.

इस पृष्ठ पर:

डिमेंशिया किसी को भी हो सकता है

डिमेंशिया किसी को भी हो सकता है. यह जात-बिरादरी, भाषा, प्रान्त, मज़हब, अमीरी-गरीबी, सामाजिक स्तर, नर-मादा, किसी का भी भेद-भाव नहीं करता. इसकी संभावना उम्र के साथ बढ़ती ज़रूर है, और 65 साल के बाद ज्यादा पाई जाती है, पर कुछ लोगों को डिमेंशिया 30, 40, या 50 की उम्र में भी हो जाता है.

लोगों में एक आम धारणा है कि बुद्धिमान और सक्रिय लोगों को डिमेंशिया नहीं होगा. वे कहते हैं, “हम तो रोज शब्द-पहेली (crossword)/ सू-डो-कू (sudoku) करते हैं, हमें डिमेंशिया नहीं होगा”. पर यह धारणा गलत है. कई ऐसे व्यक्ति, जो जिन्दगी भर शारीरिक और मानसिक रूप से सक्रिय रहे हैं, वे आज डिमेंशिया से ग्रस्त हैं.

मीडिया में डिमेंशिया को अकसर बुजुर्गों के रोग के तौर से पेश किया जाता है, या भूलने की बीमारी कहा जाता है. यह गलत है, और इससे व्यक्ति और आस-पास वालों की लक्षणों के प्रति सतर्कता कम हो सकती है. डॉक्टर भी इस भ्रम में हो सकते हैं, जिससे निदान मिलने में भी देर हो सकती है.

भारत में, क्योंकि डिमेंशिया के प्रति जागरूकता कम है, हमें डिमेंशिया के लक्षणों के प्रति अधिक सतर्क रहना चाहिए ताकि हम शुरुआती अवस्था में ही इसे पहचान सकें और इसका निदान करवा सकें, और व्यक्ति की देखभाल के लिए अपने-आप को ढाल सकें.

कुछ जाने-माने डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति: अमरीकन प्रेसिडेंट रोनाल्ड रीगन, इंग्लेंड की पूर्व प्रधान मंत्री मार्गरेट थैचेर
और भारत से: तेजी बच्चन (अमिताभ बच्चन के माँ) जोर्ज फर्नांडीस, सरोजिनी नायडू

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शुरू की अवस्था में ही निदान (early diagnosis) क्यों ज़रूरी है

लक्षणों को शुरुआती चरण में न पहचान पाना एक आम समस्या है. याददाश्त में प्रॉब्लम हो भी तो इसे बढ़ती उम्र का नतीजा समझा जाता है, और व्यक्ति या परिवार डॉक्टर से सामान्य चेक-उप के वक्त इसका ज़िक्र तक नहीं करते. यह डर हो भी कि शायद समस्या गंभीर है, फिर भी डॉक्टर के पास जाने में संकोच होता है. अन्य समस्याओं में भी–जैसे कि कन्फ्यूशन, उदासीनता, चरित्र में बदलाव–लोग यह नहीं सोचते कि यह किसी बीमारी के कारण हैं, और डॉक्टर से सलाह नहीं करते. कहता हैं, डॉक्टर कुछ नहीं कर पायेंगे.

प्रारंभिक अवस्था में निदान का सबसे बड़ा फायदा यह है कि कुछ रोग ऐसे हैं जिन से डिमेंशिया जैसे लक्षण होते हैं, पर इन रोगों का इलाज है (reversible causes), और इलाज करने से लक्षण दूर हो जाते हैं. यदि डॉक्टर के पास जाएँ, तो व्यक्ति की स्थिति फिर से सामान्य हो सकती है. ऐसे रिवर्सब्ल रोग के उदाहरण: थाइरोइड हार्मोन की कमी, अवसाद, तनाव, वगैरह (इस विषय पर विस्तृत चर्चा के लिए कुछ लिंक नीचे “इन्हें भी देखें” सेक्शन में हैं)

अधिकाँश डिमेंशिया इर्रिवर्सिब्ल है, यानि कि दवाई से रोग के कारण हुई हानि ठीक नहीं हो सकती. फिर भी, इन में से कुछ डिमेंशिया ऐसे हैं जिन में प्रारंभिक अवस्था में दवाई के लक्षणों में कुछ देर तक कुछ राहत मिल सकती है, इसलिए डॉक्टर से सलाह कर लेनी चाहिए. निदान हो, तो व्यक्ति को कुछ तो राहत मिलने की संभावना है.

अगर डिमेंशिया किसी ऐसे रोग की वजह से है जो लाइलाज है, और जिसमे राहत भी संभव नहीं, फिर भी निदान होने से परिवार वाले स्थिति को समझ पायेंगे. वे आगे के बारे में सोच सकते हैं और देखभाल की योजना बना सकते हैं.

अकसर लक्षण प्रकट होने के बाद भी व्यक्ति और परिवार निदान करवाने की कोशिश नहीं करते.

याददाश्त में समस्या होना कई प्रकार के डिमेंशिया का एक शुरुआती लक्षण है. परन्तु कई लोग याददाश्त के कमज़ोर होने को उम्र-बढ़ने का सामान्य भाग समझते हैं, और इसलिए डॉक्टर से चेक-अप के दौरान इसका ज़िक्र नहीं करते और न ही सलाह लेते हैं. कुछ अन्य लोग, जिन्होंने डिमेंशिया के बारे में सुना है, वे डर के मारे किसी को अपनी समस्या के बारे में नहीं बताते क्योंकि डिमेंशिया की समाज में जानकारी अधूरी है, और कई लोग इसे मानसिक रोग या पागलपन कह देते हैं, और इसका होने शर्मनाक समझा जाता है. इन कारणों की वजह से, कई डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्तियों का शुरुआती समय में निदान नहीं होता, और परिवार वाले व्यक्ति को डॉक्टर के पास तभी के जाते हैं जब डिमेंशिया मध्य या अग्रिम अवस्था में होता है और इसके लक्षणों के कारण इतनी तकलीफ होने लगती है कि उन्हें नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता.

डिमेंशिया के अन्य प्रारंभिक लक्षण भी हो सकते हैं, जैसे कि व्यक्तित्व में बल्दाव, बोलने में दिक्कत होना, सामाजिक तौर-तरीके भूल जाने, चलने या संतुलन में दिक्कत, लोगों से कटे कटे रहना, वगैरह. यह भी हो सकता है कि याददाश्त सही रहे, पर अन्य लक्षण नज़र आएँ. यदि व्यक्ति और परिवार वाले सतर्क हों, तो वे डॉक्टर से सलाह कर के सही निदान पा सकते हैं.

इस तरह निदान देर से करने से व्यक्ति और परिवार, दोनों को नुक्सान होता है.

यह भी संभव है कि व्यक्ति को ऐसे प्रकार का डिमेंशिया है जो दवाई से दूर नहीं किया जा सकता (और अधिकांश डिमेंशिया इसी प्रकार के होते हैं). पर इस स्थिति में भी, कुछ ऐसी दवाइयां हैं जो रोग तो नहीं दूर कर सकतीं, पर प्रकट लक्षण कम कर सकती हैं, जिससे व्यक्ति को (और परिवार को) राहत मिल सकती है, और व्यक्ति का जीवन पहले से अधिक सामान्य हो सकता है. शायद याददाश्त थोड़ी बेहतर हो जाए, तो कुछ तो आराम मिले. निदान को टालते रहने से व्यक्ति और परिवार इस राहत से वंचित रहते हैं. अधिकांश ऐसी दवाइयां प्रारंभिक अवस्थी में ज्यादा कारगर होती हैं.

जब शुरू में व्यक्ति कठिनाई महसूस करते हैं, तो वे घबरा जाते हैं, या शर्म महसूस करते हैं, क्योंकि वे समझ नहीं पाते कि उन्हें क्या हो रहा है. या तो वे औरों से बच कर रहने लगते हैं और सहमे सहमे रहते हैं, या बात बात पर गुस्सा करते हैं या शक करते हैं कि अन्य लोग ही कुछ कर रहे होंगे जिससे उन्हें प्रॉब्लम हो रही हैं. यह भी एक कारण है जिसकी वजह से व्यक्ति डॉक्टर के पास जाने की नहीं सोचते. डिमेंशिया की जागरूकता फैलेगी तो यह समस्या कम होगी.

जब व्यक्ति और परिवार यह नहीं जानते कि व्यक्ति की दिक्कतें किसी बीमारी के कारण हैं, तो वे रहने का, बातचीत करने का, और मदद करने का तरीका नहीं बदलते, और व्यक्ति से उम्मीद की जाती है कि वह एक सामान्य स्वस्थ बुज़ुर्ग की तरह अपने सब काम कर पायेगा और बातों को समझ पायेगा. जब यह नहीं होता, तो सभी परेशान हो जाते हैं, और परिवार का माहौल बिगड़ने लगता है. लोग एक दूसरे पर गुस्सा करते हैं, या दुखी रहते हैं. परन्तु यदि सही समय पर व्यक्ति का निदान हो जाए, तो परिवार वाले भी अपने तरीके बीमारी की समस्याओं के अनुरूप बदल पाते हैं और घर में तनाव कम हो जाता है. देखभाल के सही तरीके सीखना और उपयोग में लाना तभी हो सकता है जब परिवार समझे कि व्यक्ति को डिमेंशिया है, और फिर उस के लिए बोलचाल और अन्य तरीके बदले. शुरू की अवस्था में निदान हो जाए तो सालों का तनाव बच सकता है.

इन सब कारणों का ख़याल रखते हुए, यही अच्छा है कि परिवार वाले सतर्क रहें, और अगर लक्षण देखें तो डॉक्टर से जांच करा लें.

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किस से सलाह करें

अगर आप देखें कि कोई व्यक्ति डिमेंशिया जैसे लक्षण दिखा रहा है, तो आप फैमिली डॉक्टर या GP से सलाह कर सकते हैं. डॉक्टर कुछ जांच करके, यदि ज़रूरी हो, तो विशेषज्ञ के पास भेज देंगे. पर अफ़सोस, कई डॉक्टर भी डिमेंशिया के बारे में अधिक नहीं जानते और बढ़ती उम्र के लोगों की समस्या को यह कह कर टाल देते हैं कि उम्र बढ़ेगी तो यह सब तो होगा ही. कुछ तो हंस कर मजाक भी उड़ा देते हैं. या अगर व्यक्तित्व में बदलाव है तो उसे घर का अंदरूनी मामला कह देते हैं या मानसिक रोग का निदान दे देते हैं. जल्दी शुरू होने वाले डिमेंशिया को पहचानने में अकसर देर होती है, क्योंकि डॉक्टर भी इसी भ्रमित ख़याल में रहते हैं कि डिमेंशिया बुजुर्गों में पाया जाता है.

यदि आप डॉक्टर की बात से संतुष्ट न हों, या आप देखें कि डॉक्टर आपकी बात को गंभीरता से नहीं ले रहा, तो अन्य किसी डॉक्टर के पास जाएँ. ऐसे डॉक्टर को ढूँढें जिन्हें डिमेंशिया का अनुभव हो. आप सीधे विशेषज्ञ के पास भी जा सकते हैं.

स्पष्ट निदान पाने के लिए अनेक टेस्ट ज़रूरी हैं, और अकसर ये विशेषज्ञ ही करेंगा. विशेषज्ञ यह भी बताएंगे कि डिमेंशिया किस रोग के कारण है. आप किसी भी अस्पताल के न्यूरोलॉजी विभाग के बाह्य रोगी विभाग (OPD) से सम्पर्क करके मिलने का समय के सकते हैं. अन्य डिपार्टमेंट जहाँ आपके उचित विशेषज्ञ मिल सकते हैं: मनोचिकित्सा (साईकाइट्री, psychiatry), जीरियाट्रिक्स (geriatrics). कुछ अस्पतालों में मेमोरी क्लिनिक भी होते हैं. अगर आपके शहर में ARDSI का चैप्टर है, तो आप उनसे भी सम्पर्क कर सकते हैं. कुछ शहरों में मेमोरी क्लिनिक भी हो सकते हैं, जहाँ सलाह मिल सकती है.

कभी कभी लक्षण दिखाने वाला व्यक्ति यह नहीं मानता कि उसे कोई प्रॉब्लम है, और डॉक्टर के पास जाने से साफ़ इंकार कर देता है. ऐसे में परिवार वाले डॉक्टर से मिल कर निवेदन कर सकते हैं कि डिमेंशिया की जांच उस व्यक्ति के सामान्य, नियमित चेक-उप में जोड़ दी जाए, और जब व्यक्ति को अन्य चेक-उप के लिए डॉक्टर के पास ले जाएँ, तब डॉक्टर डिमेंशिया के टेस्ट भी कर लें.

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निदान (Diagnosis)

डिमेंशिया के निदान में कई कदम है, और अनेक टेस्ट होते हैं. सिर्फ एकाध सवाल पूछ कर डिमेंशिया का निदान नहीं किया जा सकता. डिमेंशिया का निदान सिर्फ डॉक्टर कर सकते हैं. यह एक क्लिनिकल (चिकित्सकीय) निदान है. यह निदान डॉक्टर व्यक्ति की सही प्रकार से जांच करने के बाद ही कर सकते हैं.

निदान करने के लिए डॉक्टर के लिए सबसे प्रमुख जानकारी है व्यक्ति का इतिहास और यह समझना कि व्यक्ति को किस किस प्रकार की समस्याएँ हैं और वे कौन सी दवाइयाँ ले रहे हैं, और क्या वे अपने काम कर पा रहे हैं या नहीं. परिवार वालों को सब फाइल और मेडिकल रिकॉर्ड पेश करने के लिए तैयार रहना चाहिए और लक्षण समझाने के लिए भी तैयार रहना चाहिए.

डॉक्टर लक्षणों से पीड़ित व्यक्ति से कई सवाल पूछेंगे, जैसे कि तारीख क्या है, अपना नाम और पता बताएं, कुछ छोटे जोड़ने/ घटाने के सवाल. वे व्यक्ति से कुछ छोटे काम भी करायेंगे, जैसे कि कोई चित्र को कॉपी करना, चित्र पहचानना, एक सूची में दिए गए शब्द याद करके दोहराना. इन सबसे डॉक्टर उस व्यक्ति की संज्ञानात्मक बाधकता (cognitive impairment) का अंदाजा लगाएंगे. आपने जो लक्षण बताए हैं, और इस सवाल-जवाब का नतीजा देख कर, वे आगे के टेस्ट के बारे में तय करेंगे.

रक्त के टेस्ट करके डॉक्टर अन्य चीज़ों को देखेंगे, जैसे कि थाइरोइड हार्मोन (thyroid hormones) की कमी, विटामिन B12 की कमी, वगैरह.

दिमाग का स्कैन (MRI, PET scans, CT scans) करके डॉक्टर चेक करेंगे कि सामान्य दिमाग की तुलना में क्या इस व्यक्ति के दिमाग में कहीं कोई विकार है, या कुछ अधिक सिकुडन है, या अन्य कोई समस्या है जो लक्षणों का कारण हो सकती है. वे यह भी देखेंगे कि दिमाग के कौन से भाग सक्रिय हैं, और कौन से नहीं.

डॉक्टर यह समझने की कोशिश करेंगे कि प्रस्तुत लक्षण के क्या क्या कारण हो सकते हैं. यह कारण डिमेंशिया वाले रोग हैं, या अन्य रोग.

इन सब जांच के बाद ही डॉक्टर निदान करेंगे, और रोग के बारे में जानने पर, आगे क्या हो सकता है, परिवार वालों को यह अंदाजा मिलेगा.

परिवार वालों को डॉक्टर से अन्य संसाधन के बारे में भी पूछ लेना चाहिए, जैसे कि सपोर्ट ग्रुप, डिमेंशिया समर्थन संस्थाएं, सेवाएं देने वाली एजेंसी, कॉउसेलोर, इत्यादि. डॉक्टर का ध्यान अकसर सिर्फ दवाई और इलाज पर होता है, और वे बिना पूछे शायद यह जानकारी न दें.

कभी कभी निदान डिमेंशिया का नहीं, बल्कि मंद संज्ञानात्मक बाधकता (mild cognitive impairment) का होता है. यह डिमेंशिया नहीं है. मंद संज्ञानात्मक बाधकता से पीढित कुछ व्यक्ति सुधार दिखाते हैं या उसी स्तर पर रहते हैं, पर कुछ को डिमेंशिया हो सकता है. क्योंकि मंद संज्ञानात्मक बाधकता वाले व्यक्तियों में आगे बढ़कर डिमेंशिया होने की संभावना ज्यादा होती है, इसलिए इस निदान की स्थिति में अगला चेक-अप कब कराएं, यह डॉक्टर की सलाह से तय कर लेना चाहिए.

यह नोट करें कि जीन परीक्षा (genetic testing)निदान का भाग नहीं है, न ही कोई ऐसा खून का टेस्ट है जिससे अल्ज़ाइमर (Alzheimer’s Disease) का निदान हो सके. निदान के वक्त डॉक्टर यह देखते हैं कि क्या व्यक्ति को डिमेंशिया है (किसी भी रोग से होने वाला ऑल-कौज़ डिमेंशिया) (all-cause dementia, dementia that may be caused by anything) और यह भी देखने की कोशिश करते हैं कि डिमेंशिया का कौन सा कारक रोग है: अल्ज़ाइमर रोग (Alzheimer’s Disease), संवहनी मनोभ्रंश (नाड़ी-संबंधी, Vascular dementia), फ्रंटो-टेम्पोरल (Frontotemporal dementia), लुई बॉडी (Lewy Body Dementia), पार्किन्सन (Parkinson’s), इत्यादि).

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निदान-संबंधी समस्याएँ (Problems related to diagnosis)

भारत में डिमेंशिया का सही और पूरा निदान मिलना इतना आसान नहीं है, क्योंकि डिमेंशिया के बारे में कई डॉक्टरों को भी ठीक से जानकारी नहीं है, और उनका डिमेंशिया-निदान का अनुभव भी कम है. ऊपर से डिमेंशिया का निदान किसी एक टेस्ट या स्कैन से तय नहीं किया जा सकता. व्यक्ति को डिमेंशिया है या नहीं, और अगर है तो किस रोग के कारण है, और साथ में अन्य कौन कौन सी समस्याएं हैं, यह सब जान पाना पेचीदा काम है.

निदान में भूल-चूक कई प्रकार की हो सकती हैं. नीचे देखें कुछ उदाहरण (यह पूरी सूची नहीं है):

  • लक्षण को अनदेखा करना: डिमेंशिया के आरम्भ में, जब लक्षण मंद होते हैं, तो आस-पास के लोग ही नहीं, डॉक्टर भी लक्षण यह कह कर टाल देते हैं कि यह तो बुढापे का सामान्य अंश है.
  • किसी (डिमेंशिया से भिन्न) रोग का निदान देना: यह खासकर तब होता है जब व्यक्ति की स्थिति और प्रारंभिक लक्षण आम स्थिति और लक्षण से अलग है. अधिकांश डिमेंशिया बड़ी उम्र में ही होता है, और शुरुआती चिह्न है याददाश्त की समस्या है. इसलिए अगर डिमेंशिया 40-50 या उससे भी कम उम्र में हो, या जब शुरू के लक्षण उत्तेजना या अनुचित व्यवहार हों तो डॉक्टर शायद डिमेंशिया को न पहचान पाएँ. वे शायद कह दें कि समस्या मनोवैज्ञानिक है, या स्ट्रेस का प्रभाव है.
  • रोग ऐसा है जो इलाज से सुधर सकता है (reversible/ treatable cause), पर निदान किसी इर्रिवर्सबिल डिमेंशिया (irreversible dementia) का हो: डिमेंशिया के लक्षण कई कारण से पैदा हो सकते हैं. इन में ऐसे कारण भी हैं जो इलाज से ठीक हो सकते हैं, जैसे कि अवसाद (depression), थाइरोइड हार्मोन में कमी (hypothyroidism), कुछ प्रकार के संक्रमण (infections), और विटामिन B12 की कमी (vitamin B12 deficiency), वगैरह. जांच ठीक से न हो या पूरे न हो तो डॉक्टर गलत निदान दे सकते है, और इस गलत निदान के कारण व्यक्ति का सही इलाज नहीं होगा. व्यक्ति की समस्या दवाई से ठीक हो सकती थी, पर क्योंकि निदान गलत है, व्यक्ति को तकलीफ होती रहेगी.
  • किस इर्रिवर्सबिल डिमेंशिया (irreversible dementia) के कारण लक्षण हैं, इस पहचान में गलती: डिमेंशिया रोग कई तरह के हैं. डॉक्टर शायद यह तो पहचान पाएँ कि व्यक्ति के लक्षण का कारण कोई ऐसे रोग है जो इर्रिवर्सबिल (irreversible) है, पर इन में से कौन सा irreversible dementia है, यह गलत पहचानें. यह समस्या पैदा कर सकता है, क्योंकि कुछ ऐसी दवाइयाँ है जो एक प्रकार के डिमेंशिया रोग में मदद करती हैं, पर अन्य प्रकार के डिमेंशिया रोग में काम नहीं करतीं, बल्कि नुकसान भी कर सकती हैं. एक उदाहरण है लुई बॉडी डिमेंशिया वाले व्यक्ति को गलती से अल्ज़ाइमर रोग का निदान मिलना.
  • डिमेंशिया लक्षण कई रोगों के कारण हों, पर सिर्फ एक कारण पहचाना जाए: ऐसे में व्यक्ति का इलाज भी उसी पहचाने गए डिमेंशिया रोग के लिए करा जाएगा. हो सकता है कि अन्य रोग दवाई से सुधर सकते थे, जिससे लक्षण में सुधार हो सकता था, पर क्योंकि निदान पूरा नहीं है, व्यक्ति सही इलाज से वंचित रहेगा. बढ़ती उम्र में अकसर लोगों को अनेक बीमारियां होती हैं; यह सोचना कि लक्षण सिर्फ एक ही कारण से हैं शायद गलत हो. समय के साथ, जब लक्षण बिगड़ते हैं, तब भी यह गलती हो सकती है–शायद लक्षण किसी अन्य रोग के कारण बिगड रहे हों पर ये रोग इसलिए न पहचाने जाएँ क्योंकि डॉक्टर और परिवार यह सोचते रहें कि बिगड़ती हालत सब पहले के उस एक रोग के ही कारण हैं.

व्यक्ति की जांच ठीक तरह से हो, और निदान पूरा और सही हो, इसके लिए परिवार वालों को सक्रिय रहना होगा. उन्हें डिमेंशिया के लक्षण और पैदा करने वाले रोगों के बारे में जानकारी होनी चाहिए, और जांच के समय सतर्क रहना चाहिए, और कुछ संदेह हो तो डॉक्टर से प्रश्न पूछने में हिचकना नहीं चाहिए. डॉक्टर के निदान करने के तरीके से, या निर्णय से संतोष न हो तो अन्य डॉक्टर से सलाह कर लेनी चाहिए. पर ध्यान रखें, निदान सिर्फ डॉक्टर से करवाएं, खुद न सोच लें कि यह तो डिमेंशिया ही है, और डिमेंशिया लाइलाज है तो डॉक्टर के पास जाने के कोई ज़रूरत नहीं.

निदान में दिक्कतें और गल्तियाँ किस प्रकार की हो सकती हैं, इस पर इस पृष्ठ के अँग्रेज़ी संस्करण पर अधिक विस्तार से चर्चा है: लिंक नीचे “इन्हें भी देखें” सेक्शन में है

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निदान के बाद (After the diagnosis)

डिमेंशिया का निदान व्यक्ति और परिवार को हिला कर रख देता है, पर सही परामर्श के और समर्थन के साथ, व्यक्ति और परिवार सामान्य जिंदगी बिताने की कोशिश कर सकते हैं. डिमेंशिया है, इसका मतलब यह नहीं कि व्यक्ति अब कुछ नहीं कर पायेगा–सिर्फ करने के तरीके बदलेंगे औद कुछ सीमायें होंगी, जिन को समझने से व्यक्ति और परिवार अपनी जिंदगी उसके अनुरूप बदल सकते हैं. उचित जानकारी प्राप्त करके और परामर्श प्राप्त करके निदान के साथ समन्वय किया जा सकता है, और आगे की ज़िंदगी नियोजित करी जा सकती है. कुछ डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्तियों ने अपनी ज़िंदगी के बारे में विस्तार से लिखा है, और कुछ ने निदान के प्रति अपनी प्रतिक्रिया का वर्णन भी करा है. निदान से समन्वय कैसे करें, इस पर कुछ पत्रिकाएँ भी हैं. अधिक चर्चा के लिए इस पृष्ठ के अँग्रेज़ी संस्करण को देखें: लिंक नीचे “इन्हें भी देखें” सेक्शन में है.

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उपचार, शोध (Treatment and research)

फिलहाल अधिकांश डिमेंशिया के रोग लाइलाज हैं, पर कुछ दवाइयां हैं जो लक्षणों में आराम पंहुच सकता है. इस विषय पर लिंक के लिए इस पृष्ठ के अँग्रेज़ी संस्करण को देखें: लिंक नीचे “इन्हें भी देखें” सेक्शन में है.

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डिमेंशिया/ अल्जाइमर से कैसे बचें: चित्रण और प्रस्तुति (Presentation on how to reduce your risk of dementia).

बचाव के तरीकों का एक सरल चित्रण देखने के लिए क्लिक करें.: डिमेंशिया/ अल्जाइमर से कैसे बचें: चित्रण (Reduce the risk of dementia: infographic)

इस हिंदी प्रेजेंटेशन में देखिये डिमेंशिया किसे हो सकता है, इस के जोखिम कारक क्या हैं, और आप इस की संभावना कम करने के लिए क्या कर सकते हैं. यह प्रस्तुति अब तक के शोध पर आधारित है और इस में अनेक ऐसे कारगर उपाय हैं, जिन से डिमेंशिया की संभावना के साथ-साथ अन्य कई स्वास्थ्य समस्याओं की संभावना भी कम होगी. यदि प्लेयर नीचे लोड न हो रहा हो तो यहाँ क्लिक करें: डिमेंशिया/ अल्ज़ाइमर से कैसे बचें? Opens in new window


इन विषयों पर अधिक चर्चा नीचे के सेक्शन में देखें
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डिमेंशिया से बचाव (risk reduction)

वर्तमान जानकारी के अनुसार डिमेंशिया से पक्की तरह से बचे रहने का कोई तरीका नहीं है. परन्तु हम अपने जीवन में कुछ उचित बदलाव कर के डिमेंशिया होने की संभावना कम कर सकते हैं.

वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि अलग अलग कारकों का मस्तिष्क पर क्या असर होता है, और हम अपने मस्तिष्क को स्वस्थ कैसे रख सकते हैं. एक सम्बन्ध जो अब तक स्पष्ट है वह है कि उम्र बढ़ने से डिमेंशिया की संभावना बढ़ती है. शोध के आधार से वैज्ञानिकों ने कुछ जोखिम कारक (रिस्क फैक्टर, risk factor) पहचाने हैं और उन का मानना है कि इन को कम करने से डिमेंशिया की संभावना भी कम होगी. बचाव शत-प्रतिशत नहीं हो सकता, पर संभावना कम जरूर हो सकती है.

जोखिम कारकों को दो श्रेणियों में बांटा जाता है: अपरिवर्तनीय जोखिम कारक, और परिवर्तनीय जोखिम कारक. अपरिवर्तनीय जोखिम कारक ऐसे कारक हैं जिन के बारे में हम कुछ नहीं कर सकते, हम इन को दूर नहीं कर सकते. उदाहरण: उम्र बढ़ना, परिवार में अन्य खून-के रिश्तेदारों को डिमेंशिया होना, हमारे जीन में ApoE4 अलील का होना, डाउन सिंड्रोम होना, इत्यादि. इस लिए डॉक्टर यह सलाह देते हैं कि हम परिवर्तनीय कारकों पर ध्यान दें, और ऐसे बदलाव करें जिन से ये हों ताकि हमारी डिमेंशिया की संभावना कम हो.

डॉक्टरों के अनुसार, स्वस्थ जीवन शैली अपनाने से हम अपनी डिमेंशिया की संभावना कम कर सकते हैं. हम क्या कर सकते हैं, यह समझने और याद रखने के लिए एक उपयोगी मंत्र है: “What is good for your heart is good for your brain”. जो कदम स्वस्थ हृदय के लिए फायदेमंद हैं, वे स्वस्थ दिमाग के लिए भी अच्छे हैं. इसका मतलब यह नहीं कि डिमेंशिया होगा ही नहीं, पर स्वस्थ हृदय के लिए अपनाई जीवन शैली से डिमेंशिया की संभावना कुछ हद तक कम होगी. (यह ज़रूर याद रखें कि डिमेंशिया से पूरी तरह बचे रहने का कोई तरीका नहीं है). कुछ प्रमुख उदाहरण:

  • धूम्रपान बंद करें
  • अपने वज़न को नियंत्रित रखें, और पौष्टिक भोजन लें, अच्छी मात्रा में ताज़े फल और सब्जी खाएं. मोटापे से बचें. अपने डॉक्टर से मेडिटरेनीयन डाइट (Mediterranean diet) और DASH डाइट के बारे में पूछें, और सलाह करें कि आपके लिए क्या उचित होगा. मद्यपान कम करें
  • शरीर में पौष्टिक पदार्थों की कमी न होने दें (जैसे कि विटामिन बी-12)
  • नियमित व्यायाम करें, शारीरिक रूप से सक्रीय रहें
  • उचित कदम लेकर हृदय रोग की संभावना कम करें
  • मानसिक रूप से सक्रिय रहें(जैसे कि नई चीज़ें सीखते रहें)
  • मेल-जोल और दोस्तियां बनाए रखें, सामाजिक अलगाव न होने दें
  • मधुमेह (डायबिटीज), उच्च रक्य्चाप (हाइपरटेंशन), उच्च कोलेस्ट्रॉल, नाडी संबंधी समस्याएँ, इत्यादि रोगों के प्रति सतर्क रहे. इन से बचने की कोशिश करें, और यदि यह हों, तो इन्हें दवा और जीवन शैली के बदलाव से नियंत्रण में रखें
  • अवसाद (डिप्रेशन) के प्रति सतर्क रहें, और इस से बचने के लिए उचित कदम लें
  • एक हालिया रिपोर्ट (July 2017) में एक अन्य महत्वपूर्ण जोखिम कारक को पहचाना गया है: सुनने की शक्ति में कमी होना/ बहरापन. इस समस्या के प्रति सतर्क रहें, और डॉक्टर से सलाह करें

और हाँ, सर को चोट से बचाए रखें 🙂 (सर पर गंभीर चोट से भी डिमेंशिया हो सकता है)

कुछ ऐसी बीमारियाँ हैं जिन का डिमेंशिया के साथ सम्बन्ध है, और जिन के होने पर डिमेंशिया की संभावना ज्यादा होती है. एक उदाहरण है डाउन सिंड्रोम. पार्किन्सन रोग से ग्रस्त व्यक्तियों में भी आगे जाकर करीब एक-तिहाई (1/3) व्यक्तियों में डिमेंशिया हो सकता है. स्ट्रोक के बाद करीब 20% लोगों को छह महीने के अन्दर डिमेंशिया हो जाता है. अवसाद (डिप्रेशन) और डिमेंशिया में भी सम्बन्ध है, और ये दोनों अकसर साथ साथ पाए जाते हैं, हलाकि इन के बीच यह सम्बन्ध किस प्रकार का है, इस पर अभी रिसर्च चल रहा है.

अन्य भी स्वास्थ्य-संबंधी समस्याएं हैं जिन से डिमेंशिया के लक्षण हो सकते है, और जिन के बारे में सतर्क रहना अच्चा होगा, जैसे कि थाइरोइड हॉर्मोन की कमी. ऊपर ऐसे कुछ विषयों पर चर्चा है.

याद रखें, डिमेंशिया से बचने का कोई पक्का तरीका नहीं है. अखबारों में, पत्रिकाओं में, और अन्य मीडिया में हम कई बार सुनते हैं कि यदि आप फलां तरीका अपनाएँ तो डिमेंशिया नहीं होगा. यह दावा गलत है. हम सिर्फ अपनी जीवन शैली में बदलाव करके अपनी डिमेंशिया की संभावना कम कर सकते हैं, पर हमारी इस कोशिश के बावजूद हमें डिमेंशिया हो सकता है. यह सोचना भी गलत है कि जिन को डिमेंशिया है, वे लोग लापरवाह थे या अस्वस्थ और निष्क्रिय जीवन जी रहे थे.

डिमेंशिया की संभावना कम कैसे करें, और डिमेंशिया का किस कारक से कैसा सम्बन्ध है, इस विषय पर अधिक चर्चा के लिये इस पृष्ठ के अँग्रेज़ी संस्करण को देखें: लिंक नीचे “इन्हें भी देखें” सेक्शन में है.

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आनुवंशिकी (यदि किसी करीबी रिश्तेदार को डिमेंशिया हो)(Genetics risk if close relatives have dementia)

घर में नज़दीकी रिश्तेदार में डिमेंशिया देखने पर घबराहट हो सकती है कि क्या डिमेंशिया अनुवांशिक है? फिलहाल डिमेंशिया के अनेक रोगों की आनुवंशिकी समझने के लिए शोध (रिसर्च) जोरों से चल रहा है. इस विषय पर लिंक्स और कुछ चर्चा और रिपोर्ट से लिए देखें हमारे इस पृष्ठ के अँग्रेज़ी संस्करण पर–लिंक नीचे “इन्हें भी देखें” सेक्शन में है.

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इन्हें भी देखें

हिंदी पृष्ठ, इसी साईट से:

डिमेंशिया के लक्षण किन रोगों के कारण हो सकते हैं, इसके लिए देखें:डिमेंशिया किन रोगों के कारण होता है

डिमेंशिया से सम्बंधित अन्य रोगों पर हिंदी में विस्तृत पृष्ट देखें:

इस विषय पर हिंदी सामग्री, कुछ अन्य साईट पर: यह याद रखें कि इन में से कई लेख अन्य देश में रहने वालों के लिए बनाए गए हैं, और इनमें कई सेवाओं और सपोर्ट संबंधी बातें, कानूनी बातें, इत्यादि, भारत में लागू नहीं होंगी.

इस पृष्ठ का नवीनतम अँग्रेज़ी संस्करण यहाँ उपलब्ध है: Diagnosis, Treatment, Prevention. अंग्रेज़ी पृष्ठ पर आपको विषय पर अधिक सामयिक जानकारी मिल सकती है. कई उपयोगी अँग्रेज़ी लेखों, संस्थाओं और फ़ोरम इत्यादि के लिंक भी हो सकते हैं. कुछ खास उन्नत और प्रासंगिक विषयों पर विस्तृत चर्चा भी हो सकती है. अन्य विडियो, लेखों और ब्लॉग के लिंक, और उपयोगी पुस्तकों के नाम भी हो सकते हैं. इस अँग्रेज़ी पृष्ठ पर डिमेंशिया से बचाव के लिए, और विभिन्न डिमेंशिया रोगों के निदान और उपचार के लिए अनेक उपयोगी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और अँग्रेज़ी वेबसाइट पर जानकारी है.

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Previous: डिमेंशिया के प्रकारों पर अधिक जानकारी Next: डिमेंशिया/ अल्जाइमर से कैसे बचें: चित्रण (Reduce the risk of dementia: infographic)

डिमेंशिया किन रोगों के कारण होता है (Diseases that cause dementia)

डिमेंशिया (मनोभ्रंश) के लक्षण अनेक रोगों के कारण पैदा हो सकते हैं. कुछ लोग इन डिमेंशिया के कारणों (causes of dementia) को डिमेंशिया के प्रकार या डिमेंशिया के किस्म भी कहते हैं (types of dementia), या कभी कभी विशेष रोग के नाम की जगह, “डिमेंशिया” शब्द को रोग के नाम की तरह इस्तेमाल करते हैं. वास्तव में ऐसे अनेक रोग हैं जिनसे डिमेंशिया के लक्षण पैदा हो सकते हैं (लगभग 100). प्रमुख रोग हैं अल्ज़ाइमर (Alzheimer’s Disease), संवहनी मनोभ्रंश (नाड़ी-संबंधी डिमेंशिया, vascular dementia), फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया (fronto-temporal dementia, FTD), लुई बॉडी डिमेंशिया (Lewy Body dementia, LBD), मिश्रित डिमेंशिया (mixed dementia), इत्यादि.

अकसर लोग पूछते हैं कि डिमेंशिया और अल्ज़ाइमर में फ़र्क क्या है. अल्जाइमर एक ऐसा रोग है जिससे मस्तिष्क में हानि होती है, और डिमेंशिया के लक्षण होते हैं. यह डिमेंशिया का सबसे आम कारण है, पर डिमेंशिया अन्य रोगों के कारण भी हो सकता है. डिमेंशिया लक्षणों के समूह का नाम है, और अल्जाइमर एक ऐसा रोग है जिससे ये लक्षण हो सकते हैं.

  • डिमेंशिया और उसके लक्षण पैदा करने वाले रोगों के बारे में कुछ प्रमुख तथ्य.
  • डिमेंशिया के ठीक हो सकने वाले कारण (reversible causes)
  • डिमेंशिया के ठीक न हो सकने वाले कारण (irreversible causes)
  • इन्हें भी देखें

पूरे पोस्ट के लिए यहाँ क्लिक करें : डिमेंशिया किन रोगों के कारण होता है (Diseases that cause dementia)

डिमेंशिया (मनोभ्रंश) के लक्षण अनेक रोगों के कारण पैदा हो सकते हैं. कुछ लोग इन डिमेंशिया के कारणों (causes of dementia) को डिमेंशिया के प्रकार या डिमेंशिया के किस्म भी कहते हैं (types of dementia), या कभी कभी विशेष रोग के नाम की जगह, “डिमेंशिया” शब्द को रोग के नाम की तरह इस्तेमाल करते हैं. वास्तव में ऐसे अनेक रोग हैं जिनसे डिमेंशिया के लक्षण पैदा हो सकते हैं (लगभग 100). प्रमुख रोग हैं अल्ज़ाइमर (Alzheimer’s Disease), संवहनी मनोभ्रंश (नाड़ी-संबंधी डिमेंशिया, vascular dementia), फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया (fronto-temporal dementia, FTD), लुई बॉडी डिमेंशिया (Lewy Body dementia, LBD), मिश्रित डिमेंशिया (mixed dementia), इत्यादि.

अकसर लोग पूछते हैं कि डिमेंशिया और अल्ज़ाइमर में फ़र्क क्या है. अल्जाइमर एक ऐसा रोग है जिससे मस्तिष्क में हानि होती है, और डिमेंशिया के लक्षण होते हैं. यह डिमेंशिया का सबसे आम कारण है, पर डिमेंशिया अन्य रोगों के कारण भी हो सकता है. डिमेंशिया लक्षणों के समूह का नाम है, और अल्जाइमर एक ऐसा रोग है जिससे ये लक्षण हो सकते हैं.

इस पृष्ठ के सेक्शन:

डिमेंशिया और उसके लक्षण पैदा करने वाले रोगों के बारे में कुछ प्रमुख तथ्य

  • व्यक्ति में डिमेंशिया के लक्षण एक या एक से ज्यादा रोगों के कारण पैदा हो सकते हैं
  • डिमेंशिया एक संलक्षण (लक्षणों के समूह) का नाम है. हर मरीज में सब लक्षण नहीं होंगे; किसी व्यक्ति में कुछ लक्षण नज़र आ सकते हैं, तो किसी अन्य व्यक्ति में कोई और लक्षण नज़र आ सकते हैं. यह तो डॉक्टर ही बता पायेंगे कि व्यक्ति को डिमेंशिया है या नहीं
  • व्यक्ति में डिमेंशिया के कौन से लक्षण प्रकट होते हैं यह इस पर निर्भर है कि रोग के कारण मस्तिष्क के किस भाग में हानि हुई है
  • व्यक्ति को डिमेंशिया है या नहीं, यह तय करने के लिए डॉक्टर प्रश्न पूछेंगे और उचित जांच और टेस्ट करेंगे, और फिर बताएँगे कि व्यक्ति को डिमेंशिया है या नहीं. जांच के दौरान वे तय करेंगे कि व्यक्ति के लक्षण किस रोग के कारण हैं.
  • कुछ रोग इलाज से ठीक हो सकते हैं, और इस इलाज के बाद व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है और उसके डिमेंशिया लक्षण पूरी तरह से चले जाते हैं. इसे रिवर्सिबल डिमेंशिया (reversible dementia) कहते हैं.
  • बाकी रोग (जिनके कारण डिमेंशिया होता है) लाइलाज हैं. इन्हें इर्रिवर्सबिल डिमेंशिया (irreversible dementia) कहते हैं. इलाज से इनमे से कुछ रोगों के प्रकट लक्षण तो काम हो सकते हैं, पर रोग मूल रूप से ठीक नहीं हो पाता. मस्तिष्क में जो हानि हो चुकी है, वह दवाई से वापस पलटती नहीं है, और दवाई का फोकस होता है प्रकट लक्षणों को कम करना और कुछ राहत देना. डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्तियों को आराम पंहुचाने के लिए अधिक कारगर दवाईओं के लिए शोध ज़ारी है.
  • डिमेंशिया के लक्षण किस गति से बढ़ेंगे और कौन से लक्षण ज्यादा गंभीर होंगे, यह इस पर निर्भर है कि उस व्यक्ति का डिमेंशिया किस रोग के कारण है. मस्तिष्क के किस भाग में कितनी हानि हुई है, और हानि किस रफ़्तार से बढ़ रही है, लक्षण इस पर निर्भर होते हैं. कई प्रकार के डिमेंशिया में मस्तिष्क में हो रही हानि बढ़ती जाती है progressive dementia), पर कुछ डिमेंशिया में हानि एक ही स्तर पर काफी अरसे तक रुकी रहती है, फिर शायद कुछ और हानि हो, और फिर कुछ देर उसी नए स्तर पर रुकी रहे. (इसको plateau.या step-wise progression of dementia भी कहते हैं)
  • परिवार वाले इस बात को ले कर भी चिंतित होते हैं कि क्या डिमेंशिया अनुवांशिक है. उनके डिमेंशिया की संभावना के बारे में जानने के लिये यह जानना ज़रूरी है कि डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति को किस रोग के कारण डिमेंशिया है. फिर परिवार वाले उचित शोध की रिपोर्ट देख सकते हैं.
  • अधिकाँश डिमेंशिया और देखभाल सम्बंधित चर्चा ऐसे डिमेंशिया के प्रकारों के इर्द-गिर्द होती है जिन में इलाज से रोग को पलटा नहीं जा सकता (irreversible). चर्चा करने वाले यह मान कर चलते हैं कि डिमेंशिया के लक्षण दिखाने वाले व्यक्ति की सही डॉक्टरी जांच हो चुकी है, और यदि डिमेंशिया पैदा करने वाला रोग इलाज से ठीक हो सकता था, तो इलाज हो चुका है.

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डिमेंशिया के ठीक हो सकने वाले कारण (reversible causes)

डिमेंशिया के ठीक हो सकने वाले कारणों में शामिल हैं अवसाद (depression), थाइरोइड हार्मोन में कमी (hypothyroidism), कुछ प्रकार के संक्रमण (infections), और विटामिन B12 की कमी (vitamin B12 deficiency). जांच से सही कारण पता चलाने के बाद डॉक्टर इलाज कर सकते हैं और व्यक्ति के डिमेंशिया लक्षण चले जायेंगे.

क्योंकि डिमेंशिया के लक्षण कभी कभी ऐसे रोगों के कारण पैदा होते है जिनका इलाज संभव है, इसलिए उचित यह है कि यदि कोई डिमेंशिया के लक्षण महसूस कर रहा है तो सही जांच कराई जाए. नाउम्मीद होकर घर बैठे रहने से उस व्यक्ति को, और अन्य परिवार वालों को, नाहक परेशान होती रहेंगे जब कि डॉक्टर के पास रोग का इलाज है.

इस प्रकार के डिमेंशिया के कुछ कारक रोग ऐसे हैं जो कम पाए जाते हैं, और जिनका रोग निदान कई बार ठीक से नहीं हो पाता. ऐसा एक रोग है सामान्य दबाव हायड्रोसेफ़ेलस(normal pressure hydrocephalus, NPH), जिस में मस्तिष्क में अधिक फ्लूइड भर जाता है और इस कारण लक्षण पैदा होते है. पर शंट लगाकर इस फ्लूइड को निकाला जा सकता है, जिस से व्यक्ति को लक्षणों से राहत मिल सकती है. कुछ ऐसे भी रोग हैं जिन में लगता है कि इनका तो मस्तिष्क से कोई सम्बन्ध ही नहीं है, पर फिर भी इन रोगों से डिमेंशिया लक्षण पैदा हो सकते हैं. जैसे कि, कुछ रिसर्च में पाया गया है कि सीलिएक रोग (उदार संबंधी रोग, celiac disease) से भी डिमेंशिया लक्षण हो सकते हैं. एक अन्य उदाहरण है लाइम रोग (Lyme’s disease).

Reversible dementia पर अधिक विस्तृत चर्चा के लिए हमारे अँग्रेज़ी पृष्ठ को देखें (लिंक नीचे “इन्हें भी देखें सेक्शन में है)

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डिमेंशिया के ठीक न हो सकने वाले कारण (irreversible causes)

अधिकाँश डिमेंशिया लाइलाज हैं, यानि कि दवाई से रोग से हुई हानि ठीक नहीं करी जा सकती.अधिकांश रोग प्रगतिशील (progressive) भी होते हैं, और अपकर्षक (degenerative) भी, और समय के साथ मस्तिष्क अधिक नष्ट होता जाता है, और व्यक्ति अधिक लाचार होते जाते हैं.

अल्ज़ाइमर (Alzheimer’s Disease) डिमेंशिया का सबसे आम कारण है. यह अभी लाइलाज है, और इस पर जोर-शोर से शोध चल रहा है. इसमें दिमाग की कोशिकाएं (cells) सिकुड जाती हैं या नष्ट हो जाती हैं, और “प्लाक” के जमा होने के कारण कोशिकाओं के बीच के जोड़ भी नष्ट हो जाते हैं. (यदि हिंदी में इस पर जानकारी ढूढ़ रहे हैं तो ध्यान रखें कि Alzheimer एक जर्मनी के डॉक्टर का नाम था, और देवनागरी लिपि में इसे अनेक तरह से लिखा जाता है, और इससे गूगल खोज के रिजल्ट में फ़र्क पड़ सकता है. उदाहरण: अल्ज़ाइमर, अल्जाइमर, अल्ज़ाईमर, एल्ज़ाइमर्ज़, एलसायमर, एल्सायमर, एलसायमरस, एल्जायमर्स, इत्यादि)

संवहनी डिमेंशिया एक अन्य मुख्य कारण है, खासकर भारत में. इसमें मस्तिष्क की हानि स्ट्रोक, मिनी-स्ट्रोक (TIA), और अन्य नाड़ी-सम्बंधी समस्याओं की वजह से होती है. उक्त रक्तचाप (high blood pressure) और धमनियों का स्थूल होना अकसर इन सब नाड़ी-संबंधी डिमेंशिया का मूल कारण होते हैं.

अन्य डिमेंशिया के कारण हैं फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया (fronto-temporal dementia), लुई बॉडी डिमेंशिया (Lewy Body dementia) और पार्किंसंस रोग (Parkinson’s Disease). यह भी हो सकता है कि डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्तियों में डिमेंशिया के लक्षण एक से अधिक रोगों के कारण पैदा होते हैं, जिसे मिक्स्ड डिमेंशिया (मिश्रित डिमेंशिया, mixed dementia) कहा जाता है. अकसर मिक्स्ड डिमेंशिया वाले व्यक्ति को अल्ज़ाइमर और संवहनी डिमेंशिया होता है, पर अन्य डिमेंशिया के प्रकारों के सम्मिश्रण भी संभव हैं.

अक्सर डिमेंशिया और अल्ज़ाइमर शब्दों को पर्यायवाची शब्दों की तरह से इस्तेमाल करा जाता है, पर यह गलत है. अल्ज़ाइमर रोग डिमेंशिया के लक्षणों का सबसे आम कारण ज़रूर है (50 – 75%), पर हम अन्य कारणों को नज़रंदाज़ नहीं कर सकते–वे 25 – 50% केस में पाए जाते हैं, जो एक काफी बड़ा हिस्सा है.

इन चार प्रमुख प्रकार के डिमेंशिया पर हिंदी में अधिक जानकारी के लिए नीचे इन्हें भी देखें सेक्शन को देखें)

अगर हम यह जानें कि हमारे प्रियजन को कौन सा डिमेंशिया है, तो उस प्रकार के डिमेंशिया के बारे में पढ कर हम अंदाजा लगा सकते हैं कि रोग के कौन से लक्षण किस अवस्था में ज्यादा प्रमुख होंगे, और हम उसके अनुसार खुद को देखभाल के लिए तैयार कर सकते हैं.

उदाहरण के लिए, लक्षणों को ही लें. अल्ज़ाइमर के रोगिओं में जयादातर याददाश्त संबंधी समस्याएँ पहले नज़र आते हैं, पर फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया वाले लोगों में अकसर व्यवहार का बदलाव एक प्रमुख लक्षण होता है, और याददाश्त संबंधी समस्याएं कम नज़र आती हैं. रोग की प्रगति भी अलग अलग होती है. अल्ज़ाइमर में ज्यादातर प्रगति धीमी रहती है. पर संवहनी डिमेंशिया में, जिसमे मस्तिष्क की हानि नाड़ीयों की समस्याओं के कारण होती है, अगर यह समस्याएँ रोकी जा सकें तो रोगी का डिमेंशिया एक ही स्तर पर कई दिनों तक रह सकता है. फिर अगर व्यक्ति को यदि स्ट्रोक हो जाए तो डिमेंशिया के लक्षण रातों-रात बदतर हो सकते हैं. पर यह भी याद रखें कि निश्चित ढंग से नहीं कहा जा सकता कि किसी एक व्यक्ति में रोग किस गति से और कैसे बिगडेगा.

एक पहलू यह है कि रोग कोई भी हो, व्यक्ति के लक्षण उसी व्यापक लक्षणों के समूह से होते हैं जिन्हें डिमेंशिया कहते हैं. इसलिए परिवार वाले अपने प्रियजन की देखभाल के लिए टिप्स अनेक स्तोत्र से पा सकते हैं. अधिकांश जानकारी देखभाल की जानकारी अल्ज़ाइमर के नाम से मिलती है क्योंकि अधिकाँश रोगी अल्ज़ाइमर से ग्रस्त हैं, और विश्व-भर में शोध और चर्चा भी अल्ज़ाइमर पर ही केंद्रित है. राष्ट्रिय संस्थाएं सभी प्रकार के डिमेंशिया का समर्थन भी अल्ज़ाइमर की छत्री के अंतर्गत करती हैं. इन्टरनेट पर डिमेंशिया सम्बंधी जानकारी ढूंढते हुए यह बात याद रखने से जानकारी ढूँढने में आसानी होगी.

पर यह न समझें कि अल्ज़ाइमर के लिए दी गयी सभी सलाह दूसरे प्रकार के डिमेंशिया में ज्यूं-के-त्यूं काम आ सकती है. व्यक्ति में कौन से लक्षण अधिक पेश है, और रोग किस तरह से बिगड रहा है, उसे न भूलें. भिन्न डिमेंशिया रोगों के लिए उपचार और सलाह भी अलग हो सकती है. अच्छा होगा है कि ऐसे साधन भी ढूँढें जो डिमेंशिया पैदा करने वाले उस रोग से सम्बंधित है जिससे व्यक्ति ग्रस्त है, ताकि अधिक कारगर टिप्स मिलें.

एक अन्य ज़रूरी बात यह है कि इलाज करने वाले सभी डॉक्टर को मालूम रहना चाहिए कि डिमेंशिया किस रोग के कारण है, क्योंकि कुछ दवाइयाँ ऐसी हैं जो एक तरह के डिमेंशिया के लिए उपयुक्त हैं, पर दूसरे डिमेंशिया में नुकसान कर सकती हैं और रोगी की हालत और खराब हो सकती है. (उदाहरण देखें कैसे लुई बॉडी डिमेंशिया में अल्ज़ाइमर में दी गयी कुछ दवाइयाँ नुकसान कर सकती हैं; नीचे दिए गए लिंक में इस पर अधिक जानकारी है. उचित सपोर्ट ग्रुप में भी इस प्रकार की जानकारी मिल सकती है)

नोट: जैसे जैसे डिमेंशिया पैदा करने वाले रोगों के बारे में जानकारी बढ़ती है, वैसे वैसे विशेषज्ञ उन रोगों के नाम और उनकी श्रेणियों को बदलते रहते हैं. ये साधारण लोगों को कंफ्यूस कर सकता है, और जानकारी खोजने में दिक्कत पैदा कर सकता है. इस पर कुछ अधिक टिपण्णी देखें हमारे अँग्रेज़ी पृष्ठ पर (लिंक नीचे “इन्हें भी देखें सेक्शन में है).

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इन्हें भी देखें….

चार प्रमुख प्रकार के डिमेंशिया के मुख्य बिंदु यहाँ देखें और विस्तृत पोस्ट (चित्रों सहित) यहाँ देखें:

मुख्य रोगों के अंग्रेज़ी नाम, देवनागरी में:

इस पृष्ठ पर कई बीमारियों के अंग्रेज़ी नाम हैं. इनको देवनागरी में लिखते समय अलग अलग संगठन हिंदी और अंग्रेज़ी में अलग अलग तरह से पेश करते हैं; कुछ प्रचलित स्पेलिंग (वर्तनी) आपकी सुविधा के लिए (गूगल खोज में सहायता के लिए):

  • Dementia: डिमेंशिया, मनोभ्रंश, डिमेन्शिया, डिमेंशिया डिमेंश्या, डिमेंटिया, डेमेंटिया
  • Alzheimer’s Disease: अल्जाइमर, अल्ज़ाइमर, अलजाइमर, अलज़ाइमर, एलसायमरस, अलज़ाईमर, एल्ज़ाइमर्ज़
  • Lewy Body dementia: लुई बाड़िज़, लुई बॉडी रोग, लुई बॉडी़ज़ वाला रोग,लुई बाड़ी रोग, लेवी बॉडीज़
  • Vascular dementia: (इसके लिए और इस से संबंधित विकारों के लिए कुछ शब्द) वास्कुलर डिमेंशिया, वैस्क्यूलर डिमेंशिया, नाड़ी-संबंधी डिमेंशिया, संवहनी मनोभ्रंश, हृदवाहिनी रोग, रक्त-वाहिका रोग,स्ट्रोक, सबकोर्टिकल संवहनी डिमेंशिया, मल्टी-इनफार्ट, मिनी-स्ट्रोक्स, बहु-रोधगलितांश डिमेंशिया, बिंसवान्गर (सबकोर्टिकल वैस्क्यूलर डिमेंशिया), ट्रांसिऐंट इस्कीमिक अटैक्स, अस्थायी स्थानिक अरक्तता दौरे
  • Fronto-temporal dementia: फ्रोंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया, फ्रंटोटेम्पोरल लोबार डिजेनरेशन, पिक्स रोग, फ़्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया
  • Mixed dementia:मिश्रित डिमेंशिया, मिक्स्ड डिमेंशिया
  • Parkinson’s Disease: पार्किन्सन-रोग, पार्किंसंस रोग

पृष्ठ पर इस (अँग्रेज़ी) रिपोर्ट का ज़िक्र है: डिमेंशिया इंडिया रिपोर्ट 2010 (The Dementia India Report 2010) (PDF file) Opens in new window

डिमेंशिया और अल्ज़ाइमर में फ़र्क क्या है, इस पर एक छोटा हिंदी वीडियो देखें, जिसमे सरल तरीके से, रेखा चित्र का इस्तेमाल करके डिमेंशिया और अल्ज़ाइमर के बीच का सम्बन्ध समझाया गया है.(यदि वीडियो प्लेयर नीचे लोड न हो रहा हो तो आप इस वीडियो को सीधे यूट्यूब पर भी देख सकते हैं Opens in new window)

हिंदी पृष्ठ, इसी साईट से:

डिमेंशिया रोगों के बारे में और जानकारी: निदान, उपचार, बचाव .

इस विषय पर हिंदी सामग्री, कुछ अन्य साईट पर: यह याद रखें कि इन में से कई लेख अन्य देश में रहने वालों के लिए बनाए गए हैं, और इन में कई सेवाओं और सपोर्ट संबंधी बातें, कानूनी बातें, इत्यादि, भारत में लागू नहीं होंगी.

इस पृष्ठ का नवीनतम अँग्रेज़ी संस्करण यहाँ उपलब्ध है: Diseases that cause dementia Opens in new window. अंग्रेज़ी पृष्ठ पर आपको विषय पर अधिक सामयिक जानकारी मिल सकती है. कई उपयोगी अँग्रेज़ी लेखों, संस्थाओं और फ़ोरम इत्यादि के लिंक भी हो सकते हैं. कुछ खास उन्नत और प्रासंगिक विषयों पर विस्तृत चर्चा भी हो सकती है. अन्य विडियो, लेखों और ब्लॉग के लिंक, और उपयोगी पुस्तकों के नाम भी हो सकते हैं. इस पृष्ठ पर अनेक उपयोगी वेबसाइट के लिंक भी हैं, जो अलग अलग तरह के डिमेंशिया पर जानकारी देते हैं, और डिमेंशिया वाले व्यक्ति और उनके परिवारों को सपोर्ट भी करते हैं.

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डिमेंशिया (मनोभ्रंश) क्या है (What is dementia?)

डिमेंशिया (Dementia, मनोभ्रंश) किसी विशेष बीमारी का नाम नहीं, बल्कि के लक्षणों के समूह का नाम है, जो मस्तिष्क की हानि से सम्बंधित हैं. “Dementia” शब्द “de” (without) और “mentia” (mind ) को जोड़ कर बनाया गया है.

[डिमेंशिया नाम पर स्पष्टीकरण: हालाँकि डिमेंशिया (dementia) अँग्रेज़ी का शब्द है, इसका प्रयोग हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में भी होता है, और डॉक्टर निदान (diagnosis) के समय dementia (डिमेंशिया) शब्द का इस्तेमाल करेंगे. इस क्षेत्र के जागरूकता अभियान में, रिपोर्ट्स में, और विशेषज्ञों के इंटरव्यू में भी “डिमेंशिया” शब्द का प्रयोग होता हो. परन्तु यह जानना ज़रूरी है कि हिंदी में पत्रिकाओं, समाचारपत्रों, और वेबसाइट पर डिमेंशिया के लिए “मनोभ्रंश” शब्द का भी इस्तेमाल होता है (मनो–मन सम्बंधी, भ्रंश–नष्ट होना). यह याद रखें कि डिमेंशिया और मनोभ्रंश एक ही अवस्था के दो नाम हैं. एक अन्य नोट: dementia को देवनागरी में “डिमेंशिया” के अलावा अन्य तरह से भी लिखा जाता है, जैसे कि डिमेन्शिया, डिमेंशिया डिमेंश्या, डिमेंटिया, डेमेंटिया,वगैरह.]

डिमेंशिया के लक्षण कई रोगों के कारण पैदा हो सकते है. ये सभी रोग मस्तिष्क की हानि करते हैं. क्योंकि हम अपने सब कामों के लिए अपने मस्तिष्क पर निर्भर हैं, डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति अपने दैनिक कार्य ठीक से नहीं कर पाते. इन व्यक्तियों की याददाश्त कमजोर हो सकती है. उन्हें आम तौर के रोजमर्रा के हिसाब में दिक्कत हो सकती है, और वे अपना बैंक का काम करने में भी कठिनाई महसूस कर सकते हैं. घर पर पार्टी हो तो उसका आयोजन करना उनके लिए मुश्किल हो सकता है. कभी कभी वे यह भी भूल सकते हैं कि वे किस शहर में हैं, या कौन सा साल या महीना चल रहा है. बोलते हुए उन्हें सही शब्द नहीं सूझता. उनका व्यवहार बदला बदला सा लगने लगता है, और व्यक्तित्व में भी फ़र्क आ सकता है. यह भी हो सकता है के वे असभ्य भाषा का प्रयोग करें या अश्लील तरह से पेश आएँ, या सब लोगों से कटे-कटे से रहें. …

पूरे पोस्ट के लिए यहाँ क्लिक करें : डिमेंशिया (मनोभ्रंश) क्या है (What is dementia?)

डिमेंशिया (Dementia, मनोभ्रंश) किसी विशेष बीमारी का नाम नहीं, बल्कि के लक्षणों के समूह का नाम है, जो मस्तिष्क की हानि से सम्बंधित हैं. “Dementia” शब्द “de” (without) और “mentia” (mind ) को जोड़ कर बनाया गया है.

[डिमेंशिया नाम पर स्पष्टीकरण: हालाँकि डिमेंशिया (dementia) अँग्रेज़ी का शब्द है, इसका प्रयोग हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में भी होता है, और डॉक्टर निदान (diagnosis) के समय dementia (डिमेंशिया) शब्द का इस्तेमाल करेंगे. इस क्षेत्र के जागरूकता अभियान में, रिपोर्ट्स में, और विशेषज्ञों के इंटरव्यू में भी “डिमेंशिया” शब्द का प्रयोग होता हो. परन्तु यह जानना ज़रूरी है कि हिंदी में पत्रिकाओं, समाचारपत्रों, और वेबसाइट पर डिमेंशिया के लिए “मनोभ्रंश” शब्द का भी इस्तेमाल होता है (मनो–मन सम्बंधी, भ्रंश–नष्ट होना). यह याद रखें कि डिमेंशिया और मनोभ्रंश एक ही अवस्था के दो नाम हैं. एक अन्य नोट: dementia को देवनागरी में “डिमेंशिया” के अलावा अन्य तरह से भी लिखा जाता है, जैसे कि डिमेन्शिया, डिमेंशिया डिमेंश्या, डिमेंटिया, डेमेंटिया,वगैरह.]

डिमेंशिया के लक्षण कई रोगों के कारण पैदा हो सकते है. ये सभी रोग मस्तिष्क की हानि करते हैं. क्योंकि हम अपने सब कामों के लिए अपने मस्तिष्क पर निर्भर हैं, डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति अपने दैनिक कार्य ठीक से नहीं कर पाते. इन व्यक्तियों की याददाश्त कमजोर हो सकती है. उन्हें आम तौर के रोजमर्रा के हिसाब में दिक्कत हो सकती है, और वे अपना बैंक का काम करने में भी कठिनाई महसूस कर सकते हैं. घर पर पार्टी हो तो उसका आयोजन करना उनके लिए मुश्किल हो सकता है. कभी कभी वे यह भी भूल सकते हैं कि वे किस शहर में हैं, या कौन सा साल या महीना चल रहा है. बोलते हुए उन्हें सही शब्द नहीं सूझता. उनका व्यवहार बदला बदला सा लगने लगता है, और व्यक्तित्व में भी फ़र्क आ सकता है. यह भी हो सकता है के वे असभ्य भाषा का प्रयोग करें या अश्लील तरह से पेश आएँ, या सब लोगों से कटे-कटे से रहें.

साल दर साल डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की स्थिति अधिक खराब होती जाती है, और बाद की अवस्था में उन्हें साधारण से साधारण काम में भी दिक्कत होने लगती है, जैसे कि चल पाना, बात करना, या खाना ठीक से चबाना और निगलना, और वे छोटी से छोटी चीज के लिए भी निर्भर हो जाते हैं. वे बिस्तर पर पड़ जाते है, और उनका अंतिम समय आ जाता है.

जब व्यक्ति में लक्षण नजर आने शुरू होते हैं तो आस-पास के लोग–परिवार-वाले, दोस्त और प्रियजन, सहकर्मी, पड़ोसी–यह समझ नहीं पाते कि व्यक्ति इस अजीब तरह से क्यों पेश आ रहा है. कभी व्यक्ति परेशान या भुलक्कड़ लगता है, तो कभी सहमा हुआ, तो कभी झल्लाया हुआ, या बेकार गुस्सा करता हुआ. बदला व्यक्तित्व अकसर चरित्र की खामी समझा जाता है. यदि व्यक्ति बुज़ुर्ग हों, तो परिवार वाले अकसर भूलने या अन्य लक्षणों को सामान्य बुढ़ापा समझ कर नज़रअंदाज़ करने की कोशिश करते हैं, पर डिमेंशिया का होना उम्र बढ़ने का सामान्य अंग नहीं है. यदि व्यक्ति चालीस पचास या उससे भी कम उम्र के हों, तो लक्षणों को तनाव का नतीजा समझा जा सकता है.

इस पृष्ठ पर:

डिमेंशिया के लक्षणों के कुछ उदाहरण

आइये देखें, डिमेंशिया के लक्षणों के कुछ उदाहरण. यह एक सांकेतिक सूची है, और डिमेंशिया से प्रभावित व्यक्ति में, रोग के बढते साथ ज्यादा और अधिक गंभीर लक्षण नज़र आते हैं. (याद रखें कि हर व्यक्ति में अलग अलग लक्षण नज़र आते हैं. एक व्यक्ति में यह सब लक्षण हों, यह ज़रूरी नहीं, और यह भी ज़रूरी नहीं कि यदि कोई ये लक्षण दिख रहे है तो उस व्यक्ति को डिमेंशिया है–यह जांच तो डॉक्टर ही कर सकते हैं) (यह भी ध्यान में रखें कि कुछ प्रकार के डिमेंशिया में शुरू में व्यक्ति की याददाश्त पूरी तरह से सही सलामत रहती है)

early dementia patient confused and misplaces watch in fridge
  • ज़रूरी चीज़ें भूल जाना, खासकर हाल में हुई घटनाएँ (जैसे, नाश्ता करा था या नहीं)
  • पार्टी का आयोजन न कर पाना, छोटी छोटी समस्याओं को भी न सुलझा पाना
  • साधारण, रोज-मर्रे के काम करने में दिक्कत महसूस करना
  • गलत किस्म के कपडे पहनना, कपडे उलटे पहनना, साफ़-सुथरा न रह पाना
  • यह भूल जाना कि तारीख क्या है, कौन सा महीना है, साल कौन सा है, व्यक्ति किस घर में हैं, किस शहर में हैं, किस देश में
  • किसी वस्तु का चित्र देखकर यह न समझ पाना कि यह क्या है
  • नंबर जोड़ने और घटाने में दिक्कत, गिनती करने में दिक्कत
  • बोलते या लिखते हुए गलत शब्द का प्रयोग करना, या शब्दों के अर्थ न समझ पाना
  • चीज़ों को गलत, अनुचित जगह पर रख छोडना (जैसे कि घडी को, या ऑफिस फाइल को फ्रिज में रख देना)
  • कुछ काम शुरू करना, फिर भूल जाना कि क्या करना चाहते थे, और बहुत कोशिश के बाद भी याद न कर पाना
  • बड़ी रकम को फालतू की स्कीम में डाल देना, पैसे से सम्बंधित अजीब निर्णय लेना, लापरवाही या गैरजिम्मेदारी दिखाना
  • अपने आप में गुमसुम रहना, मेल-जोल बंद कर देना, चुप्पी साधना
  • छोटी-छोटी बात पर, या बिना कारण ही बौखला जाना, चिल्लाना, रोना, इत्यादि
  • किसी बात को या प्रश्न को दोहराना, जिद्द करना, तर्क न समझ पाना
  • बात बेबात लोगों पर शक करना, आक्रामक होना
  • लोगों की भावनाओं को न समझना या उनकी कद्र न करना
  • सामाजिक तौर तरीके भूल जाना, और अजीबोग़रीब बातें करना
  • भद्दी भाषा इस्तेमाल करना, गाली देना, अश्लील हरकतें करना
Words for dementia in India indicate childishness and weak brain

यह समझना बहुत ज़रूरी है कि डिमेंशिया मंदबुद्धि (mental retardation) नहीं है. यह सन्निपात, उन्माद या संकल्प प्रलाप (delirium) नहीं है. यह पागलपन (insanity) नहीं है. यह अम्नीसिया (स्मृति लोप, स्मृति भ्रंश, amnesia) नहीं है.

अफसोस, भारत में जहाँ हम डिमेंशिया के कई लक्षणों को तो पहचानते हैं, और हमारी भाषाओं में कुछ ऐसे शब्द हैं जो इन लक्षणों से जोड़े हुए हैं (जैसे कि सठियाना), पर लोगों में यह धारणा है कि यह व्यवहार की समस्याएँ हैं, या बुढापे में अकसर पाए जाने वाली आम समस्या. लोग यह नहीं जानते कि यह लक्षण मस्तिष्क के रोग के कारण उत्पन्न हो रही हैं. वे सोचते हैं कि यह व्यक्ति, जो अजीब तरह से पेश आ रहा है या तो जिद्दी है या पागल है. इसलिए आसपास के लोग उस व्यक्ति को उपचार के लिए डॉक्टर के पास नहीं जाते, और न ही वे व्यक्ति से बातचीत करने का तरीका बदलते हैं. वे डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति के सहायता कैसे करें, यह नहीं जानते. बल्कि वे व्यक्ति से निराश हो जाते हैं, या उस पर गुस्सा करते हैं, या उसकी अवहेलना करने लगते हैं. इससे परिवार में संघर्ष बढ़ जाते हैं और व्यक्ति को, तथा अन्य लोगों को, सब को ज्यादा दिक्कत होती है.

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डिमेंशिया में जो स्मृति की हानि होती है वह उम्र के साथ होने वाले सामान्य स्मृति हानि से फ़र्क है

memory loss in dementia not same as normal memory loss

कई लोग डिमेंशिया को “भूलने की बीमारी” कह कर छोटा समझते हैं और टाल देते हैं. कुछ अन्य लोग कोई छोटी सी बात भूलने पर भी घबरा जाते हैं कि भई, उन्हें डिमेंशिया तो नहीं हो गया? एक चाबी इधर से उधर रख दी और ढूँढने पर नहीं मिली तो डिमेंशिया का भय दिमाग को घेर लेता है. सच तो यह है कि हम सब कभी न कभी कुछ न कुछ भूलते हैं, पर यह डिमेंशिया का भूलना नहीं होता है. डिमेंशिया में याददाश्त की समस्याएँ दूसरे रूप की होती हैं.

एक उदाहरण लें: क्या आप सोचते हैं कि आप कभी इतने भी भुलक्कड़ हो जायेंगे कि आप अपना नाम ही भूल जायेंगा? नहीं तो! पर डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति आगे की अवस्था में अपना ही नाम भूल जाते हैं.

(सामान्य बुढापे से जुड़े भूलने में और डिमेंशिया वाले भूलने में क्या अंतर है, इसपर अधिक चर्चा, उदाहरण, और लिंक हमारे अंग्रेज़ी पृष्ठ पर देखें.)

dementia patient forgets name and covers up by pretending

शुरू की अवस्था में अकसर डिमेंशिया से पीड़ित व्यक्ति अपनी भूलने की समस्या को आस पास के लोगों से छुपा पाते हैं. अगर वे कभी कुछ भूल भी जाएँ, या उलझन में नज़र आएँ, तो लोग उसे नजरंदाज कर देते हैं. बेटा यह सोचता है कि पापा की बढ़ती उम्र है, कुछ भूल गए तो क्या हुआ! शुरू की अवस्था में इन लक्षणों को पहचानने के लिए परिवार वालों को अधिक सतर्क रहना होगा.

पर जैसे जैसे रोग बढ़ता है, डिमेंशिया के लक्षण ज्यादा स्पष्ट होने लगते हैं, और व्यक्ति का व्यवहार सामान्य नहीं रहा है, यह बात औरों को भी नज़र आने लगती है. डॉक्टर से जांच कराने से पता चल सकता है कि क्या लक्षण किसी रोग के कारण हैं, और उपचार क्या है.

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डिमेंशिया बुढापे का एक सामान्य और अनिवार्य भाग नहीं है

बुढापे में भी लोग भूलते हैं, अस्त-व्यस्त हो जाते हैं, कभी कभी चिड़चिड़ा भी जाते हैं, पर डिमेंशिया इस साधारण बढ़ती उम्र की समस्याओं से भिन्न है. कुछ डॉक्टर भी शुरू के लक्षणों की ओर ध्यान नहीं देते.

डिमेंशिया को हम यह कह कर नहीं टाल सकते कि यह व्यक्ति कुछ तेज़ी के साथ बूढा हो रहा है. जिन रोगों से डिमेंशिया के लक्षण पैदा होते हैं, ये रोग मस्तिष्क की विशेष हानि करते हैं. मस्तिष्क की कोशिकाओं (neurons) को नष्ट करते हैं, और मस्तिष्क के भागों को जोड़ने वाले जालों को भी नष्ट करते हैं. मस्तिष्क के कुछ भाग सिकुड़ जाते हैं. कुछ लोगों में ये बीमारियां बुढ़ापे में नहीं, बल्कि जल्दी शुरू हो जाती हैं, जैसे कि चालीस पचास की उम्र में, या उससे भी पहले.

हालाँकि डिमेंशिया होने की संभावना उम्र के साथ बढ़ती है, पर उम्र बढ़ने पर डिमेंशिया ज़रूर ही होगा, ऐसा कहना गलत है. कुछ लोगों को वे रोग हो जाएँगे जिन से डिमेंशिया के लक्षण पैदा होते हैं, और दूसरे लोग डिमेंशिया से मुक्त रहेंगे.

डिमेंशिया के लक्षणों पर, और याददाश्त की कमजोरी पर अधिक जानकारी तथा कुछ उपयोगी लिंक इस पृष्ठ के नीचे, “इन्हें भी देखें” सेक्शन में हैं.

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हालांकि डिमेंशिया की संभावना उम्र के साथ बढ़ती है, पर डिमेंशिया चालीस पचास या उससे कम उम्र में भी हो सकता है

डिमेंशिया सिर्फ बुजुर्गों तक सीमित नहीं, उससे पहले (जैसे कि 30, 40 या 50 साल में) भी हो सकता है. इसको जल्दी शुरू होने वाला डिमेंशिया कहते हैं. WHO (वर्ल्ड हेल्थ ऑरगैनाइज़ेशन) का अनुमान है कि शायद 65 साल से कम उम्र में होने वाला डिमेंशिया–यानि कि जल्दी शुरू होने वाला डिमेंशिया (यंग ऑनसेट डिमेंशिया, यंगर ऑनसेट डिमेंशिया, young onset dementia, younger onset dementia, early onset dementia) अकसर पहचाने नहीं जाते और ऐसे केस शायद 6 से 9 प्रतिशत हैं।

जब चालीस पचास की उमर के लोग भूलने लगते हैं या बोलने में दिक्कत महसूस करते है या उनके व्यक्तित्व में बदलाव आने लगता है या उन में अन्य डिमेंशिया के लक्षण नज़र आने लगते है तो लोग डिमेंशिया की संभावना के बारे में नहीं सोचते. वे समस्या को नज़रअंदाज़ कर देते हैं. व्यक्ति को दोष देते हैं या उस बदलाव को तनाव का नतीजा समझते हैं. डॉक्टर भी ऐसी स्थिति में अकसर डिमेंशिया के बारे में नहीं सोचते. इस कारण रोग-निदान (diagnosis) नहीं हो पाता या गलत होता है. यदि व्यक्ति/ परिवार वाले डिमेंशिया के बारे में जानते हों तो वे विशेषज्ञ से सलाह करके उचित निदान पाने की कोशिश कर सकते है.

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कुछ प्रकार के डिमेंशिया के शुरू के लक्षणों में याददाश्त की समस्याएँ शामिल नहीं हैं

डिमेंशिया के अनेक लक्षण होते हैं और अनेक कारण भी. हर व्यक्ति में हर लक्षण नहीं पाया जाता. कई लोगों का सोचना है कि भूलना तो डिमेंशिया का एक अनिवार्य अंग है, और डिमेंशिया है तो याददाश्त की समस्या तो होगी ही. यह सच नहीं है.

कुछ प्रकार के डिमेंशिया ऐसे हैं–जैसे कि फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया(Frontotemporal Dementia)–जिन में पहले लक्षण व्यक्तित्व का बदलाव, बोलने में दिक्कत, चलने में या संतुलन में दिक्कत या अन्य लक्षण हैं, पर याददाश्त सही रहती है.

डिमेंशिया के प्रति सतर्क रहना हो तो सिर्फ याददाश्त की कमजोरी की ओर ध्यान न दें, अन्य लक्षणों के प्रति भी सतर्क रहें.

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डिमेंशिया पर एक संक्षिप्त प्रस्तुति.

इस हिंदी प्रेजेंटेशन में देखिये डिमेंशिया क्या है, इस में मस्तिष्क में कैसी हानि होती है, लक्षण क्या हैं, और समय के साथ क्या होता है, और देखभाल करने वालों को क्या करना होता है. अन्य विषयों पर भी स्लाइड हैं. डिमेंशिया को समझ पायें, इस की सुविधा के लिए कई उदाहरण और चित्र हैं. यदि प्लेयर नीचे लोड न हो रहा हो तो यहाँ क्लिक करें: डिमेंशिया क्या है?(What is Dementia)Opens in new window

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इन सब विषयों पर, और अन्य उपयोगी विषयों पर अधिक जानकारी के लिए इस वेबसाइट के दूसरे पृष्ठ भी देखें
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इन्हें भी देखें….

हिंदी पृष्ठ, इसी साईट से:

डिमेंशिया के लक्षण किन रोगों के कारण हो सकते हैं, इस पृष्ठ पर: डिमेंशिया किन रोगों के कारण होता है.

इस विषय पर हिंदी सामग्री, कुछ अन्य साईट पर: यह याद रखें कि इन में से कई लेख अन्य देश में रहने वालों के लिए बनाए गए हैं, और इनमें कई सेवाओं और सपोर्ट संबंधी बातें, कानूनी बातें, इत्यादि, भारत में लागू नहीं होंगी.

इस पृष्ठ का नवीनतम अँग्रेज़ी संस्करण यहाँ उपलब्ध है: What is dementia? Opens in new window. अंग्रेज़ी पृष्ठ पर आपको विषय पर अधिक सामयिक जानकारी मिल सकती है. कई उपयोगी अँग्रेज़ी लेखों, संस्थाओं और फ़ोरम इत्यादि के लिंक भी हो सकते हैं. कुछ खास उन्नत और प्रासंगिक विषयों पर विस्तृत चर्चा भी हो सकती है. अन्य विडियो, लेखों और ब्लॉग के लिंक, और उपयोगी पुस्तकों के नाम भी हो सकते हैं.

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डिमेंशिया केयर नोट्स के हिंदी वेबसाइट पर आपका स्वागत है

डिमेंशिया क्या है? क्या यह संभव है कि आपका कोई प्रियजन डिमेंशिया से ग्रस्त है, और आपको मालूम ही नहीं? सतर्क रहने के लिए आप को डिमेंशिया के बारे में क्या जानना चाहिए? या हो सकता है कि आपके परिवार में किसी को डिमेंशिया है, और आप समझ नहीं पा रहे कि उसकी देखभाल करें तो कैसे करें, क्योंकि वह व्यक्ति आपकी बात समझ ही नहीं पाता है और अजीब तरह से पेश आ रहा है. आइये डिमेंशिया और उसकी देखभाल के बारे में कुछ आवश्यक बातें देखें.

डिमेंशिया: संक्षेप में कहें तो डिमेंशिया किसी विशेष बीमारी का नाम नहीं, बल्कि एक बड़े से लक्षणों के समूह का नाम है (संलक्षण, syndrome)। डिमेंशिया को कुछ लोग “भूलने की बीमारी” कहते हैं, परन्तु डिमेंशिया सिर्फ भूलने का दूसरा नाम नहीं हैं, इसके अन्य भी कई लक्षण हैं–नयी बातें याद करने में दिक्कत, तर्क न समझ पाना, लोगों से मेल-जोल करने में झिझकना, सामान्य काम न कर पाना, अपनी भावनाओं को संभालने में मुश्किल, व्यक्तित्व में बदलाव, इत्यादि। यह सभी लक्षण मस्तिष्क की हानि के कारण होते हैं, और ज़िंदगी के हर पहलू में दिक्कतें पैदा करते हैं। यह भी गौर करें कि यह ज़रूरी नहीं है कि डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की याददाश्त खराब हो–कुछ प्रकार के डिमेंशिया में शुरू में चरित्र में बदलाव, चाल और संतुलन में मुश्किल, बोलने में दिक्कत, या अन्य लक्षण प्रकट हो सकते हैं, पर याददाश्त सही रह सकती है. डिमेंशिया के लक्षण अनेक रोगों की वजह से पैदा हो सकते हैं, जैसे कि अल्ज़ाइमर रोग, लुई बॉडी रोग, वास्कुलर डिमेंशिया (संवहनी मनोभ्रंश), फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया, पार्किन्सन, इत्यादि।

लक्षणों के कुछ उदाहरण: हाल में हुई घटना को भूल जाना,

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कोविड-19 (COVID-19) महामारी की स्थिति में डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्तियों की देखभाल करने वालों को कई नई चुनौतोयों का समाना करना पड़ रहा है। इस स्थिति के अनेक पहलूओं पर चर्चा के लिए इस साईट पर एक नई सीरीज उपलब्ध है। देखें: कोविड-19 से बचाव पर चर्चा: भाग 1: व्यक्ति को वायरस से बचाएं, देखभाल के बदलाव पर चर्चा: भाग 2: देखभाल कैसे एडजस्ट करें, चिकित्सीय सलाह पर चर्चा: भाग 3: दवा खरीदना, टेस्ट करवाना, टेलीमेडिसिन से सलाह लेना, अस्पताल जाना और भाग 4: कारगर देखभाल और तनाव मुक्ति के लिए अन्य सुझाव, सहायता के लिए संसाधन, इत्यादि। मुख्य बिंदु को चित्रों के रूप में देखें: डिमेंशिया देखभाल और कोविड 19: कुछ सुझाव, चित्रों द्वारा

डिमेंशिया क्या है? क्या यह संभव है कि आपका कोई प्रियजन डिमेंशिया से ग्रस्त है, और आपको मालूम ही नहीं? सतर्क रहने के लिए आप को डिमेंशिया के बारे में क्या जानना चाहिए? या हो सकता है कि आपके परिवार में किसी को डिमेंशिया है, और आप समझ नहीं पा रहे कि उसकी देखभाल करें तो कैसे करें, क्योंकि वह व्यक्ति आपकी बात समझ ही नहीं पाता है और अजीब तरह से पेश आ रहा है। आइये, डिमेंशिया और उसकी देखभाल के बारे में कुछ आवश्यक बातें देखें।

डिमेंशिया: संक्षेप में कहें तो डिमेंशिया किसी विशेष बीमारी का नाम नहीं, बल्कि एक बड़े से लक्षणों के समूह का नाम है (संलक्षण, syndrome)। डिमेंशिया को कुछ लोग “भूलने की बीमारी” कहते हैं, परन्तु डिमेंशिया सिर्फ भूलने का दूसरा नाम नहीं हैं, इसके अन्य भी कई लक्षण हैं–नयी बातें याद करने में दिक्कत, तर्क न समझ पाना, लोगों से मेल-जोल करने में झिझकना, सामान्य काम न कर पाना, अपनी भावनाओं को संभालने में मुश्किल, व्यक्तित्व में बदलाव, इत्यादि। यह सभी लक्षण मस्तिष्क की हानि के कारण होते हैं, और ज़िंदगी के हर पहलू में दिक्कतें पैदा करते हैं। यह भी गौर करें कि यह ज़रूरी नहीं है कि डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की याददाश्त खराब हो–कुछ प्रकार के डिमेंशिया में शुरू में चरित्र में बदलाव, चाल और संतुलन में मुश्किल, बोलने में दिक्कत, या अन्य लक्षण प्रकट हो सकते हैं, पर याददाश्त सही रह सकती है। डिमेंशिया के लक्षण अनेक रोगों की वजह से पैदा हो सकते हैं, जैसे कि अल्ज़ाइमर रोग, लुई बॉडीज वाला डिमेंशिया, वास्कुलर डिमेंशिया (नाड़ी सम्बंधित/ संवहनी मनोभ्रंश),फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया, पार्किन्सन, इत्यादि।

लक्षणों के कुछ उदाहरण: हाल में हुई घटना को भूल जाना, बातचीत करने समय सही शब्द याद न आना, बैंक की स्टेटमेंट न समझ पाना, भीड़ में या दुकान में सामान खरीदते समय घबरा जाना, नए मोबाईल के बटन न समझ पाना, ज़रूरी निर्णय न ले पाना, लोगों और साधारण वस्तुओं को न पहचान पाना, वगैरह। रोगियों का व्यवहार अकसर काफी बदल जाता है। कई डिमेंशिया वाले व्यक्ति ज्यादा शक करने लगते हैं, और आसपास के लोगों पर चोरी करने का, मारने का, या भूखा रखने का आरोप लगाते हैं। कुछ व्यक्ति अधिक उत्तेजित रहने लगते हैं, कुछ अन्य व्यक्ति लोगों से मिलना बंद कर देते हैं और दिन भर चुपचाप बैठे रहते हैं। कुछ व्यक्ति अश्लील हरकतें भी करने लगते हैं। कौन से व्यक्ति में कौन से लक्षण नज़र आयेंगे, यह इस बात पर निर्भर है कि उनके मस्तिष्क के किस हिस्से में हानि हुई है। किसीमे कुछ लक्षण नज़र आते हैं, किसी में कुछ और। जैसे कि, कुछ रोगियों में भूलना इतना प्रमुख नहीं होता जितना चरित्र का बदलाव।

भारत में ज़्यादातर लोग इन सब लक्षणों को उम्र बढ़ने का स्वाभाविक अंश समझते हैं, या सोचते हैं कि यह तनाव के कारण है या व्यक्ति का चरित्र बिगड गया है, पर यह सोच गलत है। ये लक्षण डिमेंशिया या अन्य किसी बीमारी के कारण भी हो सकते हैं, इसलिए डॉक्टर की सलाह लेना उपयुक्त है। अफ़सोस, भारत में डिमेंशिया की जानकारी कम होने के कारण इनमे से कई लक्षणों के साथ कलंक भी जुड़ा है। इसलिए डिमेंशिया से पीड़ित व्यक्ति यह सोच कर अपनी समस्याओं को छुपाते हैं कि या उन्हें पागल समझा जाएगा या लोग हंसेंगे कि क्या छोटी सी बात लेकर डॉक्टर के पास जाना चाहते हैं! परिवार वाले इन लक्षणों को बुढापे का नतीजा समझ कर नकार देते हैं। वे यह नहीं सोचते कि सलाह पाने से स्थिति में सुधार हो सकता है। उन्हें यह भी नहीं पता होता है कि व्यक्ति को सहायता की ज़रूरत है। व्यक्ति के बदले हुए व्यवहार को परिवार वाले हट्टीपन या चरित्र का दोष या पागलपन समझते हैं, और कभी दुःखी और निराश होते हैं, तो कभी व्यक्ति पर गुस्सा करने लगते हैं।

निदान (diagnosis) क्यों ज़रूरी है: अगर कोई व्यक्ति डिमेंशिया के लक्षणों से परेशान है तो डॉक्टर से सलाह करनी चाहिए। डॉक्टर जांच करके पता चलाएंगे कि यह लक्षण किस रोग के कारण हो रहे हैं। हर भूलने का मामला डिमेंशिया नहीं होता–हो सकता है कि लक्षण किसी दूसरी समस्या के कारण हों, जैसे कि अवसाद (depression)। या हो सकता है कि यह लक्षण ऐसे रोग के कारण हैं जिसे दवाई से पूरी तरह ठीक हो सकता है। एक उदाहरण है थाइरोइड (thyroid) होरमोन की कमी होना)। कुछ प्रकार के डिमेंशिया ऐसे भी हैं जिनका उपचार तो नहीं, पर फिर भी दवाई से कुछ रोगियों को लक्षणों से कुछ आराम मिल सकता है। यह सब तो डॉक्टर की जांच के बाद ही पता चल सकता है।

डिमेंशिया किस को हो सकता है: डिमेंशिया शब्द अँग्रेज़ी का शब्द है, परन्तु इससे ग्रस्त व्यक्ति हर देश, हर शहर, हर कौम में पाए जाते हैं। इसकी संभावना उम्र के साथ बढ़ती है। अगर आप बुजुर्गों के किस्से सुनें तो पायेंगे कि परिवार ने जिसे एक अधेढ़ उम्र के व्यक्ति का अटपटा व्यवहार समझा था, वह शायद व्यवहार शायद डिमेंशिया के कारण था। चूंकि डिमेंशिया अँग्रेज़ी का शब्द है, इसलिए देवनागरी लिपि में इसे लिखने के कई तरीके हैं, जैसे कि: डिमेन्शिया, डिमेंशिया डिमेंश्या, डिमेंटिया, डेमेंटिया, इत्यादि। कुछ लोग इसके लिए संस्कृत के शब्द, मनोभ्रंश का इस्तेमाल करते हैं।

विश्व भर में डिमेंशिया की पहचान पिछले कुछ दशक में ज्यादा अच्छी तरह से हुई है, और अब डॉक्टरों का मानना है कि यह लक्षण उम्र बढ़ने का साधारण अंग नहीं हैं। जो रोग डिमेंशिया का कारण हैं, उन पर शोध हो रहा है ताकि बचाव और इलाज के तरीके ढूंढें जा सकें। आजकल भी, डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्तियों और उनके परिवार वालों के आराम के लिए कुछ उपाय मौजूद हैं, जिससे व्यक्ति और उसके परिवार वाले ज्यादा सरलता और सुख से रह सकें, लक्षणों की वजह से हो रही तकलीफें कम हो जाएँ, और घर के माहौल का तनाव कम हो।

क्या डिमेंशिया भारत में गंभीर समस्या है?कुछ लोग अब भी सोचते हैं कि डिमेंशिया भारत में आम समस्या नहीं है| अफ़सोस, सच तो यह है कि यह भारत में भी एक गंभीर समस्या है| डिमेंशिया इंडिया स्ट्रेटेजी 2018 रिपोर्ट के अनुसार सन 2015 में करीब 44 लाख लोगों को डिमेंशिया था और 2050 तक यह संख्या 143 लाख हो जायेगी। डिमेंशिया बड़ी उम्र के लोगों में अधिक होता है,और जैसे जैसे भारत में बुजुर्गों का अनुपात बढ़ता जा रहा है, डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्तियों का अनुपात भी बढता जाएगा और यह समस्या अनेक परिवारों के जीवन को छूने लगेगी| जानकारी न हो तो परिवार पहचान नहीं पायेंगे कि उनके प्रियजन की समस्याएं इस रोग के कारण है। वे उचित निदान, उपचार और देखभाल नहीं कर पायेंगे। इसलिए डिमेंशिया के बारे में जानना और इस के प्रति सतर्क रहना बहुत जरूरी है।

डिमेंशिया और बुढ़ापे में फ़र्क: डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति के साथ रहना किसी अन्य स्वस्थ बुज़ुर्ग के साथ रहने से बहुत फ़र्क है। डिमेंशिया की वजह से व्यक्ति के सोचने-करने की क्षमता पर बहुत असर होता है, और परिवार वालों को देखभाल के तरीके उसके अनुसार बदलने होते हैं। व्यक्ति से बातचीत करने का, उसकी सहायता करने का, और उसके उत्तेजित या उदासीन मूड को संभालने का तरीका बदलना होता है। समय के साथ रोग के कारण मस्तिष्क में बहुत अधिक हानि हो जाती है, और व्यक्ति ज़्यादा निर्भर होते जाते हैं। परिवार वालों को देखभाल के लिए दिन भर व्यक्ति के साथ रहना पड़ता है, और इस को संभव बनाने के लिए अपनी अन्य जिम्मेदारियों में समझौता करना पड़ता है।

डिमेंशिया सिर्फ बुढापे में ही नहीं, पहले भी हो सकता है (जैसे कि 30, 40 या 50 साल में) : कई लोग सोचते हैं कि डिमेंशिया बुढापे की बीमारी है, और सिर्फ बुजुर्गों में पायी जाती है, पर कुछ प्रकार के डिमेंशिया जल्दी शुरू हो सकते हैं। WHO (वर्ल्ड हेल्थ ऑरगैनाइज़ेशन) का अनुमान है कि 65 साल से कम उम्र में होने वाले डिमेंशिया (जिसे young onset या early onset कहते हैं) अकसर पहचाने नहीं जाते और ऐसे केस शायद 6 से 9 प्रतिशत हैं।

उचित देखभाल रोगियों और परिवार की खुशहाली के लिए बहुत ज़रूरी है: फिलहाल, अधिकांश डिमेंशिया में दवाई की भूमिका सीमित है। न तो दवाई मस्तिष्क को दोबारा ठीक कर सकती है, न ही बीमारी को बढ़ने से रोक सकती है। फिर भी कुछ केस में दवाई लक्षणों से कुछ राहत पंहुचा पाती है, इसलिए डॉक्टर की सलाह ले लेनी चाहिए। क्योंकि डिमेंशिया का सिलसिला कई साल तक चलता है, पर दवाई से रोग कम नहीं होता, इसलिए डिमेंशिया वाले व्यक्ति और परिवार की खुशहाली उचित देखभाल पर निर्भर है। यदि परिवार वाले यह समझ पाएँ कि डिमेंशिया वाले व्यक्ति को किस प्रकार की दिक्कतें हो रही हैं, और वे व्यक्ति से अपनी उम्मीदें उसी हिसाब से रखें और मदद के सही तरीके अपनाएँ तो स्थिति सहनीय रह पाती है, वरना व्यक्ति और परिवार, दोनों के लिए बहुत तनाव बना रहता है। कारगर देखभाल के लिए डिमेंशिया को समझना और सम्बंधित देखभाल के तरीके समझना आवश्यक है।

इस वेबसाइट, डिमेंशिया केयर नोट्स, हिंदी (dementiahindi.com) पर डिमेंशिया की देखभाल के लिए जानकारी, संसाधन, सलाह, सुझाव, और अनेक परिवारों की कहानियाँ है, जिससे डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल करने वाले डिमेंशिया के रोग को समझ पाएँ, और व्यक्ति की देखभाल कैसे करें, यह सोच पाएँ। वेबसाइट पर विशेष रूप से भारत में रहने वाले परिवारों के लिए जानकारी और सलाह है।

डिमेंशिया की देखभाल के तरीके अलग हैं: क्योंकि लोग डिमेंशिया और सामान्य बुढापे में अंतर नहीं समझते, इसलिए वे डिमेंशिया से पीड़ित व्यक्ति के साथ ऐसे पेश आते हैं जैसे कि उस व्यक्ति की याददाश्त या अन्य किसी क्षमता में कोई कमी ही नहीं है। वे उस व्यक्ति से उम्मीद रखते हैं कि वह उनकी बात समझ सकेगा, और थोड़ी कोशिश करे तो अपना काम भी कर सकेगा। यह सब डिमेंशिया वाले व्यक्ति के लिए खासी मुश्किल पैदा कर देता है, और वह परेशान हो जाता है तो गुस्सा करने लगता है, या संकोच करने लगता है और मेल-जोल और बातचीत बंद कर देता है। परिवार वाले समझ नहीं पाते कि उस व्यक्ति से बात करें तो कैसे, मदद कब और कैसे करें, और उसकी उत्तेजना या अन्य अजीब व्यवहार को कैसे संभालें।

परिवार वाले यदि डिमेंशिया की सच्चाई को समझ पायें, और अपने बोलने और मदद करने का तरीका बदल पायें, तो उन को और उस व्यक्ति को, दोनों को आराम पंहुचेगा।

देखभाल के लिए क्या जानना ज़रूरी है: यदि आप किसी डिमेंशिया से पीड़ित व्यक्ति की देखभाल कर रहे हैं, और दिक्कतों का सामना कर रहे हैं, तो पहले कुछ ऐसी बातें पढ़ें और ऐसे उपाय देखें जिन से आपके देखभाल करने में तुरंत आसानी हो सके। जैसे कि, डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति से बातचीत कैसे करें, मदद कैसे करें, मुश्किल व्यवहार तो कैसे समझें और कम करें। आप पहले इस पृष्ठ को देखें: देखभाल करने वालों के लिए ज़रूरी लिंक (Quicklinks for caregivers)

इस साईट पर:

  • डिमेंशिया क्या है, किन रोगों से होता है, निदान कैसे होता है, इलाज है व नहीं, यह बढ़ता कैसे है, इसका व्यवहार पर क्यों और कैसे प्रभाव पड़ता है, भारत में डिमेंशिया और देखभाल की क्या स्थिति है, इन सब विषयों के बारे में हमारा इस सेक्शन के पृष्ठ देखे: : डिमेंशिया के बारे में (About Dementia)
  • डिमेंशिया के देखभाल का सिलसिला कई साल चलता है (यह एक दशक से ज्यादा भी हो सकता है), और अगर परिवार तनाव से मुक्त रहना चाहे तो देखभाल के लिए सही तरह से प्लान करना होगा। इस सेक्शन में देखभाल के विषय पर अनेक पृष्ठ हैं: देखभाल करने वालों के लिए (Caring for dementia patients)
  • कोविड महामारी की वजह से देखभाल में अनेक नई चुनौतोयाँ हो रही हैं, इसलिए इस पर केन्द्रित कुछ ख़ास पोस्ट के लिए देखें इस सेक्शन में पृष्ठ: कोविड 19 के दौरान डिमेंशिया देखभाल (Dementia Care during COVID 19)।
  • डिमेंशिया के देखभाल करने वालों के कई इंटरव्यू हमारे अँग्रेज़ी साईट पर है। भारत में डिमेंशिया देखभाल संबंधी अनुभव वाले लेखों और ब्लॉग के लिंक भी हैं। इन सबके संशिप्त परिचय इस हिंदी साईट पर यहाँ देखें: कुछ आवाजें, कुछ इंटरव्यू ((Voices and Interviews around dementia) । इस सेक्शन में समाचार पत्रों इत्यादि में हिंदी में उपलब्ध कुछ लेखों के लिंक भी हैं ।
  • डिमेंशिया समझें के लिए और देखभाल के तरीके जानने के लिए तैयार किये गए वीडिओ आर प्रेजेनटेशन इस सेक्शन में हैं: वीडिओ आर प्रेजेनटेशन (Dementia videos and presentations)
  • डिमेंशिया और देखभाल की जानकारी के लिए अन्य उपलब्ध साधन के लिए, और भारत में डिमेंशिया के लिए सेवाओं और संस्थायों के लिए देखें यह सेक्शन: अन्य संसाधन (More Resources)
  • सम्पर्क जानकारी यहाँ है: सम्पर्क करें (Contact information)

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यह DEMENTIA HINDI वेबसाइट हमारे अँग्रेज़ी वेबसाइट, DEMENTIA CARE NOTES का हिंदी संस्करण है। इस DEMENTIA HINDI वेबसाइट पर डिमेंशिया और देखभाल पर चर्चा हमारे अँग्रेज़ी वेबसाइट जैसे ही हैं| कुछ विषयों पर चर्चा अँग्रेज़ी वेबसाइट के मुकाबले संक्षिप्त है| अगर आप अँग्रेज़ी में जानकारी का प्रयोग कर सकते हैं, तो हमारे अँग्रेज़ी वेबसाइट पर अन्य पुस्तकों, लेख, ब्लॉग, वीडियो, वगैरह के लिंक भी हैं, जो शायद आपके काम आएँ|

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