डिमेंशिया देखभाल और कोविड 19: कुछ सुझाव, चित्रों द्वारा


कोविड 19 की स्थिति के कारण डिमेंशिया देखभाल में परिवारों को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। नीचे दिए गए स्लाइड-शो में कुछ मुख्य पहलुओं के लिए सुझाव दिए गए हैं। एक स्लाइड से दूसरे स्लाइड पर जाने के लिए दायें या बाएं तरफ के तीर पर क्लिक करें। स्लाइड की सूची:

  • डिमेंशिया वाले व्यक्ति को कोविड से बचाएं
  • देखभाल को कोविड स्थिति के लिए एडजस्ट करें
  • कोविड के दौरान चिकित्सीय सहायता प्राप्त करें
  • ऐसे देखभाल के तरीके अपनाएं जो संतुलित हैं और कम तनावपूर्ण हैं
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इन पहलूओं पर अधिक विस्तार में चर्चा के लिए ये चार पोस्ट भी उपलब्ध हैं: भाग 1: व्यक्ति को वायरस से बचाएं, देखभाल के बदलाव पर चर्चा: भाग 2: देखभाल कैसे एडजस्ट करें, चिकित्सीय सलाह पर चर्चा: भाग 3: दवा खरीदना, टेस्ट करवाना, टेलीमेडिसिन से सलाह लेना, अस्पताल जाना और भाग 4: कारगर देखभाल और तनाव मुक्ति के लिए अन्य सुझाव, सहायता के लिए संसाधन, इत्यादि

डिमेंशिया देखभाल और कोविड 19 (COVID 19) (भाग 4) : कारगर देखभाल और तनाव मुक्ति के लिए अन्य सुझाव, सहायता के लिए संसाधन, इत्यादि

डिमेंशिया देखभाल और कोविड 19 पर इस सीरीज में अब तक हमने इन विषयों पर बात करी है: वायरस से डिमेंशिया वाले व्यक्ति को कैसे बचाएं, और देखभाल के तरीकों में किस तरह के बदलाव की जरूरत हो सकती है, दवा खरीदना, टेस्ट करवाना, टेलीमेडिसिन से सलाह लेना, अस्पताल जाना। सीरीज की इस आख़िरी पोस्ट में देखें कारगर व्यवस्था बनाने के लिए कुछ अन्य सुझाव। तनाव बढ़े नहीं इस के लिए स्व-देखभाल (आत्म-देखभाल, सेल्फ-केयर) बहुत जरूरी है, और इस के लिए भी कुछ सुझाव हैं। और देखभाल करने के लिए किस तरह के संसाधन हैं, उन्हें कैसे ढूँढें, इस विषय पर भी सामग्री है।

इस पृष्ठ पर:

ऐसी व्यवस्था बनाएं जो बिना थकान के लम्बे अरसे तक अपना सकें।

कोविड 19 और सम्बंधित बदलाव की वजह से घर का वातावरण काफी बदल सकता है। कार्यस्थलों के लिए जारी दिशानिर्देशों के कारण काम करने के तरीके बदल गए हैं, और कुछ प्रकार की गतिविधियाँ और आवागमन अब भी वर्जित हैं। इन सब के कारण अब कई लोग घर पर हैं। घर में अधिक लोग होने की वजह से प्राइवेसी कम हो सकती है। ऊब के कारण कुछ लोग दिन भर आवाज़ तेज करके टीवी या नेटफ्लिक्स पर लगे हों, या फ़ोन पर। दूसरों को घर से काम करने या पढ़ाई करने के लिए संघर्ष करना पड़ सकता है। घरेलू काम और खाना पकाने का कार्यभार अधिक हो जाता है, खासकर अगर काम करने वाली बाई और खाना पकाने वाले नहीं आ रहे हैं। पसंदीदा, और कुछ केस में जरूरत की, खरीदारी के लिए अधिक प्रयास की जरूरत है। लोग चिड़चिड़ाहट महसूस करते हैं । कुछ रिपोर्ट के अनुसार कोविड 19 स्थिति के कारण बहस, गुस्सा, और घरेलू हिंसा और उत्पीड़न में वृद्धि हुई है।

ऐसे वातावरण में डिमेंशिया वाले व्यक्ति के लिए और उनकी देखभाल करने वालों के लिए चुनौतियां कई गुना बढ़ जाती हैं। अच्छा होगा यदि परिवार के सदस्य घर और देखभाल के बारे में सलाह-मशवरा कर के कार्यों को आपस में बाँट लें। व्यक्ति किस देखभाल कर्ता के साथ सहज महसूस करते हैं, देखभाल के कार्यों को बांटते समय इस का ख़याल रहे। देखभाल के तरीकों में इतने बदलाव न करें जिस से व्यक्ति घबरा जाएँ या उन्हें असुविधा हो। अगर देखभाल का कार्यभार एक देखभाल कर्ता पर ज्यादा है, तो परिवार वाले बाकी कामों में अधिक सहायता दे सकते हैं। देखभाल और अन्य कार्यों को आपस में ऐसे बाँटें जो सब के अनुकूल हो और व्यावहारिक भी।

अधिकांश डिमेंशिया देखभाल संबंधी सुझाव इस बात पर केंद्रित होते हैं कि डिमेंशिया वाले व्यक्ति का जीवन कैसे बेहतर बनाया जाए। कुछ हद तक देखभाल करने वाले के तनाव को कम करने के लिए युक्तियाँ भी शामिल होती हैं। उदाहरण के लिए, एक आम सुझाव है कि परिवार वाले व्यक्ति को अनेक संज्ञानात्मक क्षमता बढ़ाने वाली गतिविधियों में शामिल करें। पर सच तो यह है कि परिवार वाले देखभाल के साथ-साथ अनेक दूसरे काम भी संभालते हैं। और कोविड 19 में उनका कार्यभार और तनाव काफी बढ़ गया है। अगर वे गतिविधियाँ बढ़ाएंगे तो कार्यभार संभालना मुश्किल होगा, पर यदि वे ऐसा नहीं करेंगे तो क्या उन्हें अपराध-बोध होगा?

ऐसे समय में संतुलन बनाए रखने के लिए यहाँ कुछ सुझाव दिए गए हैं। परन्तु कृपया इन सुझावों को अधिक तनाव का स्रोत न बनने दें। अपने तनाव को कम करने के लिए छोटे छोटे कदम लें जिन से आप को कुछ राहत मिले। अपने साथ सख्ती न करें। अपनी स्थिति को स्वीकारें और यह पहचानें कि आप का कार्यभार अधिक है और थकान स्वाभाविक है। खुद के प्रति सहानुभूति का भाव रखें न कि आलोचना का। बहुत ज्यादा काम करने की कोशिश न करें। आदर्श बनने की कोशिश न करें। कुछ लोग खुद से इतनी उम्मीद रखते हैं और इतना अपराध बोध महसूस करते हैं कि वे अपना कार्यभार हद से ज्यादा बढ़ा देते हैं। इस से उनका तनाव और चिड़चिड़ापन भी बहुत बढ़ जाता है, और घर का माहौल अधिक बिगड़ जाता है।

परिवार के अन्य सदस्यों के साथ काम बांटें। ये देखभाल के काम हों, ऐसा जरूरी नहीं। यदि अन्य परिवार के सदस्य देखभाल करने वाले के बाकी कार्य-भार को अपने ऊपर ले लें तो देखभाल करने वाले को देखभाल के लिए अधिक टाइम और उर्जा मिलेगी।

आवश्यक कार्यों और उद्देश्यों पर ध्यान केंद्रित रखें। कार्य ऐसे चुनें जिन से एक कार्य करने से कई उद्देश्य पूरे हो पायें। जो भी काम किया जा रहा है या करने की जरूरत है, उस पर विचार करें। देखें कि क्या काम एकदम आवश्यक हैं, क्या इतने जरूरी नहीं हैं, और किन कामों की बिलकुल भी जरूरत नहीं है। आवश्यक कार्यों को प्राथमिकता दें, और सोचें कि क्या इन्हें ऐसे संभाला जा सकता है कि एक ही काम करने से कई आवश्यकताएं पूरी हो जाएं। काम ऐसे करें जो व्यक्ति और देखभाल कर्ता, दोनों के लिए कारगर हो। पर ध्यान रहे, क्या कर सकते हैं, क्या अच्छा है और क्या नहीं, यह हर स्थिति और व्यक्ति के लिए अलग है। इस की कोई स्टैण्डर्ड सूची नहीं है।

एक उदाहरण: डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति के हाथ धुलवाते समय व्यक्ति के साथ गपशप करें और खेल भाव अपनाएँ जैसे कि उंगलियों की गिनती वाले कुछ बचपन की कविताएँ कहना, साबुन के बुलबुले बनाना, मज़ाक करना। ऐसा करने से एक आवश्यक काम पूरा हो जाता है और साथ-साथ एक संज्ञानात्मक खेल और मनोरंजन भी।

या मटर छीलते समय व्यक्ति के साथ बैठें, शायद उसे छीलने के लिए कुछ फली भी दें। एक घरेलू काम निपट जाता है, और बातचीत और गतिविधि भी हो जाती है। इस तरह के रचनात्मक तरीकों के बारे में सोचें, पर ध्यान रहे, व्यक्ति की सुरक्षा का ख़याल रहे।

याद रखें, उद्देश्य तनाव को कम करना है। यदि माँ के साथ मटर छीलना तनाव बढ़ाता है, तो न करें। कार्यों का चयन इस बात पर आधारित होना चाहिए कि देखभाल करने वाले और व्यक्ति दोनों के लिए ठीक हों, न कि किसी पुस्तक या संसाधन में उनका उल्लेख हो 🙂 ।

देखभाल का कार्यभार तभी बढ़ाएं अगर बहुत आवश्यक हो। परिवर्तन करते समय, जहां उचित हो, वहां मौजूदा कार्यों की जगह ऐसे कार्य करें जो इस स्थिति में अधिक उपयुक्त हैं। जब देखभाल कार्यों या घर के काम की बात आती है, तो हमेशा ऐसा लगता है कि और काम करने की गुंजाइश है। घर की कुछ और अधिक सफाई हो सकती है, व्यक्ति के साथ कुछ और गतिविधियाँ हो सकती हैं। लेकिन यह नजरिया रहे तो काम का कोई अंत नहीं है। और इस के बगैर भी सब ठीक-ठाक रहता है। दिनचर्या से थकान कम से कम हो। दिनचर्या व्यवहारिक हो। आदर्श देखभाल कर्ता बनने की कोशिश में खुद को न फसायें।

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दूर से देखभाल करने के लिए विशेष तरीके खोजें।

यदि डिमेंशिया वाले व्यक्ति अकेले रहते हैं तो देखभाल कर्ता की भूमिका दूर से देखभाल का प्रबंधन करने वाले की है। यह स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण है क्योंकि देखभाल के रोजमर्रा वाले कार्यों के लिए वे दूसरे लोगों और संस्थाओं पर निर्भर है। यदि डिमेंशिया वाले व्यक्ति का घर में सही इंतजाम नहीं है, तो अन्दर क्या हो रहा है यह देखने के लिए स्काइप जैसा कोई वीडियो संपर्क हो सकता है। इस तरह की स्थिति आमतौर पर ऐसे परिवारों में हैं जहां वयस्क बच्चे एक घर में हैं और उनके बुज़ुर्ग माता-पिता अकेले दूसरे घर में हैं, चाहे उसी शहर में हों या दूसरे शहर या देश में।

ऐसी स्थिति में, दूर से देखभाल करने वालों को एक बहुत ही सक्रिय भूमिका निभानी होगी, स्थिति के बारे में सूचित रहना होगा, और सब संभव सहारे के स्रोतों से जुड़ा रहना होगा।

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परिवार वालों के लिए अतिरिक्त सुझाव।

वरिष्ठ नागरिकों को कोविड 19 का खतरा ज्यादा है, खास तौर पर घर से बाहर जाने पर, इसलिए घर से ही खरीदारी और सब तरह के प्रबंध कर पाने की क्षमता बहुत जरूरी है। परिवार वालों को लोगों से जुड़े रहना चाहिए और जान-पहचान वालों के नेटवर्क का इस्तेमाल कर पाना चाहिए। कई देखभाल करने वाले खुद वरिष्ठ नागरिक होते हैं, और उनकी अपनी भी कई स्वास्थ्य चुनौतयां हैं।

कई वरिष्ठ नागरिक टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल में सहजता नहीं महसूस करते। वे दूसरों से मदद मांगने में भी झिझकते हैं। इस लिए कोविड 19 जैसी स्थिति में वे और भी परेशान हो रहे हैं। उन्हें यह जानकर हिम्मत मिलेगी कि उनके जैसे अन्य लोगों ने पाया है कि टेक्नोलॉजी का उपयोग करना और दूसरों से मदद लेना इतना मुश्किल नहीं था। बस शुरू में हिचकिचाहट की बाधा पार करनी थी। पूछने पर पड़ोसी मदद कर सकते हैं, और दोस्त और उनके बच्चे भी। वरिष्ठों के साथ काम करने वाले संगठन जरूरी कार्य करने में मदद कर सकते हैं, या वे वरिष्ठों को टेक्नोलॉजी और अन्य आवश्यक कौशल सिखा सकते हैं। कोरोना योद्धाओं से संपर्क किया जा सकता है। कुछ ऐसे फ़ोरम हैं जहां लोग विशिष्ट सहायता मांग सकते हैं।

सामान्य तौर पर, दूसरों पर आश्रित होना और असहाय महसूस करना बहुत ही निराश कर सकता है। यह निश्चित नहीं है कि कोविड 19 और संबंधित प्रतिबंध और चुनौतियां कब तक जारी रहेंगी और समय के साथ ये कैसे बदलेंगी। लेकिन कुछ कोशिश करें तो देखभाल करने वाले स्थिति को संभालने के लिए बेहतर तरीके ढूंढ सकते हैं और जरूरी कौशल भी सीख सकते हैं, जैसे कि टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल। वे गिने-चुने लोगों से मदद मांगने के तरीके भी ढूँढ़ सकते हैं।

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स्व-देखभाल और तनाव कम करने के लिए कुछ उपाय।

देखभाल कर्ता के लिए स्व-देखभाल आवश्यक है। ऐसे व्यवहारिक तरीके चुनें जो आप रोज कर पायें। किसी भव्य आदर्श स्व-देखभाल प्रोग्राम की उम्मीद में न बैठे रहें, क्योंकि वह आप शायद न कर पायें।। कोविड 19 और लागू प्रतिबंधों और आवश्यक सावधानियों की स्थिति में देखभाल करने वालों को स्व-देखभाल के लिए ज्यादा टाइम निकाल पाना मुश्किल है। पहले के मुकाबले टाइम कम मिलेगा। फिलहाल बाहर टहलना या जॉगिंग के लिए जाना शायद इतना उचित नहीं है। योग क्लास या जिम जाने के विकल्प उपलब्ध नहीं हैं। घर पर व्यायाम कर पायें, यह कुछ लोगों के लिए तो संभव है पर दूसरों के लिए नहीं है। खुद के लिए ज्यादा लम्बा टाइम निकालना शायद न हो पाए। प्राइवेसी कम है। एक देखभाल करने वाले ने साझा किया कि वह एक भीड़ भरे घर के माहौल में निजी विचारों को अपनी डायरी लिखने में सहज महसूस नहीं करती हैं। एक अन्य महिला ने कहा कि दोस्तों से फ़ोन पर बात कर पाने के लिए उसे बाथरूम में छुपना पड़ता है ताकि और लोग उसकी बात न सुन पायें।

अपनी स्व-देखभाल के लिए ऐसे छोटे-छोटे काम की पहचान करें जिन में अधिक जगह या सामान की जरूरत नहीं है, और जिन्हें आप भरे हुए, शोर वाले घर में भी आराम से कर सकते हैं। कुछ राहत देने वाली चीजों की तलाश करें। ऐसे कार्य चुनें जिन से आपको कुछ राहत मिले और जो आप दिन में कई बार कर सकें। ये छोटी छोटी चीज़ें आपको दिन में कई बार करनी याद रहें, इस के लिए इन्हें अन्य घटनाओं से जोड़ लें।

यहाँ एक उदाहरण है: हर बार जब एक कमरे से दूसरे में जाते हैं, तो तीन गहरी साँसें लें। या हर घंटे हेडफ़ोन पर एक गीत सुनें। फोन अलार्म रिमाइंडर के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।रिंग टोन पर ऐसा गाना लगाएं जो आपके चेहरे पर मुस्कान लाए या जिस से आप शांति महसूस करें। कुछ सोचने से आप ऐसी कई छोटी चीज़ें पहचान पायेंगे जो आप बिना कुछ ज्यादा इंतज़ाम करे और बिना किसी के जाने हुए कर सकते हैं और जिन के लिए अलग अकेले जा कर करने की जरूरत नहीं, जिनमें गोपनीयता की आवश्यकता नहीं है।

दोस्तों के साथ जुड़े रहें। अपने संपर्कों की सूची से रोज कुछ दोस्तों से बात करें, ताकि दोस्तियाँ और रिश्ते बने रहें।

खुद को सूचित रखें पर घबराएं नहीं। आजकल मीडिया में कोविड 19, लॉकडाउन, अनलॉक, परस्पर विरोधी राजनीतिक विचार और विकल्प, और चौंकाने वाले अनुमान भरपूर हैं। खुद को सूचित रखना एक आवश्यकता है, लेकिन खबरों को दिन भर पढ़ते रहने से डर, हताशा, असहाय होने की भावना और तनाव बहुत बढ़ सकता है। अच्छा यही होगा कि आप स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय और राज्य प्रशासन और राज्य पुलिस वेबसाइट जैसे आधिकारिक स्रोतों से सही सूचना प्राप्त करें। एक तरीका यह है कि आप तय कर लें कि दिन में आप ख़बरें पढ़ने के लिए कितना टाइम खर्च करेंगे और इस समय पर आप केवल उपयोगी जानकारी की तलाश करेंगे। यदि आपके पास कुछ अतिरिक्त टाइम है, तो इसे निराशाजनक समाचार बार-बार देखने के बजाय किसी रचनात्मक और सशक्त बनाने वाले काम के लिए उपयोग करें, या कुछ देर आराम करें।

तनाव के लिए हेल्पलाइन:

स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से मनोसामाजिक टोल-फ्री हेल्पलाइन पर संपर्क करें: 080-46110007।

एक बहुत ही उपयोगी संसाधन iCall साइकोसोशल हेल्पलाइन (iCall Psychosocial Helpline) है, जो मुफ्त परामर्श प्रदान करता है, और 93702 48501, 99202 41248, 83697 99513 या 92929 87821, ईमेल icall@tiss.edu, और nULTA ऐप (चैट) का उपयोग करके पहुँचा जा सकता है: सोमवार से शनिवार सुबह 10 बजे से रात 8 बजे तक।

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डिमेंशिया देखभाल संबंधी संसाधन खोजें।

डिमेंशिया की सेवा प्रदाता संस्थाएं, जो पहले डे केयर, मेमोरी कैफ़े, और ऐसे अन्य प्रोग्राम चला रही थीं, उन सब ने ऐसे सब प्रोग्राम निलंबित कर दिए हैं जिन में डिमेंशिया वाले व्यक्ति या देखभाल कर्ता उनके केंद्र में कुछ गतिविधि करते थे या कुछ सहायता या समर्थन प्राप्त करते थे। शायद ये प्रोग्राम कुछ टाइम बाद फिर से चालू करें, पर परिवार वाले भी अब ऐसी सेवाओं के लिए कोविड होने के भय से शायद जाना पसंद न करें । कुछ संगठन इन सेवाओं की जगह अब ऑनलाइन / फोन के माध्यम से सहायता कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, वे अब स्काइप या ज़ूम या अन्य प्लेटफार्म का उपयोग करके ऑनलाइन सपोर्ट ग्रुप मीटिंग करते हैं, और फ़ोन के माध्यम से अधिक जानकारी और सुझाव देते हैं। कुछ लोग इंटरएक्टिव अभ्यासों आदि के लिए सत्र आयोजित करते हैं। लेकिन अन्य संगठनों ने अभी तक ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर अपना काम नहीं बढ़ाया है। कुछ संगठन ऑनलाइन समर्थन तो प्रदान करते हैं, लेकिन मुख्यतः सिर्फ उन जाने-पहचाने परिवारों के लिए जो उनके केंद्र आया करते थे।

ऑनलाइन / फोन समर्थन का एक फायदा यह है कि समर्थन देने वाली संस्था आपके ही शहर में हों, ऐसा जरूरी नहीं। सहायता ढूँढने वाले परिवार भारत स्थित संस्थाओं के लिए व्यापक खोज कर सकते हैं । अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन सेवाएं भी कुछ प्रकार की जानकारी के लिए उपयोगी होंगी, और अंतर्राष्ट्रीय फोरम में साझा किये गए अनुभव और सुझाव भी मददगार हो सकते हैं।

संक्षेप में, उपलब्ध सहायता भारत से ही हो, यह जरूरी नहीं। सहायता स्काइप, ज़ूम, सिस्को वेबेक्स, फेसबुक लाइव, यूट्यूब लाइव, ऑनलाइन मंचों, फोन हेल्पलाइन आदि जैसे प्लेटफार्म पर मिल सकती है। कुछ वेबिनार / बैठकें सूचना प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करती हैं, और टाइप किए गए प्रश्नों का जवाब देती हैं। अन्य उदाहरण हैं सपोर्ट ग्रुप मीटिंग और व्यायाम कार्यक्रम। कुछ प्रोग्राम सार्वजनिक हैं। इनमें कोई भी शामिल हो सकता है / कोई भी देख सकता है,और रिकॉर्डिंग भी उपलब्ध होती है।

ऑनलाइन माध्यम पर उपलब्ध सहायता का उपयोग करते समय परिवारों को अपनी गोपनीयता के बारे में सावधान रहने की आवश्यकता है। हो सकता है कि वे अपने नाम को उनके सवालों के साथ नहीं जोड़ना चाहें। इसलिए, उदाहरण के लिए, फेसबुक के मुकाबले वे एक ज़ूम प्रोग्राम पसंद कर सकते हैं, क्योंकि फेसबुक लाइव सेशन पर अगर वे कुछ पूछें तो सब देख पायेंगे कि किसने प्रश्न उठाया है। सामान्य तौर पर परिवार ऐसे सत्रों से भी लाभ उठा सकते हैं जहां अन्य लोग सवाल पूछ रहे हैं और उनके मुद्दे पर भी लोगों के सवाल होंगे।

ऑनलाइन / फोन द्वारा सहायता देने वाले संसाधनों की पहचान के लिए परिवार वाले उन संस्थाओं से पूछ सकते हैं जिनके साथ वे पहले से ही संपर्क में थे। वे अन्य डिमेंशिया सेवा प्रदाता/ संस्था से भी उनकी ऑनलाइन/ फ़ोन सेवाओं के बारे में पूछ सकते हैं। भारत के विभिन्न शहरों में डिमेंशिया संस्थाओं की जानकारी इन पृष्ठों पर उपलब्ध है)। एक पाठक से प्राप्त एक उपयोगी टिप: वरिष्ठ नागरिकों (सीनियर सिटीजन) के लिए उपलब्ध हेल्पलाइन भी डिमेंशिया वाले व्यक्ति की देखभाल संबंधी कठिनाइयों के लिए उपयोगी हो सकती हैं। ये हेल्पलाइन परिवारों को जानकारी दे सकती हैं या उन्हें ऐसी संस्थाओं से जोड़ सकती हैं जो उस समस्या के लिए अधिक उपयोगी हैं। अन्य स्रोतों से सहायता न मिले तो इन्हें भी आजमायें।

ध्यान दें कि भले ही कोई संसाधन डिमेंशिया के लिए न हो, वहां भी उपयोगी जानकारी और सहायता मिल सकती है, विशेषकर ऐसी संस्थाएं जो वरिष्ठ नागरिकों, पार्किंसंस रोग, विकलांगता या मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों से जूझ रहे व्यक्तियों की मदद करती हैं। इन क्षेत्रों और डिमेंशिया के बीच चुनौतियों और सुझावों/ समाधानों में काफी समानताएं हैं।

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डिमेंशिया देखभाल करने वाले परिवारों की मदद कैसे करें।

परिवारों की मदद करने वाले लोग ऊपर लिखी गयी बातों से मदद करने के लिए क्षेत्रों की पहचान कर सकते हैं। कुछ सुझाव नीचे देखें:

  • उपलब्ध हेल्पलाइन और अन्य ऑनलाइन संसाधनों को प्रचारित किया जाना चाहिए। इन की जानकारी व्याप्त की जानी चाहिए ताकि जिन्हें मदद की आवश्यकता है वे इनसे संपर्क करें।
  • ऑनलाइन सहायता समूह बनाएं, और तनाव के लिए फोन परामर्श दें। विश्वसनीय डॉक्टरों का डेटाबेस उपलब्ध करवाएं। समर्थन सभी परिवारों के लिए उपलब्ध होना चाहिए। सहायता कई भाषाओं में उपलब्ध होनी चाहिए और कई प्रकार के देखभाल करने वालों के लिए उचित होनी चाहिए। यह केवल अंग्रेजी बोलने वाले उच्च-मध्यम वर्गीय शहरी परिवार तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
  • स्वास्थ्य संबंधी सहायता कैसे प्राप्त करें, इस पर परिवारों को जानकारी और सहायता देनी चाहिए।
  • डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्य कर्मचारियों और संसाधनों के नाम और संपर्क की सूचना एकत्रित करके उपलब्ध करवाना एक बहुत उपयोगी कदम होगा। घर पर आकर सलाह देने वाले डॉक्टर की सूची भी बहुत मददगार होगी। और ऐसे डॉक्टर जो टेलीमेडिसिन में नए मरीजों को सलाह देने के लिए तैयार हों। इस तरह की जानकारी से परिवार डॉक्टर की सलाह और अन्य स्वास्थ्य सहायता अधिक आसानी से प्राप्त कर पाएंगे।
  • एक अन्य क्षेत्र है देखभाल करने वालों को ऑनलाइन संसाधनों का उपयोग करने के लिए प्रशिक्षण देना।
  • परिवारों तक पहुँच पाने के तरीके बहुत तकनीकी हों या महंगे उपकरणों और तेज इन्टरनेट पर निर्भर हों, ऐसा नहीं होना चाहिए। रेडियो कार्यक्रम और सस्ते फ़ोन पर चलने वाले सिस्टम भी बहुत कारगर हो सकते हैं।
  • जागरूकता क्षेत्र में कार्यरत लोग डिमेंशिया व्यक्तियों की कोविड 19 स्थिति में होने वाली समस्याओं के प्रति समाज और अन्य संस्थाओं में संवेदनशीलता पर काम कर सकते हैं। वे कोशिश कर सकते हैं कि डिमेंशिया वाले लोग और उनके देखभाल करने वालों को सहायता की जरूरत है, इस बात को भूला न जाए ।

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इस सीरीज के अन्य भाग: कोविड 19 से बचाव पर चर्चा: भाग 1: व्यक्ति को वायरस से बचाएं, देखभाल के बदलाव पर चर्चा: भाग 2: देखभाल कैसे एडजस्ट करें, और चिकित्सीय सलाह पर चर्चा: भाग 3: दवा खरीदना, टेस्ट करवाना, टेलीमेडिसिन से सलाह लेना, अस्पताल जाना

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डिमेंशिया देखभाल और कोविड 19 (COVID 19) (भाग 3): दवा खरीदना, टेस्ट करवाना, टेलीमेडिसिन से सलाह लेना, अस्पताल जाना

कोविड सम्बंधित पोस्ट की इस सीरीज में अब तक हम देख चुके हैं कि वायरस से डिमेंशिया वाले व्यक्ति को कैसे बचाएं और उनकी देखभाल के तरीकों में किस तरह के बदलाव की जरूरत हो सकती है

देखभाल करने वालों की चिंता और चुनौती का एक बड़ा हिस्सा चिकित्सा पहलुओं से संबंधित है। जैसे, जरूरत पड़ने पर चिकित्सीय सहायता कैसे प्राप्त करी जाय, बाधाओं और प्रतिबंधों के कारण नए नियमों के अंतर्गत मदद कैसे प्राप्त करें, जैसे परिवहन की व्यवस्था करना, और आपात स्थिति में तुरंत सहायता पाना। इसके अलावा, सब लोगों में आजकल अस्पताल का डर है कि कहीं वहां जा कर वहां से बीमार न पड़ जाएँ! इसलिए देखभाल कर्ताओं के लिए एक चुनौती यह है कि वे किसी भी स्वास्थ्य संबंधी स्थिति को ठीक से समझें। उन्हें सोचना है कि सलाह और चिकित्सा कैसे पायें, और यदि अस्पताल जाना हो, तो अस्पताल से कोविड 19 होने के खतरे से कैसे बचें।

स्वास्थ्य संबंधी पहलुओं को संभालने के लिए सही जानकारी और उपयुक्त योजना की आवश्यकता होती है। प्रतिबंधों के कारण कुछ नई अड़चनें हो सकती हैं। यह इसलिए क्योंकि सरकारी निर्देश बदलते रहते हैं और क्या संभव है और अनुमति कैसे लें, यह बदलता रहता है। इसलिए देखभाल करने वालों को सूचित रहना चाहिए और बदलते परिवेश के हिसाब से योजना बदलते रहना चाहिए।

बाहर जाने वाले वरिष्ठों के कोविड 19 के जोखिम को विभिन्न दिशानिर्देशों में पहचाना गया है। 65 से ऊपर के लोगों को घर पर ही रहने की सलाह दी गयी है। सुझाव है कि आवश्यक कार्यों और स्वास्थ्य प्रयोजनों की वजह के अलावा वे घर पर ही रहें। डॉक्टर की सलाह के लिए वे टेलीकंसल्टेशन का उपयोग कर सकते हैं।

चिकित्सा सहायता के विभिन्न पहलुओं पर नीचे चर्चा की गई है। ध्यान दें कि यदि किसी डिमेंशिया वाले व्यक्ति को घर से बाहर कुछ जांच या परामर्श आदि के लिए ले जाया जा रहा है, तो सब सावधानियां बरतनी होंगी। व्यक्ति को मास्क पहने रहना होगा और यह भी ध्यान देना होगा कि वे अपनी आँखें, नाक और मुंह को न छूएं। हाथ की सफाई के लिए हाथ धोना या सैनिटाइज़र का इस्तेमाल करना होगा। इसके लिए साथ जाने वालों को बहुत सतर्क रहना होगा। व्यक्ति उन की बात मानें, इस के लिए उन्हें बार-बार प्यार से समझाते रहना होगा।

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दवा और अन्य मेडिकल सामान खरीदना।

दवा की दुकानें खुली हैं। कुछ लोग होम डिलीवरी भी करते हैं, खासकर अगर परिवार नियमित रूप से उनसे दवा खरीदता रहा है। लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में दवाएं प्राप्त करने में कई लोगों को दिक्कत हुई थी, पर अब स्थिति लगभग सामान्य है। अनलॉक के चरण लागू हो रहे हैं और इन से स्थिति में और भी सुधार है। पर अब भी कुछ दवाएं स्टॉक में नहीं हैं या उनके लिए कई दिनों तक इंतजार करना पड़ सकता है। कुछ फार्मेसियाँ हाल के नुस्खे के बिना दवा देने को तैयार नहीं होती हैं, खासकर कुछ श्रेणियों की दवाओं के लिए। दवाएं ऑनलाइन भी उपलब्ध हैं। पर सब दवाएं आसानी से उपलब्ध नहीं होंगी। ऑनलाइन दवा खरीदने के लिए नुस्खे आवश्यक हैं।

अफ़सोस, सभी परिवारों के पास हाल के नुस्खे नहीं हैं। वास्तव में, उनके पास कुछ दवाओं के लिए हो सकता है कोई नुस्खा न हो। यह विशेष रूप से सप्लीमेंट या आयुर्वेदिक या इस तरह की गैर-एलोपैथी दवाओं के लिए है, या ऐसी दवाओं के लिए जिनका उपयोग वे वर्षों से कर रहे हैं। कई परिवार डॉक्टरों के साथ नियमित संपर्क में नहीं होते हैं। वे पुराने नुस्खे के साथ ही काम चलाते आ रहे हैं और वर्षों तक एक ही दवा देते जा रहे हैं। अपनी सोच-समझ से वे खुद ही दवा की मात्रा (डोज़) को ऊपर-नीचे एडजस्ट करते रहते हैं। यह चिकित्सकीय रूप से उचित नहीं है, लेकिन फिर भी एक वास्तविकता है।

इसलिए, परिवारों को यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि उनके पास अपनी दवाओं के लिए नुस्खे हैं। अगर नहीं हैं और आवश्यकता पड़े तो वे इन्हें टेलीमेडिसिन से प्राप्त कर सकते हैं। टेलीमेडिसिन के लिए नीचे का सेक्शन देखें। दवा कहाँ से खरीद सकते हैं, यह पता चला कर रखें। कुछ हफ्तों के लायक स्टॉक रखें। होम डिलीवरी आजकल “संपर्क-मुक्त” (कांटेक्ट-फ्री) है। लेकिन यदि ऐसा नहीं है, तो डिलीवरी लेते समय फेस-मास्क और सैनिटाइज़र का उपयोग अवश्य करें। इसके अलावा, अलग-अलग लोग डिलीवरी पैकेट प्राप्त करने के लिए अलग-अलग तरीकों का उपयोग करते हैं ताकि उन पर वायरस मौजूद न रहे। इन पर अनेक दिशानिर्देश / लेख हैं। कई लेखों में यह सुझाव है कि किसी भी पैकेट को खोलने से पहले कुछ घंटे धूप में रखें। लेकिन कृपया याद रखें कि अधिकांश दवाओं को घंटों के लिए सीधे धूप में नहीं रखना चाहिए। यह कदम शायद वायरस को मार दे, पर यह दवा को बेकार और बेअसर भी कर सकता है।

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ब्लड टेस्ट और अन्य जांच करवाना।

घर आकर रक्त परीक्षण (ब्लड टेस्ट) के लिए सैंपल लेने वाली सेवाएं उपलब्ध हैं। टेस्ट के लिए तकनीशियन किस दिन आ पायेगा यह सेवा में स्टाफ की उपलब्धी पर निर्भर होगा। अपने शहर में ऐसी सेवाओं के संसाधनों के लिए देखें: हमारे अंग्रेजी वेबसाइट के संसाधन पृष्ठ )। कुछ जगहों में लागू प्रतिबंधों के कारण पुलिस नाकाबंदी हो सकती है, खासकर यदि आप कन्टेनमेंट ज़ोन में हों। आने-जाने के लिए अनुमति की जरूरत हो सकती है। ऐसे में सेवा प्रदाता अपने स्टाफ को सैंपल लेने के लिए शायद नहीं भेज पायेंगे। पड़ोसियों से पूछें कि आपके इलाके के लिए कौन सी सेवा भरोसेमंद है। यदि आप एक अपार्टमेंट परिसर में हों तो पता चला लें कि सैंपल कलेक्ट करने के लिए आने वाले तकनीशियन को अन्दर आने की अनुमति दी जाएगी या नहीं। अनलॉक लागू होने के बाद अधिकाँश परिसर में यह समस्या नहीं है, पर फिर भी पता चला लें। कलेक्शन के समय सुरक्षित रहने के लिए हाथ सैनिटाइज़र, मास्क आदि जैसी सावधानियों का उपयोग करें और तकनीशियन को भी सुरक्षित रखें। बार-बार बुलाने के बजाय, एक बार में ही सब टेस्ट करवाने की सोचें। कुछ जांचों के लिए अस्पताल जाना जरूरी होता है। ये टेस्ट करवाने ज़रूरी हैं या नहीं, इस के लिए डॉक्टर से बात कर लें।

अच्छा यही होगा कि आप डॉक्टर से सलाह करें कि किन-किन परीक्षण और जांच की आवश्यकता है, और किन को (और कब तक) स्थगित किया जा सकता है। इस सलाह के लिए आप टेलीमेडिसिन का इस्तेमाल कर सकते हैं।

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टेलीमेडिसिन का उपयोग करके चिकित्सीय सलाह लेना।

ऐसे कई कारण हैं जिन की वजह से डॉक्टर की सलाह की आवश्यकता हो सकती है। उदारहण हैं – नए नुस्खे प्राप्त करने की जरूरत, , कोई नए चिंताजनक शारीरिक या मानसिक लक्षण, मूड की समस्याएँ, व्यक्ति की हालत पहले से खराब होना, और अन्य मौजूदा बीमारियों से सम्बंधित समस्याएं, जैसे कि उच्च रक्तचाप, डायबिटीज, वगैरह।

अधिकांश अस्पताल और पॉलीक्लिनिक काम तो कर रहे हैं, पर कम कर्मचारियों के साथ। उन्होंने ओपीडी समय को सीमित कर दिया है। स्वास्थ्य संस्थाओं के लिए जारी विभिन्न एसओपी के अनुसार सुरक्षा के लिए बार बार क्लिनिक और अस्पतालों में मशीनों और बाकी जगह को साफ करते रहना होता है, और इस की वजह से हर मरीज़ के लिए अधिक टाइम लगता है। वहां जा कर डॉक्टर से सलाह को पाने में ज्यादा मुश्किल होगी। साथ ही, अस्पताल यात्रा की योजना बनाने में भी चुनौतियाँ हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय गैर-आपातकालीन स्थितियों के लिए टेलीमेडिसिन के उपयोग की सिफारिश करता है। इसके लिए मंत्रालय ने व्यापक दिशानिर्देश भी जारी किए हैं। कई डॉक्टर और अस्पताल अब टेलीमेडिसिन द्वारा सलाह दे रहे हैं। परन्तु डॉक्टर से सलाह करने का यह तरीका नया है। डॉक्टर और मरीज़, दोनों ही इस के आदि नहीं हैं। नीचे देखें टेलीमेडिसिन का कारगर इस्तेमाल करने की लिए कुछ प्रमुख बिंदु। ये परिवारों और डॉक्टरों के अनुभवों पर आधारित हैं।

  • ध्यान दें कि टेलीमेडिसिन कोई मुफ्त हेल्पलाइन नहीं है। सामान्य डॉक्टरी सलाह की तरह इस में भी फीस देनी होती है। परामर्श करने से पहले फीस कितनी है और भुगतान कैसे करना होगा, इस पर स्पष्टता प्राप्त करें। कुछ डॉक्टर सलाह देने के बाद फीस लेते हैं, तो कुछ एडवांस में लेते हैं।
  • कोशिश करें कि टेलीमेडिसिन द्वारा सलाह उसी डॉक्टर से लें जिस के पास आप व्यक्ति के लिए नियमित रूप से जाते हैं और जो आपको जानता है। एक नए डॉक्टर से सलाह करने के मुकाबले यह अधिक अच्छा है। इसके कई कारण हैं।
    • आपके परिचित डॉक्टर को या तो व्यक्ति का केस याद होगा या उन्हें कुछ मुख्य बातें याद दिलाने से केस याद आ सकता है। उनके पास केस की फाइल मौजूद हो सकती है। इसके विपरीत यदि नए डॉक्टर से सलाह करें तो व्यक्ति की केस हिस्ट्री देनी होगी। केस समझाते समय यह सोचना होगा कि किस पहलू को प्राथमिकता दें। यह मुश्किल काम है। हो सकता है आपके पास सारा डेटा भी न हो, खासकर अगर पहले वाले डॉक्टर ने केस फाइल अपने पास ही रखी हो।
    • परिचित डॉक्टर के आपको उपयुक्त सलाह देने की अधिक संभावना है। एक नया डॉक्टर संकोच कर सकता है या केस लेने से मना भी कर सकता है। डॉक्टर कह सकता है कि, “क्या करना है यह तो आपको ही तय करना होगा”, या “मैं ऐसे कुछ नहीं कह सकता। यदि आप चिंतित हैं, तो कृपया अस्पताल जाएँ।”
  • टेलीकंसल्टेशन के लिए तैयार होने के लिए व्यक्ति की केस हिस्ट्री, सबसे नया प्रिस्क्रिप्शन, टेस्ट रिपोर्ट, उनकी वर्तमान समस्या और सवालों को इकट्ठा करने की आवश्यकता है। यह कदम अपने परिचित डॉक्टर से परामर्श कर रहे हों, तब भी फायदेमंद है। यह इसलिए क्योंकि हो सकता है डॉक्टर को केस पूरी तरह से याद न हो और उनके पास केस फाइल न हो। परिवार वाले जितना अधिक तैयार होंगे,उन्हें उतनी ही उपयोगी सलाह मिलेगी।
  • पुरानी हिस्ट्री के मुख्य बिंदु और नए टेस्ट रिजल्ट डॉक्टर के पास सलाह करने से पहले कैसे उपलब्ध करवा सकते हैं, यह पता लगाएं, वर्ना अपॉइंटमेंट का अधिकाँश समय टेस्ट पढ़ कर सुनाने में जा सकता है ।
  • याद रखें कि अगर डॉक्टर को लगता है कि उनके पास केस का पर्याप्त डेटा नहीं है या उन्हें व्यक्ति की शारीरिक परीक्षा करने की आवश्यकता है तो वे केस पर सलाह देने से इनकार कर सकते हैं।
  • “वीडियो” पर परामर्श लेने का प्रयास करें। केवल बोलने या टेक्स्ट करने के मुकाबले यह अधिक कारगर है। वीडियो पर आपको और डिमेंशिया वाले व्यक्ति को देखने पर डॉक्टर को केस पहचानने में आसानी होगी। वे सलाह देने में अधिक सहज होंगे। यदि डिमेंशिया व्यक्ति को वीडियो कॉल में शामिल करना चुनौतीपूर्ण है, तो आप व्यक्ति की तस्वीर साझा कर सकते हैं। या डॉक्टर को व्यक्ति के वीडियो क्लिप दिखा सकते हैं। कुछ डॉक्टर व्हाट्स-अप वीडियो फॉरवर्ड देखने को तैयार होते हैं।
  • एक टेली-कंसल्टेशन का दायरा सीमित है। सरकार ने निर्धारित किया है कि टेलीमेडिसिन के माध्यम से कौन सी दवा दी जा सकती हैं और कौन सी नहीं। गाइडलाइन में बताया गया है कि नया केस है, या मौजूदा परिचित केस है पर उस में नई चिकित्सीय समस्या है तो डॉक्टर क्या दे सकते हैं। यह भी बताया गया है कि पहले से परिचित केस की पुरानी बीमारी का फॉलोअप है, तो उस में डॉक्टर क्या दे सकते हैं।
  • पर डॉक्टर को परिवार को यह बताने में सक्षम होना चाहिए कि जिस समस्या के लिए आपने संपर्क करा है, क्या वह इमरजेंसी स्थिति है और क्या आपको अस्पताल जाना चाहिए।
  • सुनिश्चित करें कि टेली-कंसल्टेशन के बाद परचा ऐसे रूप में मिले जो केमिस्ट या ऑनलाइन फार्मेसी उसे स्वीकार करे। पर्चे में डॉक्टर का नाम, संपर्क और रजिस्ट्रेशन नंबर, रोगी का नाम, पर्चे की तिथि, दवा का नाम और इसके सामान्य (जेनेरिक) नाम और इसकी ताकत और खुराक सब स्पष्ट होने चाहियें।

समय के साथ, जैसे जैसे अधिक लोग टेलीमेडिसिन इस्तेमाल करेंगे, अधिक डॉक्टर भी इसके अभ्यस्त होंगे। शायद उन्हें प्रशिक्षण भी मिले। वर्तमान में, अधिकांश डॉक्टरों को टेलीमेडिसिन इस्तेमाल करने की आदत नहीं है। भले ही वे अपने क्लिनिक में परामर्श के लिए बहुत अच्छे हों, लेकिन टेलीमेडिसिन में कुशल होने में कुछ टाइम लग सकता है। परिवारों के लिए भी यह सब बहुत नया है। इस में अधिक अनुभव होने पर डॉक्टर और परिवार दोनों ही टेलीमेडिसिन में अधिक कारगर होने लगेंगे। परिवार वाले समझने लगेंगे कि टेलीमेडिसिन के लिए तैयार कैसे हों, और प्रश्न कैसे पूछें।

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अस्पताल जाना, जैसे कि आपातकालीन स्थिति में या आवश्यक चिकित्सा प्रक्रिया के लिए।

महामारी के माहौल में किसी क्लिनिक या अस्पताल पर जाना एक कठिन निर्णय हो सकता है। लोग डरते हैं कि अस्पताल में कोविड 19 लग जाने का खतरा ज्यादा है। कई परिवार अस्पताल नहीं जाना चाहते हैं। परन्तु कई परिस्थितिओं में अस्पताल जाना बेहतर है और टालना नहीं चाहिए न ही देरी करनी चाहिए क्योंकि कुछ मामलों में देरी से स्थिति बिगड़ सकती है।

  • यदि ऐसे लक्षण हैं जो कोविड 19 के हो सकते हैं, तो परिवार को कोविड हेल्पलाइन से संपर्क करने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए। देर करने से इलाज कम कारगर हो सकता है। हेल्पलाइन सवालों का जवाब देगी और मार्गदर्शन करेगी कि आपको क्या करना चाहिए।
  • यदि कोई चोट लगी है या दुर्घटना हुई है, कोई और आपातकाल स्थिति है, जैसे कि हार्ट अटैक, तो अवश्य अस्पताल जाएँ। देरी न करें, संकोच न करें। हो सके तो ऐसा अस्पताल चुनें जहां सब सुविधाएं और स्पेशलिटी उपलब्ध हैं।
  • कुछ प्रोसीजर आवश्यक हैं, जैसे डायलिसिस, कीमोथेरेपी, आदि। इन के लिए निर्धारित टाइम टेबल के हिसाब से अस्पताल जाने की आवश्यकता होती है। अस्पताल के सम्बंधित विभाग के साथ संपर्क रखें। आने-जाने और ट्रीटमेंट करवाने का इन्तेजाम करें।
  • यदि कोई ऐसे महत्वपूर्ण चेकअप हैं जो सिर्फ अस्पताल में या क्लिनिक में हो सकते हैं, जिनके लिये जरूरी मशीन और उपकरण के लिए अस्पताल जाना जरूरी है, और आप सोच रहें हैं कि अस्पताल जाएँ या नहीं, तो टेलीमेडिसिन से डॉक्टर से सलाह करने से निर्णय में आसानी होगी।

यदि अस्पताल जाना हो तो क्या प्लान करें और खुद को कैसे सुरक्षित रखें? आप किस जगह हैं और वहां किस स्तर के प्रतिबन्ध लागू हैं, आपको इन सब के अनुसार प्लान करना होगा। उदाहरण के तौर पर, कितने देखभालकर्ता व्यक्ति के साथ (वाहन में, या अस्पताल में) जा सकते हैं। अनलॉक शुरू होने के बाद इन सब में पहले के मुकाबले काफी ढील है, पर फिर भी कुछ प्रतिबन्ध हैं। कैसे जाएँ यह भी चुनौती है। सभी के पास निजी वाहन नहीं हैं, या उनके ड्राइवर उपलब्ध नहीं हैं। वे अस्पताल कैसे जाएँ? क्या टैक्सी, ऑटो, सार्वजनिक परिवहन चल रहे हैं? क्या ये सुरक्षित हैं? आने-जाने के वक्त, और अस्पताल में भी कोविड 19 वायरस के संपर्क में आने का खतरा है। यह भी हो सकता है कि आपको अस्पताल जल्दी में जाना पड़े, और उस समय सब नियम और संसाधन ढूँढने का समय न हो, इसलिए पहले से क्या जानना होगा? इमरजेंसी यकायक कभी भी पैदा हो सकती । इसका पहले से नहीं पता। इन पहलूओं के लिए कुछ सुझाव नीचे देखें।

  • पहले से पहचान लें कि कौन से अस्पताल आपकी संभावित जरूरतों के लिए अधिक उपयुक्त हैं, और जिन में जाने से आपको लगता है कि ख़तरा कम है। कुछ अस्पतालों को अब कोविड अस्पताल घोषित कर दिया गया है। वे अन्य केस नहीं ले रहे। कुछ रिपोर्टों ने दावा किया कि कुछ अन्य अस्पताल भी सामान्य इमरजेंसी केस लेने से इनकार कर रहे हैं। कई अस्पताल केस लेने से पहले जिद्द कर रहे हैं कि आप हालिया टेस्ट रिपोर्ट देकर साबित करें कि व्यक्ति को कोविड नहीं है। इसलिए पहले से जानना अच्छा है कि कौन से अस्पताल सामान्य, यानि गैर कोविड आपात स्थिति के केस लेते हैं। यदि संभव हो, तो जाने से पहले अस्पताल को फ़ोन करके पुष्टि कर लें कि वे आपके प्रियजन जैसे केस ले रहे हैं या नहीं।
  • कोविड संबंधित हेल्पलाइन नंबर और गैर कोविड समस्याओं के लिए हेल्पलाइन नंबर को जानें। ये अलग-अलग हो सकते हैं। इसके अलावा, एम्बुलेंस या अस्पताल आने-जाने के लिए अन्य साधन, जैसे कि टैक्सी, भी कोविड और गैर-कोविड के लिए भिन्न हो सकते हैं। कुछ “आपातकालीन” कैब सेवाएं उपलब्ध हैं जो केवल अस्पतालों और घरों के बीच चलती हैं। एंबुलेंस और पुलिस सहायता भी संभव हैं। अस्पताल आने जाने के इन साधनों के बारे में सूचित रहें।
  • कुछ ज़ोन में , खासकर कंटेनमेंट ज़ोन में, आने-जाने के लिए अनुमति की आवश्यकता हो सकती है। यह इस पर निर्भर है कि आप किस जगह हैं और वहां इस समय कौन से प्रतिबन्ध और व्यवस्था लागू हैं। अनुमति लेने की प्रक्रियाएँ बदलती रहती हैं। इस बारे में नई सूचना प्राप्त करते रहें। नगर निगम और पुलिस आयुक्त के ट्विटर और फेसबुक अकाउंट ऐसी जानकारी के लिए विश्वसनीय स्रोत हैं। राज्य के कोविड वेबसाइट पर भी नवीनतम जानकारी मिल सकती है। इस तरह की सूचना खोज को इमरजेंसी के लिए नहीं छोड़ना चाहिए।
  • अस्पताल की तत्काल यात्रा के लिए तैयार रहें। महत्वपूर्ण मेडिकल डेटा अपने साथ तैयार रखें। इसके अलावा, आवश्यक फोन नंबर और हाथ सैनिटाइजर और मास्क जैसे सामान भी तैयार रखें।
  • एम्बुलेंस या टैक्सी या अन्य वाहन में आते जाते वक्त बीमारी न लगे, इस के लिए सावधानी बरतें। उदाहरण हैं, मास्क पहनना, हैण्ड सैनीटाइजर का इस्तेमाल, सतह पूछना, आँख/ मुंह/ नाक न छूना वगैरह। व्यक्ति के लिए भी और देखभाल कर्ता के लिए भी अस्पताल की तत्काल यात्रा के लिए तैयार रहें। महत्वपूर्ण मेडिकल डेटा और आवश्यक फोन नंबर और हाथ सैनिटाइजर और मास्क जैसे सामान ले जाना न भूलें।
  • इस बात पर विचार करें कि प्राथमिक देखभाल कर्ता अस्वस्थ हों तो डिमेंशिया वाले व्यक्ति की देखभाल कौन करेगा। इस के लिए उसे किस जानकारी और सामान की जरूरत होगी।

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इस सीरीज के अन्य भाग हैं: कोविड 19 से बचाव पर चर्चा: भाग 1: व्यक्ति को वायरस से बचाएं, देखभाल के बदलाव पर चर्चा: भाग 2: देखभाल कैसे एडजस्ट करें, और भाग 4: कारगर देखभाल और तनाव मुक्ति के लिए अन्य सुझाव, सहायता के लिए संसाधन, इत्यादि

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डिमेंशिया देखभाल और कोविड 19 (COVID19) (भाग 2) : देखभाल कैसे एडजस्ट करें

कोविड 19 महामारी से उत्पन्न स्थिति में डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति को इस वायरस से बचाना परिवार वालों के कार्यों का सिर्फ एक पहलू है (इस के लिए भाग 1 देखें)। व्यक्ति को देखभाल की जरूरत होती है, जैसे कि दैनिक कार्यों में सहायता देना, और उनको स्वस्थ और सक्षम रखने के लिए कदम उठाना, जैसे कि गतिविधियों का कारगर इस्तेमाल। पर कोविड 19 महामारी और सम्बंधित दिशानिर्देश कारण देखभाल में कुछ बदलाव की जरूरत है।

व्यक्ति की देखभाल सुचारू रूप से चलती रहे, इस के लिए अकसर परिवार वाले अपनी स्थिति के अनुसार एक व्यवस्था का इस्तेमाल करते हैं, पर कोविड 19 महामारी के कारण यह व्यवस्थाअस्त-व्यस्त हो गयी होगी। एक तरफ व्यक्ति को कोविड 19 से बचाने के लिए कई बदलाव जरूरी हैं, और ऊपर से नए एसओपी के कारण घर के सभी लोगों के आने-जाने और काम करने के तरीके बदल गए हैं। और ये बदलाव एक-दो दिन की बात नहीं। कोविड 19 से व्यक्ति को बचाना तो तब तक चलता रहेगा जब तक या तो कोविड 19 का खतरा ख़त्म हो जाए या कोई टीका उपलब्ध हो। और प्रतिबंधों के कारण और सम्बंधित सामाजिक और आर्थिक निर्णयों के कारण हुए परिवर्तन भी ख़त्म होने में समय लेंगे। हालांकि मई 30, 2020, और उसके बाद जारी दिशानिर्देशों के हर अवतार में बराबर चरणबद्ध तरीके से ढील दी जा रही है, पर साथ साथ कई मानक प्रचालन प्रक्रिया (एसओपी) भी जारी हो रहे हैं। इन्फेक्शन का ख़तरा बरकरार है।पहले जैसी स्थिति के लौटने में समय लगेगा और देखभाल के तरीकों में बदलाव आवश्यक हैं।

यह जरूरी है कि परिवार वाले कोविड 19 उत्पन्न नई परिस्थिति के अनुसार देखभाल के तरीके को ऐसे बदलें ताकि जरूरी काम ठीक चलते रहें, व्यक्ति और बाकी परिवार वालों को परेशानी न हो, और लम्बे अरसे तक अपनाने पर भी इस नई व्यवस्था से थकान और तनाव न हो|

इस पृष्ठ पर:

कोविड 19 और सम्बंधित प्रतिबन्ध और एसओपी से उत्पन्न चुनौतियाँ

लॉकडाउन के कारण तो कई बदलाव नजर आ चुके हैं, और अनलॉक के लिए कदम उठाये जाने पर भी कुछ बदलाव रहेंगे – जैसे कि मास्क का इस्तेमाल, दूरी (सोशल डिस्टेंसिंग) बनाए रखने के निर्देश,कार्यस्थलों को भी निर्देश कि वे जहां तक संभव हो, वर्क फ्रॉम होम की प्रणाली अपनाएं, कार्य/ व्यवसाय में अलग-अलग समय का पालन करें, इत्यादि। इन सब से देखभाल का मौहौल बहुत बदल गया है।
कुछ उदाहरण:

  • घर में अधिक भीड़ और चहल-पहल: लागू दिशानिर्देशों के कारण और किसी जगह पर कोविड 19 की क्या स्थिति है, इस के अनुसार बाहर निकलने पर विभिन्न प्रकार के प्रतिबन्ध और एसओपी हैं। वैसे भी लोग अब घर से ही काम या पढ़ाई कर रहे हैं और कई परिवार के सदस्य अब दिन भर घर पर ही हैं। घर से काम करने वाले फ़ोन पर जोर जोर से बात कर रहे हैं, या एक दूसरे को चुप रहने के लिए बोल रहे हैं – बिना काम वाले लोग टीवी पर लगे रहते हैं या गप्पें मारते रहते हैं। शोर और गतिविधियों का स्तर बढ़ सकता है।
  • घर में तनाव का माहौल बढ़ सकता है, और प्राइवेसी कम हो सकती है :घर का साइज़ तो उतना ही है, पर अब दिन भर उसमें ज्यादा लोग हैं, और सब का पारा आसानी से चढ़ने लगता है। आपस में बात-बेबात बहस हो सकती है। काम ज्यादा है पर काम बांटना शायद ठीक से न हो, और इस से भी परेशानी हो सकती है। कुछ हेल्पलाइन और विशेषज्ञों के अनुसार इस तरह के माहौल में घरेलू संघर्ष, हिंसा, उत्पीड़न इत्यादि की घटनाएं भी बढ़ती हैं। आर्थिक कठिनाइयाँ भी हो सकती है, जिन के कारण तनाव और भी अधिक होगा।
  • सहायकों और सेवाओं/ साधनों की कमी: पहले की व्यवस्था में जिन साधनों और सहायकों का उपयोग होता था, वे साधन और सहायक अब शायद उपलब्ध न हों। जैसे कि, कुछ घरों में विभिन्न प्रतिबन्ध और एसओपी के कारण या वाहन (बस, मेट्रो, ऑटो) न चलने के कारण काम करने वाली बाई या ड्राईवर या डिमेंशिया देखभाल के लिए रखे गए सहायक/ आया अब अन्दर नहीं आ सकते। या जिस डे केयर में व्यक्ति पहले कुछ समय के लिए जाते थे, वह अब बंद है। घर का सामान्य काम और देखभाल का काम, शायद परिवार वालों के लिए दोनों का कार्यभार बढ़ सकता है|
  • डिमेंशिया देखभाल के तरीकों में बदलाव: सहायकों की कमी, घर में अधिक काम, हल-चल और उथल-पुथल होना, इन सब का दिनचर्या पर असर हो सकता है। नियमित गतिविधियाँ बदल सकती हैं। दिन का टाइम-टेबल फर्क हो सकता है। ऊपर से दैनिक कार्यों में मदद करने वाले व्यक्ति को कोविड 19 से बचाने के लिए जो सावधानियां लेते हैं (जैसे कि फेस मास्क, बार-बार हाथ धोना, सतहों को बार-बार पोंछना), उन से भी व्यक्ति को उलझन हो सकती है।

डिमेंशिया वाले व्यक्ति के लिए आम तौर पर किसी भी नई परिस्थिति से एडजस्ट करना कठिन होता है, और इतने सारे बदलावों, डिमेंशिया वाले व्यक्ति परेशान और विचलित हो सकते हैं। उनके मूड में उतार-चढ़ाव हो सकता है। उनका व्यवहार बदल सकता है और उनकी क्षमताएं भी कम हो सकती हैं। इस सब के कारण उनकी देखभाल अधिक मुश्किल हो जाती है, ऊपर से देखभाल करने वाले का कार्यभार और तनाव वैसे भी बढ़ सकता है

एक महत्वपूर्ण चुनौती है कि ऐसे में व्यक्ति की भटकने की संभावना बढ़ जाती है। कोविड 19 और सम्बंधित भय के माहौल में भटकना विशेष रूप से खतरनाक हो सकता है। लोग किसी अजनबी के पास आने में या उसकी मदद करने में संकोच कर सकते हैं। मौजूदा प्रतिबंधों के कारण परिवारों के लिए एक बड़ी खोज का अभियान शुरू करना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि मदद करने वाले भी शायद हिचकिचाएं । कंटेनमेंट जोन हो तो और भी मुश्किल है ।भटकने वाले व्यक्ति से पुलिस अगर पूछताछ करे तो उससे भी समस्या हो सकती है, क्योंकि व्यक्ति बाहर होने का कोई स्पष्ट और वैध कारण नहीं दे सकता है। अप्रैल के मध्य (भारत) में, कार चला रहे एक वरिष्ठ को पुलिस ने रोका। जब पूछताछ की गई, तो वरिष्ठ को लॉकडाउन या ई-पास के बारे में पता नहीं था। वरिष्ठ के तौर-तरीके, अस्वीकार्य भाषा और प्रतिक्रियाओं के कारण वरिष्ठ के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। यह घटना दर्शाती है कि डिमेंशिया वाले व्यक्ति को विभिन्न प्रतिबंधों का अनुपालन करवाना बहुत चुनौतीपूर्ण है।

सच तो यह है, इतने सारे बदलावों के साथ,व्यक्ति का परेशान होना और बदले हुए व्यवहार दिखाना स्वाभाविक है। परिवारों को चिंताजनक व्यवहार कम करने की कोशिश करनी होगी। उन्हें यह ध्यान देना होगा कि घर में सीमित रहने से और घर के बदले माहौल के कारण व्यक्ति का मूड खराब न हो, बोरियत न हो, और अकेलापन न हो। ये सब डिमेंशिया वाले व्यक्ति के लिए शारीरिक या संज्ञानात्मक गिरावट का कारण बन सकते हैं। बदलाव लॉकडाउन के अलग अलग अवतारों के कारण हों या अनलॉक की ढील के अलग अलग चरणों के कारण हों, इन दिनोदिन हो रहे बदलाव के माहौल में एडजस्ट करना डिमेंशिया वाले व्यक्ति (और देखभाल करने वाले के लिए) मुश्किल हो सकता है।

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देखभाल के तरीके एडजस्ट करने के लिए कुछ सुझाव|

ऐसी स्थिति में कई स्रोतों से एकत्रित कुछ देखभाल टिप्स:

  • सबसे जरूरी है कि अब तक चली आ रही दैनिक व्यवस्था और नई परिस्थिति की सच्चाई, दोनों के आधार पर एक उपयुक्त दैनिक दिनचर्या बनाएं। एक नियमित दिनचर्या डिमेंशिया व्यक्ति की देखभाल का एक जरूरी अंग है, क्योंकि इस से व्यक्ति को आगे क्या होगा उसका पूर्वानुमान रहता है और व्यक्ति अधिक सहज महसूस करते हैं। दिनचर्या व्यावहारिक बनाएं। इस में सब जरूरी कार्य शामिल करें। इस कार्यक्रम का रोज इस्तेमाल करने से व्यक्ति को और देखभाल करने वाले को, किसी को भी तनाव या नाराजगी या थकान नहीं होनी चाहिए। दिनचर्या बदलने का काम ऐसी गति से करें जो व्यक्ति को परेशान न करे और सभी को मान्य हो
  • उपयुक्त शारीरिक और संज्ञानात्मक गतिविधियों को शामिल करें। उन चीजों की तलाश करें जो व्यक्ति का मन लगाएं और उन्हें व्यस्त रखे, उनकी बेचैनी कम करे, और उनकी मानसिक क्षमता बढ़ाए। उन गतिविधियों के बारे में सोचें जो उन्हें पहले करने में मज़ा आया था, और जो उनकी वर्तमान रुचि और क्षमता के अनुकूल हैं। ऐसे कार्यों से दूर रहें जिन से उन्हें असहजता हो या चिड़चिड़ाहट हो। खयाल रहे कि ऐसे काम ही चुनें जो देखभाल करने वाले बिना मुश्किल के कर पायें। उदाहरण के लिए, यदि देखभाल करने वालों के पास इसके लिए समय और ऊर्जा है (और यदि व्यक्ति इसे पसंद करता है) तो देखभाल करने वाले व्यक्ति को अपनी पुरानी यादों, व्यंजनों की विधि आदि का टेप करने या लिखने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। या कुछ ऑनलाइन व्यायाम प्रोग्राम का चयन करें जहां व्यक्ति वीडियो में उन लोगों के साथ “भाग” ले सकते हैं। कई अन्य उपयोगी ऑनलाइन कार्यक्रम भी हैं जैसे कि कुर्सी ताइ-ची, कुर्सी योग, कुर्सी सूर्यनमस्कार आदि जो वरिष्ठों के लिए बनाए गए हैं, और डिमेंशिया वाले व्यक्ति के लिए भी उपयुक्त हैं। ये वरिष्ठ नागरिकों के साथ काम करने वाले संगठनों या डिमेंशिया या पार्किंसंस रोग सम्बंधित संस्थाओं से मिल सकते हैं। उपयोग करने से पहले जाँच करें कि इन में दिखाए गए व्यायाम सुरक्षित और सरल हैं।
  • व्यक्तियों का मनोरंजन करने के लिए उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करें। व्यक्ति को व्यस्त रखने की और उनका मन लगाए रखने की कोशिश करें (पर उन्हें अधिक उत्तेजित न होने दें)। ऐसे तरीके खोजें जिन से देखभाल करने वालों का कार्यभार न बढ़े। उदाहरण के लिए, पुराने टीवी सीरियल जो अब दोबारा दिखाए जा रहे हैं (भारत में कुछ ऐसे टीवी शो प्रसारित किए जा रहे हैं)। या पुरानी फिल्म क्लिप और गाने, भजन आदि। देखभाल कर्ता के पास समय है तो वे व्यक्ति के साथ बैठ कर कुछ पुरानी यादों को ताजा करने वाले काम भी कर सकते हैं, पर उदास या उत्तेजित करने वाली यादों से दूर रहें । ऐसे तरीके चुनें जो व्यक्ति की पसंद के हिसाब से हैं और उन्हें खुश करती हैं पर थकाती नहीं हैं।
  • कुछ मेलजोल वाली गतिविधियों को जरूर शामिल करें। अपना घर का बाग़ न हो तो बाहर टहलना संभव नहीं (कोविड 19 से बचाव के कारण और प्रतिबंधों के कारण) । घर में मेहमान का आना भी नहीं होता। इसलिए व्यक्ति को अकेलापन महसूस हो सकता है। मूड पर भी इस का असर हो सकता है । व्यक्ति को अलगाव न महसूस हो और वे सामाजिक रूप से औरों से जुड़े रहें, इस के लिए उपलब्ध तरीकों का उपयोग करें। परिवार के लोग रिश्तेदारों और दोस्तों के साथ जुड़े रहने के लिए फेसटाइम, जूम, स्काइप, व्हाट्सएप आदि जैसे प्लेटफार्मों का उपयोग कर रहे हैं। ये डिमेंशिया वाले व्यक्तियों के लिए भी कनेक्शन रखने में मददगार हो सकते हैं। कुछ सरल, गैर-तकनीकी चीज़ें भी कारगर हो सकती हैं, जैसे कि बालकनी में बैठकर आसपास की चहल-पहल देखना।
  • व्यक्ति भटकें नहीं, इस के लिए अधिक सतर्क रहें। परिवार के सभी सदस्यों को सावधान रहना चाहिए कि वह व्यक्ति बाहर न भटके और न ही खुद को चोट पहुंचाए।
  • व्यक्ति को ज्यादा उत्तेजित न होने दें, अधिक उकसाहट से बचें। व्यक्ति को अधिक शोर से, अधिक गतिविधियों और हलचल से दूर रखें – इस तरह की अत्यधिक चहल-पहल, शोर-शराबे से उनकी उत्तेजना बढ़ सकती है। कुछ उदाहरण जिन से उन्हें बचाना अच्छा होगा: हिंसक फिल्में, टीवी पर लूप करती हुई तनाव-पूर्ण खबरें, परिवार के सदस्यों की जोरदार बातचीत। इस के लिए सभी परिवार के सदस्यों को सहयोग देना होगा क्योंकि घर में कौन कहाँ क्या कर रहा है, उस में सब को कुछ एडजस्ट करने की जरूरत हो सकती है ।
ध्यान दें कि लॉकडाउन /अनलॉक किस जगह किस तरह लागू करा जाएगा यह इस पर निर्भर है कि आप जहां हैं वहां स्थानीय प्रशासन के अनुसार कोविड की क्या स्थिति है। दिन-प्रतिदिन के काम को संभालने के लिए यह जानना जरूरी है कि किस क्षेत्र को किस प्रकार का “जोन” माना जा रहा है। इस के लिए नगरपालिका और पुलिस साइटों के माध्यम से सूचित रहें ।

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इस सीरीज के अन्य भाग: कोविड-19 से बचाव पर चर्चा: भाग 1: व्यक्ति को वायरस से बचाएं, चिकित्सीय सलाह पर चर्चा: भाग 3: दवा खरीदना, टेस्ट करवाना, टेलीमेडिसिन से सलाह लेना, अस्पताल जाना और भाग 4: कारगर देखभाल और तनाव मुक्ति के लिए अन्य सुझाव, सहायता के लिए संसाधन, इत्यादि

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डिमेंशिया देखभाल और कोविड 19 (COVID 19) (भाग 1): व्यक्ति को वायरस से बचाएं

कोविड 19 (नोवल कोरोनावायरस) एक नया संक्रमण (इनफ़ेक्शन) है जो महामारी का रूप ले चुका है – विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसे “पैनडेमिक” (वैश्विक महामारी) के रूप में पहचाना है। भारत में भी कोविड 19 के फैलाव को सीमित करने के लिए और संक्रमित लोगों को इलाज दे पाने के लिए बहुत से कदम उठाए गए हैं। इनमें शामिल हैं स्वास्थ्य संसाधनों का क्षमता निर्माण, कोविड 19 के रोगियों को जल्द पहचान पाना और अलग रखकर उनका इलाज करना। इस इनफ़ेक्शन से बचने के लिए उचित आदतें अपनानी होंगी, जैसे मास्क पहनना और एक दूसरे से दूरी रखना। गतिविधियों और आवागमन पर प्रतिबंध भी लागू करे गए हैं। इन सब से लोगों के दैनिक जीवन में अनेक बदलाव हुए हैं और चुनौतियाँ भी पैदा हो रही हैं। लोगों को जानकारी और सुझावों की जरूरत है।

कोविड 19 (नोवल कोरोनावायरस) एक नया वायरस है जिसके बारे में जानकारी अभी भी बहुत कम है। वैज्ञानिक इसे समझने के लिए, इसका फैलाव रोकने के लिए और उचित इलाज कर पाने के लिए भरपूर प्रयास कर रहे हैं। कोविड 19 के क्या लक्षण हैं, डॉक्टर के पास कब और कैसे जाना होगा, इसका इलाज क्या है, इस से कैसे बचें, इस के लिए हेल्पलाइन कौन सी हैं, यह भारत में कितना फैल रहा है, इत्यादि, इन सब विषयों पर जानकारी का सबसे विश्वसनीय स्रोत है स्वास्थ्य मंत्रालय का वेबसाइट। इस साईट पर हिंदी के डॉक्यूमेंट, पोस्टर और वीडियो के लिंक भी हैं।

अब तक उपलब्ध सभी जानकारी के अनुसार कोविड 19 वायरस बुजुर्गों के लिए ज्यादा खतरनाक है, ख़ास तौर से उन बुजुर्गों के लिए जो पहले से ही अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं, जैसे कि उच्च रक्तचाप, दमा, दिल की समस्याएं या मधुमेह। इसलिए जिन परिवारों में बुज़ुर्ग हैं, उनको बहुत सावधान रहना होगा। डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति अकसर बड़ी उम्र के होते हैं और उन्हें अन्य बीमारियाँ भी हो सकती हैं। इसलिए कोविड 19 होना उनके लिए अधिक खतरनाक है। ऊपर से, यदि किसी डिमेंशिया वाले व्यक्ति को कोविड 19 हो जाए (या उन्हें क्वारंटाइन की जरूरत हो), तो अस्पताल में रहना उनके लिए अधिक समस्या पैदा कर सकता है। उन्हें अस्पताल के माहौल से तालमेल बिठा पाने में अधिक दिक्कत होगी। उनके प्रियजन उनके साथ नहीं रह पायेंगे। व्यक्ति के आस-पास सब स्वास्थ्य कर्मचारी मास्क और PPE (personal protective equipment, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण) पहने होंगे, और उनके चेहरे भी ठीक से नजर नहीं आ रहे होंगे। कल्पना कीजिये कि पहले से ही अपने माहौल में दिक्कत महसूस करने वाले लोगों के लिए यह सब कितना डरावना होगा! वे समझ नहीं पायेंगे कि उनके चारों ओर यह सब क्यों हो रहा है, और न ही अपनी परेशानी बता पायेंगे। पूछ भी पाए तो उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिल पायेगा। वे अपनी ज़रूरतें और समस्याएं व्यक्त करने में भी दिक्कत महसूस करेंगे।

इस पोस्ट में डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति को कोविड 19 से बचाने पर फोकस है। अन्य पोस्ट में इस स्थिति के अन्य देखभाल सम्बंधित विषयों पर विस्तार होगा, जैसे कि लॉकडाउन या अन्य प्रतिबंधों की स्थिति में (या लॉकडाउन में ढील से उत्पन्न स्थिति में) देखभाल और दैनिक दिनचर्या की चुनौतियों को कैसे संभालें ( भाग 2: देखभाल कैसे एडजस्ट करें), चिकित्सकीय सलाह और सेवाएं कैसे प्राप्त करें (भाग 3: दवा खरीदना, टेस्ट करवाना, टेलीमेडिसिन से सलाह लेना, अस्पताल जाना), और डिमेंशिया देखभाल समर्थक सेवाएं कैसे प्राप्त करें और सब कार्यों में संतुलन कैसे बैठाएं इत्यादि (भाग 4: कारगर देखभाल और तनाव मुक्ति के लिए अन्य सुझाव, सहायता के लिए संसाधन, इत्यादि । हालांकि यह पोस्ट डिमेंशिया वाले परिवारों पर केन्द्रित है, यह किसी भी ऐसे परिवार के लिए मददगार है जिस में बुज़ुर्ग हैं। (नोट: इस पृष्ठ पर या इस वेबसाइट के किसी भी अन्य पृष्ठ पर सिर्फ देखभाल संबंधी चर्चा और संसाधन हैं – इन पर कोई चिकित्सा सलाह नहीं है)

एक चेतावनी: हर अनलॉक के साथ कोविड संबंधी प्रतिबन्ध कम होते जा रहे हैं। लोग घर से बाहर अधिक कामों के लिए और अधिक समय के लिए निकल रहे हैं। घरों में काम करने वाले और मेहमान भी अधिक आ रहे हैं। कोविड का फैलाव काफी ज्यादा है, और कई लोग, जिन्हें कोविड है, उनमें लक्षण नजर नहीं आते हैं। इस सब को देखते हुए स्पष्ट है कि इन्फेक्शन होने का खतरा अब अधिक है। डिमेंशिया वाले व्यक्ति को कोविड से बचाए रखने के कदम में बिलकुल भी ढील नहीं होनी चाहिए , बल्कि पहले से अधिक सतर्क रहने की जरूरत है।

इस पृष्ठ पर:

कोविड 19 पर विश्वसनीय जानकारी और बचाव के लिए आधिकारिक स्रोत.

कोविड 19 क्या है, और इस से बचाव के तरीकों को समझने के लिए सबसे अच्छा और विश्वसनीय स्रोत हैं स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय का वेबसाइट Opens in new window। इस पर अनेक हिंदी संसाधन भी हैं। पेश हैं कुछ ख़ास तौर से उपयोगी संसाधन के लिंक,आपकी सुविधा के लिए।

बुजुर्गों के लिए कोविड 19 अधिक खतरनाक है। इसे पहचानते हुए, भारत सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग ने एक दस्तावेज़ जारी किया है: कोविड 19 (COVID 19) के दौरान वरिष्ठ नागरिकों के लिए सलाह Opens in new window। अन्य बातों के अलावा, इस में यह सलाह दी गयी है कि वरिष्ठ नागरिकों को घर के भीतर ही रहना चाहिए, आगंतुकों से बचना चाहिए, स्वच्छता बनाए रखने वाली आदतें अपनानी चाहिए, और अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। यह भी सलाह है कि उनकी देखरेख करने वाले व्यक्तियों को मदद करने से पहले हाथ धोना चाहिए, देखभाल के काम करते समय नाक-मुंह ढके रहना चाहिए, और जिन सतहों का अकसर उपयोग होता है, उन्हें साफ़ करते रहना चाहिए। वरिष्ठ नागरिकों के उचित पोषण और पानी का सेवन सुनिश्चित करना चाहिए। यह डॉक्यूमेंट इस बात पर भी जोर देता है कि देखभाल करने वाले किसी भी लक्षण से पीड़ित हों तो उन्हें वरिष्ठ व्यक्ति के पास नहीं जाना चाहिए। पूरा डॉक्यूमेंट देखें Opens in new window

एक अन्य पहलू है प्रतिरक्षक क्षमता (इम्युनिटी) को मजबूत करना, ताकि कोविड 19 होनी की संभावना कम हो। प्रतिरक्षा में सुधार करने के लिए आयुष मंत्रालय के सुझावों को यहाँ पढ़ें Opens in new window। उनके यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध अनेक वीडियो देखें: Opens in new window

कोई भी प्रश्न हो या लगे की शायद आपको या किसी प्रियजन को कोविड जैसे कुछ लक्षण हैं, तो बिना देर करे नि:संकोच राष्ट्रीय हेल्पलाइन: 91-11-2397 8046 या टोल फ्री नंबर: 1075 डायल करें। इ-मेल संपर्क है: ncov2019@gov.in, और ncov2019@gmail.com या अपने राज्य की हेल्पलाइन पर संपर्क करें। सभी राज्यों की हेल्पलाइन की सूची यहाँ देखें Opens in new window

सबसे नवीनतम लॉकडाउन/ अनलॉक दिशानिर्देश Opens in new window में स्पष्ट रूप से यह सलाह दी गयी है कि वरिष्ठ नागरिक घर पर रहें, और आवश्यकता होने पर ही घर से निकलें। निर्देश से एक अंश: “65 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों, अन्य रोगों से ग्रस्त व्यक्तियों, गर्भवती महिलाओं और 10 वर्ष की आयु के बच्चों को, आवश्यक सेवाओं और स्वास्थ्य प्रयोजनों को छोड़ कर, घर पर रहने की सलाह दी जाती है।”

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डिमेंशिया वाले व्यक्तियों को कोविड 19 से बचाने की ख़ास चुनौतियों पर चर्चा

कोविड 19 से डिमेंशिया वाले व्यक्तियों की रक्षा करने में कुछ अतिरिक्त चुनौतियाँ हैं:

  • व्यक्ति को कोविड 19 के बारे में समझना अधिक मुश्किल है: कोविड 19 एक नया संक्रमण (यानि कि इन्फेक्शन) है, अन्य संक्रमणों से अधिक खतरनाक, और इस में अधिक सावधानी की जरूरत है। डिमेंशिया वाले व्यक्ति शायद इसे समझ न पायें या जानकारी याद न रख पायें। वे आस-पास के परिवर्तनों से विचलित या परेशान हो सकते हैं। कोविड 19 की जरूरी जानकारी को सरल तरीके से, बार-बार दोहराने की जरूरत हो सकती है। इसके लिए चित्रों / कार्टूनों के इस्तेमाल के बारे में सोचें। या शायद मोटे तौर पर सिर्फ इतना कहना पर्याप्त हो सकता है कि यह एक ऐसी समस्या है जिसके लिए कुछ अधिक सावधानियों की आवश्यकता है। ध्यान रखें, जानकारी से उन्हें टेंशन नहीं होना चाहिए। आप स्वास्थ्य मंत्रालय के वेबसाइट पर उपलब्ध साधनों में से कुछ ऐसे सरल लेख और चित्र चुन सकते हैं जो व्यक्ति के लिए उपयुक्त हैं। ऊपर दिए गए साधन देखें।
  • देखभाल करने के तरीकों में बदलाव स्वीकारने में दिक्कत – जैसे कि देखभाल कर्ता का मास्क पहनना, बार-बार हाथ धोना, सतह साफ़ करना इत्यादि : व्यक्ति को कोविड 19 से बचाने के लिए पास जाने पर देखभाल कर्ता को मास्क पहनना होगा। ख़ास तौर से दैनिक कार्यों में मदद करते समय – जैसे कि व्यक्ति को नहलाना, खाना खिलाना, इत्यादि। परन्तु मास्क पहनने के कारण देखभाल कर्ता का चेहरा अलग लगता है और शायद पहचाना न जाए, मुस्कराहट और अन्य भाव दिखाई नहीं देते हैं, और मास्क की बाधा के कारण बोली भी अस्पष्ट हों सकती है। इस तरह से ढके चेहरे वाले देखभाल कर्ता के साथ डिमेंशिया वाले व्यक्ति सहज हो पायें, इस के लिए क्या करना होगा, यह एक विषय है जिस पर देखभाल करने वाले अभी भी रचनात्मक समाधान की तलाश में हैं। कुछ सुझाव हैं कि व्यक्ति को बार-बार आश्वस्त करने और तालमेल बिठाए रखने पर अधिक ध्यान देना होगा। कार्य पूरा करने के लिए जल्द-बाज़ी न करें। सब्र रखें और जब-तब जरूरी हो, व्यक्ति को याद दिलाएं कि आप कौन हैं, और अगर वे पूछें तो बताएं कि यह मास्क उन की सुरक्षा के लिए है।
  • पूरे वक्त घर में रहने वाले डिमेंशिया व्यक्ति को कौन सी (और किस हद तक) नई स्वच्छता सम्बंधित आदतों को अपनाना होगा, इस पर विचार करें। : मास्क पहनना, बार-बार हाथ धोना, सतह साफ़ करना, क्या यह सब उन डिमेंशिया वाले व्यक्ति को भी करना होगा जो सिर्फ घर पर ही हैं? क्या वे यह सब समझेंगे और कर पायेंगे? या क्या बाकी परिवार वाले अधिक सतर्क रहें और पूरी सावधानी बरतें तो व्यक्ति को कोविड 19 से बचाने के लिए पर्याप्त होगा? इस विषय पर विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है। कई लोगों को लगता है कि घर में सभी लोग अगर सब सावधानियों का पालन करें तो डिमेंशिया वाले व्यक्ति को अतिरिक्त सावधानी की आवश्यकता नहीं है। वैसे भी, डिमेंशिया वाले व्यक्ति मास्क पहनने के लिए शायद ही सहमत हों – क्योंकि यह एक नई बात है और असुविधाजनक भी। कई परिवारों का अनुभव है कि मास्क पहनने पर जोर देने से व्यक्ति उत्तेजित हो जाते हैं। वे बार-बार हाथ धोने से मना कर सकते हैं। इन दिक्कतों को नजर में रखते हुए उतनी ही कोशिश करें जितनी कारगर बचाव के लिए आवश्यक हो और जो व्यक्ति बिना उत्तेजित या परेशान हुए कर पायें। यह जरूर निश्चित करें कि सब परिवार वाले और अन्य घर में आने वाले दूसरे लोग पूरी सावधानी रख रहे हैं।
  • यदि व्यक्ति का घर से बाहर निकलना बहुत जरूरी हो, तो बहुत ही ध्यान रखना होगा। कुछ ऐसी परिस्थितियां हैं जहां डिमेंशिया वाले व्यक्ति को घर के बाहर जाना होगा। हाल में लागू दिशानिर्देशों में यह सलाह दी गयी है कि घर से बाहर तभी निकलें जब कोई जरूरी काम हो, या स्वास्थ्य के लिए निकलना जरूरी हो। फिलहाल लोगों से मिलने के लिए बाहर जाने को उचित नहीं माना जा रहा है। डिमेंशिया वाले व्यक्ति कोविड 19 से अधिक खतरे में हैं, और उनके लिए सावधानी बनाए रखना भी ज्यादा मुश्किल है। इसलिए उनका निकलना कम से कम रहे तो बेहतर है। पर यदि उन्हें बाहर निकलना है, तो बहुत ही सावधान रहना होगा। उनके साथ जा रहे लोगों को पूरे वक्त सतर्क रहना होगा। मास्क ठीक तरह से व्यक्ति के चेहरे पर बना रहे, व्यक्ति बेकार इधर उधर चीज़ें न छूएं, बार-बार उनके हाथों को सैनिटाइज़र से साफ़ करा जाए, इत्यादि। बाहर के माहौल से वे घबरा सकते हैं और उन्हें आश्वस्त करते रहना भी जरूरी होगा।

भारत में लॉकडाउन का सिलसिला मार्च 2020 में शुरू हुआ था इसके अंतर्गत जो प्रतिबन्ध लागू करे गए हैं, वे समय के साथ बदलते जा रहे हैं। शुरू में लॉकडाउन बहुत सख्त था, पर अब ढील दी जा रही है। खास तौर से उन इलाकों में ढील है जहां कोविड 19 संबंधी स्थिति अधिक नियंत्रण में है, जैसे कि कई दिनों से कोई नया केस न नज़र आना। मई 30 के दिशानिर्देश में चरणबद्ध तरीके से गतिविधियोँ को फिर से शुरू करने के लिए अनलॉक निर्देश जारी करे गए थे, और तब से जारी विभिन्न अनलॉक संबंधी निर्देश चरणबद्ध तरह से प्रतिबन्ध ढीले कर रहे हैं। परन्तु यह समझना बहुत जरूरी है कि कोविड 19 होने का खतरा अब भी मौजूद है। कोविड के केस की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। । बुजुर्गों और डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्तिओं को कोरोनावायरस से बचाव के तरीके अपनाना अब भी उतना ही जरूरी है। लॉकडाउन में ढील का मतलब यह नहीं कि अब सावधानी की जरूरत नहीं हैं। बल्कि जैसे जैसे प्रतिबन्ध कम हो रहे हैं और लोग अधिक मिल जुल रहे हैं और काम और अन्य कारणों से बाहर जा रहे हैं, लोग कम सावधान होने लगते हैं। इस से इन्फेक्शन का खतरा बढ़ता है। इसलिए यह न सोचें कि अब रिश्तेदारों, बेटा-बेटी, पोता-पोती, नाता-नाती और मेहमानों के आने जाने का सिलसिला बेझिझक लग सकता है। कृपया अपने सावधानी का स्तर बनाए रखें।

कुल मिलाकर यूं मानिए, डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति को कोविड 19 से बचाए रखना और उनकी उचित देखभाल भी करते रहना एक चुनौती है। अनेक परिवर्तनों की जरूरत है। इन सब बदलाव से व्यक्ति परेशान और उत्तेजित या मायूस न हों, इसके लिए भी कदम उठाने होंगे। दुनिया भर के डिमेंशिया परिवार इस समस्या का सामना कर रहे हैं। वे यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि उनकी स्थिति में क्या कारगर है, और क्या नहीं। अन्य परिवारों के अनुभव जानने के लिए कई फ़ोरम हैं, पर ऑनलाइन फोरम अंग्रेज़ी में हैं। हो सकता है आप किसी स्थानीय फोरम या संसाधन या सेवा से संपर्क कर पायें जो आपकी कुछ सहायता करें। सहायता के लिए सिर्फ डिमेंशिया संसाधन तक सीमित न रहें। वरिष्ठ नागरिकों की या मानसिक तनाव की हेल्पलाइन से भी शायद कुछ मदद मिले।

नोट: यदि डिमेंशिया व्यक्ति अकेले रहते हैं तो उनके लिए यह सब समझना और संभालना बहुत ही पेचीदा है। बेहतर यही होगा कि वे किसी रिश्तेदार के घर में रहें, ताकि वे कोविड 19 से बचे रहें, और साथ ही सम्बंधित प्रतिबंधों का अनुपालन भी कर पायें।

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इस सीरीज के अन्य भाग पढ़ें: देखभाल के बदलाव पर चर्चा – भाग 2: देखभाल कैसे एडजस्ट करें, चिकित्सीय सलाह पर चर्चा – भाग 3: दवा खरीदना, टेस्ट करवाना, टेलीमेडिसिन से सलाह लेना, अस्पताल जाना, और भाग 4: कारगर देखभाल और तनाव मुक्ति के लिए अन्य सुझाव, सहायता के लिए संसाधन, इत्यादि

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स्ट्रोक (आघात) और डिमेंशिया (मनोभ्रंश) (Stroke and Dementia)

स्ट्रोक (आघात, पक्षाघात, सदमा, stroke) एक गंभीर रोग है। हम कई बार देखते और सुनते हैं कि किसी को स्ट्रोक हुआ है। इस के बाद कुछ लोग फिर से अच्छे हो पाते हैं, पर अन्य लोगों में पूरी तरह शारीरिक और मानसिक क्षमताएं ठीक नहीं हो पातीं।शायद हम यह भी जानते हैं कि करीब 25%[1] केस में स्ट्रोक जानलेवा सिद्ध होता है। पर स्ट्रोक क्या है, किन बातों से इस के होने का खतरा है, इस से कैसे बचें, इन सब पर जानकारी इतनी व्याप्त नहीं है। अधिकाँश लोग यह भी नहीं जानते कि स्ट्रोक होने के कुछ ही महीनों में कुछ व्यक्तियों को स्ट्रोक-सम्बंधित डिमेंशिया (मनोभ्रंश, dementia) भी हो सकता है।

इस पोस्ट में:.

स्ट्रोक क्या है, क्यों होता है, और इस के लक्षण क्या हैं।

मस्तिष्क के ठीक काम करने के लिए यह जरूरी है कि मस्तिष्क में खून की सप्लाई ठीक रहे। इस काम के लिए हमारे मस्तिष्क में रक्त वाहिकाओं (खून की नलिकाएं, blood vessels) का एक जाल (नेटवर्क) है, जिसे वैस्कुलर सिस्टम कहते है। ये रक्त वाहिकाएं मस्तिष्क के हर भाग में आक्सीजन और जरूरी पदार्थ पहुंचाती हैं।

स्ट्रोक में इस रक्त प्रवाह में रुकावट होती है. इस के दो मुख्य कारण हैं।

  • अरक्तक आघात, इस्कीमिया (ischemia): रक्त का थक्का (clot) रक्त वाहिका को बंद कर सकता है। अधिकाँश स्ट्रोक के केस इस प्रकार के होते हैं।[1]
  • रक्तस्रावी आघात (हेमरेज, haemorrhage) : रक्त वाहिका फट सकती है।

खून सप्लाई में कमी के कुछ कारण का यह चित्रण देखें।

इस रुकावट के कारण हुई हानि इस पर निर्भर है कि मस्तिष्क के किस भाग में और कितनी देर तक रक्त ठीक से नहीं पहुँच पाया। यदि कुछ मिनट तक रक्त नहीं पहुँचता, तो प्रभावित भाग में मस्तिष्क के सेल मर सकते हैं। इस को इनफार्क्ट या रोधगलितांश कहते हैं।

स्ट्रोक के लक्षण अकसर अचानक ही, या कुछ ही घंटों के अन्दर-अन्दर पेश होते हैं।

  • एक तरफ के चेहरे और हाथ-पैर का सुन्न होना/ उनमें कमजोरी, चेहरे के भाव पर, और अंगों पर नियंत्रण नहीं रहना।
  • बोली अस्पष्ट होना, बोल न पाना, दूसरों को समझ न पाना।
  • एक या दोनों आँखों से देखने में दिक्कत।
  • चक्कर आना, शरीर का संतुलन बिगड़ना, चल-फिर न पाना।
  • बिना किसी स्पष्ट कारण के तीव्र सर-दर्द होना।

अफ़सोस, कई बार व्यक्ति और आस पास के लोग स्ट्रोक को पहचान नहीं पाते, या पहचानने में और डॉक्टर के पास जाने में देर कर देते हैं, जिस से हानि अधिक होती है।

एक खास स्थिति है “मिनी-स्ट्रोक” (mini stroke, अल्प आघात)। इस में लक्षण कुछ ही देर रहते हैं, क्योंकि रक्त सप्लाई में रुकावट खुद दूर हो जाती है। इस मिनी-स्ट्रोक का असर तीस मिनट से लेकर चौबीस घंटे तक रहता है। इसे ट्रांसिएंट इस्कीमिक अटैक्स (transient ischemic attack, TIA) या अस्थायी स्थानिक अरक्तता भी कहते हैं। व्यक्ति को कुछ देर कुछ अजीब-अजीब लगता है, पर वे यह नहीं जान पाते कि यह कोई गंभीर समस्या है। कुछ व्यक्तियों में ऐसे मिनी स्ट्रोक बार बार होते हैं, पर पहचाने नहीं जाते। कुछ केस में ऐसे मिनी स्ट्रोक के थोड़ी ही देर बाद व्यक्ति को बड़ा और गंभीर स्ट्रोक हो सकता है।

नोट: कुछ लोग स्ट्रोक और दिल के दौरे में कन्फ्यूज होते हैं। स्ट्रोक और दिल का दौरा, दोनों ही रक्त के प्रवाह से संबंधी रोग हैं (हृदवाहिनी रोग, cardiovascular disease)। पर स्ट्रोक में इस नाड़ी संबंधी समस्या का असर दिमाग पर होता है, हृदय पर नहीं। यूं कहिये, स्ट्रोक को हम एक मस्तिष्क का दौरा मान सकते हैं।

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स्ट्रोक में तुरंत इलाज बहुत जरूरी है।

इलाज में जितनी देर करें, व्यक्ति की स्थिति उतनी ही बिगड़ती जायेगी। जान भी जा सकती है। इसलिए स्ट्रोक का शक होते ही जल्द से जल्द व्यक्ति को अस्पताल ले जाएं। डॉक्टर शायद व्यक्ति की जान बचा पायें। सही समय पर इलाज करने से शायद डॉक्टर स्ट्रोक के बाद होने वाली दिक्कतों को भी कम कर पायें। दुबारा स्ट्रोक न हो, इस के लिए सलाह भी मिलेगी।

स्ट्रोक के बाद उचित कदम उठाने से कुछ व्यक्ति तो ठीक हो पाते हैं, पर अन्य व्यक्तियों में कुछ समस्याएँ बनी रहती हैं। उनकी रिकवरी पूरी नहीं होती। स्ट्रोक-पीड़ित कई व्यक्ति बाद में भी कुछ हद तक दूसरों पर निर्भर रहते हैं। उन्हें डिप्रेशन (अवसाद) भी हो सकता है, जिस के कारण वे भविष्य के स्ट्रोक से बचने के लिए कदम उठाने में भी दिक्कत महसूस करते हैं।

एक अन्य आम समस्या है मस्तिष्क की क्षमताओं पर असर। यदि व्यक्ति को बार बार स्ट्रोक (या मिनी-स्ट्रोक) हो, तो क्षमताओं में हानि ज्यादा हो सकती है। व्यक्ति की मानसिक काबिलियत कम हो जाती है। व्यक्ति को डिमेंशिया हो सकता है।

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स्ट्रोक और डिमेंशिया (मनोभ्रंश)।

संवहनी डिमेंशिया (वैस्कुलर डिमेंशिया, Vascular dementia) एक प्रमुख प्रकार का डिमेंशिया है। यह आक्सीजन की कमी की वजह से मस्तिष्क के सेल मरने से हो सकता है। इस का एक कारण है बार बार स्ट्रोक या मिनी-स्ट्रोक होना। इस प्रकार के संवहनी डिमेंशिया को स्ट्रोक से सम्बंधित डिमेंशिया के नाम से भी जाना जाता है।

अल्ज़ाइमर सोसाइटी UK की “What is vascular dementia?” [2] पत्रिका के अनुसार स्ट्रोक होने के बाद तकरीबन 20% व्यक्तियों में छह महीने में स्ट्रोक से सम्बंधित डिमेंशिया हो सकता है। एक बार स्ट्रोक हो, तो फिर से स्ट्रोक की संभावना बढ़ जाती है, इस लिए डिमेंशिया का खतरा भी बढ़ जाता है।

संवहनी डिमेंशिया पर विस्तृत हिंदी लेख के लिए देखें [3]

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स्ट्रोक से बचने के उपाय।

स्ट्रोक होने के बाद व्यक्ति को दुबारा स्ट्रोक होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है। कुछ स्टडीज़ के अनुसार, इलाज न करें तो अगले पांच साल में फिर स्ट्रोक होने की संभावना 25% है। दस साल में स्ट्रोक होने की संभावना 40% है। इसलिए स्ट्रोक के बाद आगे स्ट्रोक न हो, इस के लिए खास ध्यान रखना होता है। [4]

स्ट्रोक की संभावना कम करने के लिए उपयुक्त दवा लें और उचित जीवन-शैली के बदलाव अपनाएं। उच्च रक्त-चाप (हाइपरटेंशन, हाई बी पी) और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखें। डायबिटीज से बचें, या उस पर नियंत्रण रखें। जीवन-शैली बदलाव करें। उदाहरण हैं: सही और पौष्टिक खाना, वजन नियंत्रित रखना, शारीरिक रूप से सक्रिय रहना (व्यायाम इत्यादि), तम्बाकू सेवन और धूम्रपान बंद करना, तनाव कम करना, और मद्यपान कम करना। डॉक्टर से बात करें, ताकि आपको सही सलाह मिले।

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स्ट्रोक कितना व्याप्त और गंभीर है, उस पर कुछ तथ्य/ आंकड़े।

  • स्ट्रोक एक बहुत आम समस्या है। यह माना जाता है कि हर चार व्यक्तियों में से एक को अपने जीवन-काल में स्ट्रोक होगा।[5]
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्ट्रोक साठ साल और ऊपर की उम्र के लोगों की मृत्यु के कारणों में दूसरे स्थान पर है।
  • कम उम्र में भी स्ट्रोक का खतरा काफी ज्यादा है। 15 से 59 उम्र वर्ग में मृत्यु के कारणों में स्ट्रोक पांचवे स्थान पर है। [6]
  • अफ़सोस, भारत में स्ट्रोक का खतरा अन्य कई देशों से ज्यादा है क्योंकि यहाँ के लोगों में हाईपरटेंशन और अन्य रिस्क फैक्टर की संभावना ज्यादा है। ऊपर से यह भी अनुमान है कि भारत में स्ट्रोक का खतरा समय के साथ बढ़ रहा है। [7]
  • विश्व भर में स्ट्रोक डिसेबिलिटी का एक मुख्य कारण है, और डिसेबिलिटी के कारणों  मेंतीसरे स्थान पर है। [8]

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हम क्या कर सकते हैं।

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सबसे पहले तो हमें पहचानना होगा कि स्ट्रोक एक आम समस्या हैं, और इसके नतीजे भी बहुत गंभीर हैं। 60% लोग स्ट्रोक से या तो बच नहीं पाते, या बचते भी हैं तो उन की शारीरिक या मानसिक क्षमताएं ठीक नहीं हो पातीं। वे दूसरों पर निर्भर हो सकते हैं। उन्हें डिमेंशिया भी हो सकता है।

हम सब स्ट्रोक और अन्य नाड़ी संबंधी बीमारियों से बचने के लिए अपने जीवन में कई कदम उठा सकते हैं। अपने और अपने प्रियजनों के स्वास्थ्य का ख़याल रखें तो स्ट्रोक और सम्बंधित समस्याओं की संभावना कम होगी। यह मंत्र याद रखें: हृदय स्वास्थ्य के लिए जो कदम उपयोगी है, वे रक्त वाहिका की समस्याओं से बचने के लिए भी उपयोगी हैं।

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नोट्स: अधिक जानकारी के लिए लिंक।

संवहनी डिमेंशिया पर विस्तृत हिंदी लेख देखें: संवहनी डिमेंशिया (वैस्कुलर डिमेंशिया, Vascular dementia): एक परिचय

स्ट्रोक और सम्बंधित विषयों के लिए कुछ उपयोगी शब्दावली:

  • मिनी-स्ट्रोक और उस में पाए डिमेंशिया से संबंधित कुछ शब्द हैं मिनी-स्ट्रोक, ट्रांसिऐंट इस्कीमिक अटैक्स (transient ischemic attack, TIA) या अस्थायी स्थानिक अरक्तता।
  • मस्तिष्क में हुई हानि के लिए कुछ उपयोगी शब्द हैं इनफार्क्ट (रोधगलितांश, infarct).
  • बार-बार के मिनी-स्ट्रोक से संबंधित डिमेंशिया के लिए कुछ शब्द हैं मल्टी- इनफार्क्ट डिमेंशिया (multi-infarct dementia), बहु-रोधगलितांश डिमेंशिया।
  • संवहनी डिमेंशिया के लिए कुछ शब्द/ वर्तनी हैं वास्कुलर डिमेंशिया, वैस्क्युलर डिमेंशिया, नाड़ी-संबंधी डिमेंशिया, संवहनी मनोभ्रंश, Vascular dementia.

डिमेंशिया का कुछ अन्य रोगों से भी सम्बन्ध है। इन रोगों पर हिंदी में विस्तृत पृष्ठ देखें।

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फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया (Frontotemporal Dementia, FTD): एक परिचय

फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया (मनोभ्रंश) एक प्रमुख प्रकार का डिमेंशिया है। यह अन्य प्रकार के डिमेंशिया से कई महत्त्वपूर्ण बातों में फर्क है और इसलिए अकसर पहचाना नहीं जाता। देखभाल में भी ज्यादा कठिनाइयाँ होती हैं। इस पृष्ठ पर उपलब्ध सेक्शन:

फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया क्या है (What is Frontotemporal Dementia) (FTD)।

  • फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया (Fronto-Temporal Dementia, FTD) चार प्रमुख प्रकार के डिमेंशिया (मनोभ्रंश) में से एक है*1
    • इस डिमेंशिया में हुई मस्तिष्क की हानि को दवाई से पलटा नहीं जा सकता। यह इर्रिवर्सिबल (irreversible) है। व्यक्ति का मस्तिष्क फिर से सामान्य नहीं हो सकता।
    • मस्तिष्क की हानि समय के साथ बढ़ती जाती है। यह एक प्रगतिशील डिमेंशिया (प्रगामी डिमेंशिया, progressive dementia)माना जाता है।
    • अंतिम चरण में फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया वाले व्यक्ति सब कामों के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं।
  • यह डिमेंशिया अन्य प्रकार के डिमेंशिया से कई महत्त्वपूर्ण बातों में फर्क है।
  • सभी डिमेंशिया में मस्तिष्क में किसी भाग में क्षति होती है, जिस के कारण लक्षण पैदा होते हैं। फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया में यह क्षति मस्तिष्क के दो खंडों में होती है। ये हैं:
    • ललाटखंड (अग्र खंड, फ्रंटल लोब, frontal lobe), और
    • शंख खंड (कर्णपट खंड, टेम्पोरल लोब, temporal lobe)।
  • प्रभावित खंडों में कुछ असामान्य प्रोटीन इकट्ठा होने लगते हैं, कोशिकाएं मरने लगती हैं, जरूरी रसायन ठीक से नहीं बन पाते, और लोब सिकुड़ने लगते हैं।
  • इस हानि के कारण व्यक्ति को उन लोब के काम से संबंधित लक्षण होने लगते हैं।

FTD brain lobes
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फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया के लक्षण (Symptoms of Frontotemporal Dementia)।

  • शुरू के आम लक्षण हैं व्यक्तित्व और व्यवहार में बदलाव, और भाषा संबंधी समस्याएँ। याददाश्त अकसर ठीक रहती है।
    • व्यक्ति में कौन से लक्षण होंगे यह इस पर निर्भर है कि फ्रंटल और टेम्पोरल लोब में कहाँ-कहाँ और कितनी क्षति हुई है।
  • व्यक्तित्व/ व्यवहार संबंधित लक्षणों के उदाहरण:
    • व्यक्ति का मेल-जोल कम हो जाना, व्यक्ति का अपने में ही सिमट जाना।
    • दूसरों की भावनाओं की परवाह न करना, सहानुभूति न दिखा पाना।
    • परेशान/ बेचैन रहना, व्यवहार या बात दोहराना, चीजें छुपाना, शक्की होना, उत्तेजित होना, चिल्लाना, आक्रामक होना (दूसरों को मारना)।
    • रात में अधिक विचलित होना और सो न पाना।
    • कुछ तरह की चीजों को खाने की खास इच्छा, जैसे कि मिठाई या तली हुई चीजें।
    • अनुचित , अशिष्ट, अश्लील व्यवहार, समाज में ऐसा व्यवहार करना जो खराब समझा जाता है।
    • ध्यान न लगा पाना, निर्णय लेने में दिक्कत, पैसे का मूल्य समझने में दिक्कत, सोच-विचार न कर पाना।
  • भाषा संबंधित लक्षणों के उदाहरण:
    • सामान्य, रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाले शब्दों का अर्थ पूछना, सही शब्द न सूझना और शब्द इस्तेमाल करने के बजाय उस का वर्णन करना।
    • परिचित लोगों या वस्तुओं को पहचानने में दिक्कत।
    • शब्द समझ पाना पर वाक्य न समझ पाना, खास तौर से लंबे, उलझे हुए वाक्य।
    • धीरे-धीरे, झिझक कर बोलना, शब्द उच्चारण में दिक्कत और गलतियाँ, हकलाना, वाक्यों में से छोटे शब्दों को छोड़ देना या व्याकरण में गलती होना।
  • FTD अन्य रोगों के साथ भी पाया जा सकता है।  व्यक्ति को ऐसे अन्य  विकार हो सकते हैं जिन से चलने में दिक्कतें भी होने लगती है। गति धीमी हो सकती है, संतुलन में दिक्कत हो सकती है, निगलने में भी दिक्कत होने लगती है, और पार्किन्सन जैसे कुछ लक्षण हो सकते हैं।

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फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया वर्ग में शामिल रोग (Various Medical conditions of Frontotemporal dementia)।

  • फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया किसी एक विशिष्ट रोग का नाम नहीं है। इस में अनेक रोग शामिल हैं जो मस्तिष्क के फ्रंटल और टेम्पोरल लोब की हानि से संबंधित हैं।
    • इन रोगों में से सबसे पहले पिक रोग (Pick’s Disease) की पहचान हुई थी। कई लोग अब भी फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया को पिक रोग के नाम से ही बुलाते हैं।  इस के अन्य भी कई नाम हैं (नीचे नोट्स देखें)।
    • अब भी इस पर नई जानकारी प्राप्त हो रही है, और फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया के नए प्रकार पहचाने जा रहे हैं।
    • इस श्रेणी के रोगों का वर्गीकरण विशेषज्ञ अलग-अलग तरह से करते हैं।

मोटे तौर पर, फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया के प्रकार हैं:

  • व्यवहार-संबंधी रूप (Behavioural variant Fronto-Temporal Dementia, BvFTD)
    • इस में व्यक्तित्व या व्यवहार में बदलाव नज़र आते हैं। उदाहरण: व्यक्ति मिलना जुलना बंद कर सकते हैं, अपने आप में सिमट सकते हैं। या औरों के प्रति निरादर या लापरवाही दिखा सकते हैं। अनुचित व्यवहार कर सकते हैं, आक्रामक हो सकते हैं, या उन्माद दिखा सकते हैं।
  • भाषा संबंधी रूप (Language variants of frontotemporal dementia), इस में शामिल हैं:
    • अर्थ -संबंधी डिमेंशिया (सिमैंटिक डिमेंशिया , semantic dementia): बोल सकते हैं, पर शब्द का अर्थ नहीं समझते,बोलते हुए अजीब अजीब शब्दों का प्रयोग करते हैं—उनकी बात का अर्थ नहीं निकलता।
    • प्रगतिशील गैर-धाराप्रवाह वाचाघात (progressive non-fluent aphasia): बोलने में दिक्कत होती है, और वे धीरे धीरे और बहुत कठिनाई से बोलते हैं।
  • अन्य रूप, खास रूप, मिश्रित रूप।
    • FTD अन्य रोगों के साथ भी हो सकता है। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार करीब 10 से 20% FTD केस में साथ साथ मोटर न्यूरान संबंधित हानि भी होती है (overlapping motor disorders), जिस से संतुलन में और हिलने/ डुलने/ चलने में समस्या होती है, और पार्किंसन किस्म के लक्षण भी हो सकते हैं।
    • कुछ उदाहरण: मोटर न्यूरान रोग (motor neurone disease), प्रगतिशील सुप्रान्यूक्लियर अंगघात (progressive supranuclear palsy), कोर्टिको-बैसल अपह्रास (corticobasal degeneration)।

फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया : कुछ महत्वपूर्ण तथ्य (Some important facts about Fronto Temporal Dementia)।

फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया होने की संभावना के संबंध में अब तक उपलब्ध जानकारी:

age profile of FTD
genetics image
  • आयु। हालांकि यह सभी उम्र के लोगों में पाया जा सकता है , पर इसके अधिकांश केस कम उम्र के लोगों में देखे जाते हैं (40 से  65 आयु वर्ग में)
    • ध्यान दें, अल्ज़ाइमर रोग की संभावना उम्र के साथ बढ़ती है और अल्ज़ाइमर के अधिकांश केस 65 और उस से अधिक  आयु वर्ग में होते हैं।
    • 65 से कम आयु के लोगों में देखे जाने वाले डिमेंशिया केस में यह एक महत्व-पूर्ण डिमेंशिया है।
  • रिस्क फैक्टर (risk factor):  फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया के कारक स्पष्ट रूप से मालूम नहीं । यह माना जाता है कि यह आनुवांशिकी, स्वास्थ्य-समस्या संबंधी, और जीवन-शैली संबंधी कारणों का मिश्रण हैं।
    • अभी तक सिर्फ एक रिस्क फैक्टर पहचाना गया है: फैमिली हिस्ट्री (family history)–माँ-बाप, भाई-बहन, अन्य पीढ़ियों में अन्य करीबी रिश्तेदार को फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया या अन्य ऐसे किसी रोग का होना (fronto-temporal dementia or other neuro-degenerative diseases)।
    • इस डिमेंशिया की यह आनुवांशिकी अन्य मुख्य डिमेंशिया के प्रकारों के मुकाबले ज्यादा है। National Institute of Aging (USA) की FTD की विषय-पत्रिका के अनुसार करीब 15 से 40 % केस में कोई आनुवांशिकी (जेनेटिक, हेरिडिटरी, genetic)) कारण पहचाना जा सकता है।

अवधि

  • फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया एक प्रगतिशील प्रकार का डिमेंशिया है और समय के साथ व्यक्ति की हालत बिगड़ती जाती है। अंतिम चरण में व्यक्ति पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर होने लगते हैं।
  • इस की अवधि हर व्यक्ति में फर्क है, पर आम तौर पर माना जाता है कि शुरू से अंतिम चरण तक 2 से 10 साल लग सकते हैं। औसतन लोग लक्षणों के आरम्भ के बाद करीब 8 साल जीवित रहते हैं।

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फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया रोग-निदान और उपचार (Frontotemporal Dementia Diagnosis and Treatment)।

रोग-निदान: फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया अनेक कारणों से कई बार पहचाना नहीं जाता।

  • प्रारंभिक लक्षण भूलने की बीमारी से नहीं मिलते, इसलिए परिवार और डॉक्टर उन  लक्षणों पर ध्यान नहीं देते। परिवार वाले डॉक्टर से सलाह करने के बारे में नहीं सोचते।
  • अगर 65 से कम उम्र के व्यक्ति में लक्षण होते हैं, तो लोग डिमेंशिया के बारे में नहीं सोचते। बदले व्यवहार को लोग बदले चरित्र की निशानी या तनाव (स्ट्रेस, stress) का नतीजा समझते हैं।
  • डॉक्टर और विशेषज्ञों को भी फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया का कम अनुभव होता है।
  • इन सब कारणों से सही निदान मिलने में देर हो सकती है।

उपचार

medicine pill
  • अभी तक फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया से हो रही हानि को वापस ठीक करने के लिए कोई दवा नहीं है। हानि की प्रगति को रोकने या धीरे करने के लिए भी कोई दवा नहीं है।
  • डॉक्टर की कोशिश रहती है कि व्यक्ति को लक्षणों से कुछ राहत दें।
    • व्यवहार-संबंधी लक्षण चिंताजनक हों तो डॉक्टर ऐसी दवाएं देने की कोशिश करते हैं जिन से व्यवहार में कुछ सुधार हो पाए।
    • बोलने में दिक्कत हो तो स्पीच थेरपी से कुछ केस में कुछ आराम मिल सकता है।
    • पार्किंसन किस्म के लक्षण हों तो डॉक्टर शायद कुछ पार्किसन की दवा भी दें।
    • व्यायाम (एक्सर्साइज) से, और शारीरिक और व्यावसायिक उपचार से भी कुछ आराम हो सकता है (physical and occupational therapy)।

देखभाल में पेश खास कठिनाइयाँ (Special challenges faced in caregiving)।

अन्य डिमेंशिया के मुकाबले फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया में देखभाल में चुनौतियाँ अधिक हैं, और देखभाल ज्यादा मुश्किल और तनावपूर्ण होती है।

  • निदान के समय व्यक्ति अकसर कमाने वाली उम्र में होते हैं, और उनकी ज़िम्मेदारियाँ ज्यादा होती हैं। बचत राशि अकसर कम होती है। देखभाल करने वाले भी नौकरी नहीं कर पाते। पैसे की मुश्किल आम है। बच्चों की उम्र भी कम होती है, और उनकी पढ़ाई वगैरह की जिम्मेदारी और खर्च ज्यादा होते हैं।
  • इस डिमेंशिया में अकसर व्यवहार संभालना ज्यादा मुश्किल रहता है।
  • जवान व्यक्ति के आक्रामक व्यवहार को संभालना ज्यादा कठिन है।
  • अनुचित व्यवहार के कारण समाज में और रिश्तेदारी में समस्या। इस के बारे में जानकारी इतनी कम है कि आस-पास के लोग रोग-निदान पर यकीन नहीं करते और व्यक्ति के चरित्र को खराब समझते हैं।
  • देखभाल सेवाएँ और रहने के लिए केयर होम बहुत ही कम हैं। लगभग सभी उपलब्ध सेवाएं और रहने के लिए केयर होम वृद्धों के लिए हैं। ये जवान, ताकतवर रोगियों के लिए उपयुक्त नहीं हैं।

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फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया: मुख्य बिंदु (Salient Points about Frontotemporal Dementia)।

  • फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया एक प्रमुख प्रकार का डिमेंशिया है जो अन्य डिमेंशिया के प्रकार से कुछ मुख्य बातों में बहुत फर्क है। इस वजह से इस का सही रोग-निदान बहुत देर से होता है।
    • इस के अधिकांश केस 65 से कम उम्र के लोगों में होते हैं।
    • इस के प्रारंभिक लक्षण हैं व्यक्तित्व और व्यवहार में बदलाव और भाषा संबंधी समस्याएँ।
    • शुरू में याददाश्त संबंधी लक्षण नहीं होते।
  • यह प्रगतिशील और ला-इलाज है। अभी इस को रोकने या धीमे करने के लिए कोई दवाई नहीं है।
    • इलाज और देखभाल में दवा से, व्यायाम से, शारीरिक और व्यावसायिक थेरपी से और स्पीच थेरपी से व्यक्ति को कुछ राहत देने की कोशिश करी जाती है।
  • इस डिमेंशिया का अब तक मालूम रिस्क फैक्टर (कारक) सिर्फ फैमिली हिस्ट्री है , यानी कि परिवार में अन्य लोगों को यह या ऐसा कोई रोग होना।
  • इस डिमेंशिया में देखभाल कई कारणों से बहुत मुश्किल होती है, जैसे कि:
    • पैसे की दिक्कत, बदला व्यवहार संभालना ज्यादा मुश्किल, समाज में बदले व्यवहार के कारण दिक्कत, बाद में व्यक्ति की शारीरिक कमजोरी के संभालने में दिक्कत।
    • उपयुक्त सेवाएँ बहुत ही कम हैं, और स्वास्थ्य कर्मियों में भी जानकारी बहुत ही कम।
  • फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया पर विशिष्ट संस्थाएं और ऑनलाइन सपोर्ट कम है। अधिकांश उपलब्ध जानकारी और सपोर्ट अल्ज़ाइमर रोग के लिए तैयार करी गयी है, परन्तु फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया अल्ज़ाइमर रोग से कई महत्त्वपूर्ण बातों में फर्क है और इस लिए कई पहलू हैं जिन पर आम संसाधनों से उपयोगी जानकारी नहीं मिल पाती। यदि आप को या आपके किसी प्रियजन को FTD हो तो जानकारी और सपोर्ट के लिए विशिष्ट FTD संसाधन का भी इस्तेमाल करें।

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(नोट्स: अधिक जानकारी के लिए लिंक, और चित्रों के लिए श्रेय)।
*1अन्य प्रमुख डिमेंशिया और उन पर प्रकाशित पोस्ट भी देखें। अल्ज़ाइमर रोग (Alzheimer’s Disease, AD) (सबसे आम डिमेंशिया रोग), संवहनी डिमेंशिया (वैस्कुलर डिमेंशिया, Vascular dementia), और लुई बॉडी डिमेंशिया (Lewy Body Dementia)

अन्य सम्रबंधित लेख देखें।

फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया और संबंधित विकारों के लिए कुछ शब्द/ वर्तनी देखें।

  • फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया, फ्रंटल लोबर डिमेंशिया, फ्रंटोटेम्पोरल लोबर डीजेनेरेशन, फ्रंटो-टेम्पोरल डीजेनेरेशन, फ़्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया, , पिक रोग, मोटर न्यूरान रोग, व्यवहार-संबंधी फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया, भाषा संबंधी फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया, अर्थ -संबंधी डिमेंशिया, सिमैंटिक डिमेंशिया, प्रगतिशील गैर-धाराप्रवाह वाचाघात, मोटर न्यूरान रोग, प्रगतिशील सुप्रान्यूक्लियर अंगघात, कोर्टिको-बैसल अपह्रास।
  • Frontotemporal dementia, Frontotemporal degeneration, Frontal lobe degeneration, FTD, Pick’s Disease, Behavioural variant Fronto-Temporal Dementia, BvFTD, Language variants of frontotemporal dementia, semantic dementia), progressive non-fluent aphasia, motor neurone disease, progressive supranuclear palsy, corticobasal degeneration.
चित्र का श्रेय: (Public domain pictures) मस्तिष्क का चित्र: Henry Vandyke Carter [Public domain], via Wikimedia Commons.

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संवहनी डिमेंशिया (वैस्कुलर डिमेंशिया, Vascular dementia): एक परिचय

संवहनी डिमेंशिया ((वैस्कुलर डिमेंशिया, वैस्कुलर मनोभ्रंश, vascular dementia) डिमेंशिया के चार प्रमुख प्रकारों में से एक है| यह डिमेंशिया के करीब 20 – 30% डिमेंशिया केस के लिए जिम्मेदार है| इस के बारे में जानने से आप इसे ज्यादा आसानी से पहचान पायेंगे, और इस से बचने के लिए अपनी जिंदगी में उचित बदलाव अपना पायेंगे| इस पृष्ठ पर उपलब्ध सेक्शन हैं:

संवहनी डिमेंशिया (मनोभ्रंश) क्या है (What is Vascular Dementia)|

संवहनी डिमेंशिया (मनोभ्रंश) एक प्रमुख प्रकार का डिमेंशिया है*1 

  • इस डिमेंशिया में मस्तिष्क में हुई हानि को दवा से वापस ठीक नहीं किया जा सकता| यह इर्रिवर्सिबल, (irreversible) है|
  • Dementia India Report 2010 के अनुसार इर्रिवार्सिब्ल डिमेंशिया के केस में से व्यक्ति को 20-30% संवहनी डिमेंशिया (वैस्क्युलर डिमेंशिया, vascular dementia) होता हैं|
Table 1.1 from Dementia India Report 2010
brain vascular system
  • अंग्रेज़ी शब्द वैस्कुलर (और हिंदी शब्द ‘संवहनी’) का अर्थ है –  रक्त वाहिकाओं (खून की नलिकाएं, blood vessels) से संबंधित|
  • रक्त वाहिकाओं के द्वारा शरीर के हर भाग में आक्सीजन और जरूरी पदार्थ पहुंचाए जाते हैं|
  • हमारे मस्तिष्क में भी रक्त वाहिकाओं का एक नेटवर्क होता है (वैस्क्युलर सिस्टम)| मस्तिष्क के ठीक काम करने के लिए मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं का ठीक रहना बहुत ज़रूरी है|
  • संवहनी डिमेंशिया में मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं में समस्या होती है, और इसकी वजह से डिमेंशिया लक्षण पैदा होते हैं| मस्तिष्क के कुछ भागों में खून की सप्लाई (blood supply) में रुकावट हो जाती है| खून ठीक न पहुँचने के कारण उन भागों में कोशिकाएं (सेल, cells) मर जाती हैं| इस के कारण वे भाग ठीक काम नहीं कर पाते, और डिमेंशिया के लक्षण पैदा होते हैं|
  • संवहनी डिमेंशिया के मुख्य प्रकार हैं:
    • स्ट्रोक से संबंधित डिमेंशिया (Stroke-related dementia), और
    • सबकोर्टिकल संवहनी डिमेंशिया (Subcortical vascular dementia)|

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स्ट्रोक से संबंधित डिमेंशिया (Stroke-related Dementia)|

  • स्ट्रोक (पक्षाघात) में मस्तिष्क में रक्त का प्रवाह कुछ भागों में कुछ देर के लिए नहीं हो पाता|
    • यह रक्त वाहिका में बाधा से हो सकता है, जैसे कि रक्त का थक्का (clot) वाहिका को बंद कर दे|
    • यह वाहिका के फटने से भी हो सकता है|
  • कई लोग स्ट्रोक के बाद ठीक हो पाते हैं| पर कुछ लोगों में स्ट्रोक से हुई मस्तिष्क की हानि पूरी तरह ठीक नहीं होती, जिस से डिमेंशिया के लक्षण नज़र आ सकते हैं|
  • अल्ज़ाइमर सोसाइटी UK की “What is vascular dementia?” पत्रिका के अनुसार,
    • लगभग 20% स्ट्रोक केस में छह महीनों में डिमेंशिया के लक्षण नज़र आ सकते हैं|
    • एक बार स्ट्रोक हो, तो आगे भी स्ट्रोक की संभावना बढ़ जाती है, और इस वजह से डिमेंशिया का खतरा भी बढ़ जाता है|

बार-बार मिनी स्ट्रोक से भी हानि होती है|

  • कुछ लोगों को बहुत छोटे-छोटे स्ट्रोक (मिनी-स्ट्रोक, mini-stroke) हो सकते हैं , जिन का असर 24 घंटे या कम में चला जाता है|
    • अकसर लोग ऐसे मिनी-स्ट्रोक पहचान नहीं पाते, या उन्हें गंभीर नहीं समझते|
    • पर कभी-कभी इन से मस्तिष्क में हानि हो सकती है|
    • ऐसे कई मिनी-स्ट्रोक के बाद कुल मिला कर हुई हानि इतनी हो सकती है कि डिमेंशिया के लक्षण नज़र आने लगते हैं|
  • मिनी-स्ट्रोक और उस में पाए डिमेंशिया से संबंधित कुछ शब्द:
    • मिनी-स्ट्रोक: ट्रांसिऐंट इस्कीमिक अटैक्स (transient ischemic attack, TIA) या अस्थायी स्थानिक अरक्तता|
    • मस्तिष्क में हुई हानि: इनफार्क्ट (रोधगलितांश, infarct)
    • बार-बार के मिनी-स्ट्रोक से संबंधित डिमेंशिया: मल्टी- इनफार्क्ट डिमेंशिया (multi-infarct dementia), बहु-रोधगलितांश डिमेंशिया|

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सबकोर्टिकल संवहनी डिमेंशिया (Subcortical Vascular Dementia)|

  • मस्तिष्क में कई छोटी वाहिकाएं हैं जो गहरे भागों (श्वेत पदार्थ) में खून पहुंचाती हैं|
  • इन में भी हानि हो सकती है, जैसे कि इनका सिकुड़ जाना, अकड़ जाना, इत्यादि। ऐसे में इन में खून का बहाव ठीक नहीं रहता| ऐसे नुकसान के कारक रोगों में उच्च रक्तचाप, उच्च कोलेस्ट्रॉल, और मधुमेह शामिल हैं|
  • मस्तिष्क के गहरे भागों की छोटी वाहिकाओं में हानि के कारण उत्पन्न डिमेंशिया का नाम है सबकोर्टिकल संवहनी डिमेंशिया (Subcortical vascular dementia)|

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संवहनी डिमेंशिया के लक्षण (Symptoms of Vascular Dementia)|

symptoms depend on damage location
संवहनी डिमेंशिया में व्यक्ति के लक्षण इस बात पर निर्भर होते हैं कि मस्तिष्क के किस-किस भाग में क्षति हुई है, और यह क्षति कितनी गंभीर है|
  • संवहनी डिमेंशिया में शुरू के आम लक्षण हैं: शारीरिक कमजोरी और मनोदशा (मूड) में अस्थिरता/ उतार-चढ़ाव (mood fluctuations)|
  • याददाश्त की दिक्कत भी हो सकती हैं, पर यह इतनी नहीं हैं जितनी कि अल्ज़ाइमर (Alzheimer’s Disease) में|
  • अन्य लक्षण के उदाहरण  हैं : काम करने की, या सोचने की गति कम होना, ध्यान लगाने में दिक्कत, निर्णय लेने में या समस्या का हल ढूंढ़ने में दिक्कत, भाषा संबंधी दिक्कत, भ्रम, अवसाद|
  • स्ट्रोक के केस में शरीर के एक तरफ कमजोरी भी हो सकती है|
  • हर व्यक्ति के लक्षण मस्तिष्क में हुई हानि के स्थान पर निर्भर हैं|

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संवहनी डिमेंशिया में लक्षणों का बढ़ना (Progression of Vascular Dementia Symptoms)|

  • डिमेंशिया का होना और लक्षणों की प्रगति इस पर निर्भर है कि मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं में समस्या किस तरह बढ़ती है|
  • डिमेंशिया का शुरू होना धीरे धीरे या अचानक हो सकता है|
    • कुछ लोगों में संवहनी डिमेंशिया के लक्षण धीरे-धीरे नज़र आते हैं|
    • पर यदि व्यक्ति को स्ट्रोक हो, तो स्ट्रोक के बाद लक्षण अचानक प्रकट हो सकते हैं|
  • लक्षण का बढ़ना भी अलग-अलग तरह से हो सकता है|
    • अगर डिमेंशिया स्ट्रोक के कारण हुआ है तो आगे के स्ट्रोक रोक पाने से मस्तिष्क में और अधिक क्षति नहीं होगी और लक्षण बिगड़ेंगे नहीं। पर अगर एक और स्ट्रोक हो जाए, तो लक्षण अचानक बढ़ भी सकते हैं । यानि कि, लक्षण चरणों (स्टेप्स) में बदतर हो सकते हैं|
    • अगर व्यक्ति को बार-बार स्ट्रोक या मिनी स्ट्रोक हो रहे हैं या मस्तिष्क की कोशिकाएं लगातार नष्ट हो रही हों तो गिरावट भी धीरे-धीरे बढ़ती रहेगी|
    • सबकोर्टिकल संवहनी डिमेंशिया में लक्षण धीरे-धीरे बढ़ सकते हैं, या भागों में भी बढ़ सकते हैं।

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संवहनी डिमेंशिया: उपचार (Treatment of Vascular Dementia)|

stethescope
  • संवहनी डिमेंशिया में मस्तिष्क में हुई हानि दवाई से ठीक नहीं हो सकती| (जिन भागों में हानि हुई है वे फिर से सामान्य नहीं हो सकते|
  • पर हम इस डिमेंशिया के बिगड़ने को रोकने की या धीरे करने की कोशिश कर सकते हैं| हम यह कोशिश कर सकते हैं कि रक्त का प्रवाह ठीक बना रहे और रक्त वाहिकाएं और अधिक खराब न हों|
  • डॉक्टर सलाह और दवाई देते समय अन्य पहलुओं के साथ-साथ संवहन-संबंधी पहलुओं पर जोर देते है। इन के उदाहरण हैं:
    • उच्च रक्तचाप, उच्च कोलेस्ट्रॉल, मधुमेह, दिल की समस्याएँ| इनसे बचें या इन्हें नियंत्रित रखें|
    • जीवन शैली बदलें| धूम्रपान बंद करें, व्यायाम करें, पौष्टिक भोजन लें, वज़न स्वस्थ सीमाओं में रखें, मद्यपान कम करें|
  • देखभाल के समय भी इन बातों पर विशेष ध्यान देना होता है|
  • यह भी जरूरी है कि स्ट्रोक के बाद खास तौर से सतर्क रहें कि फिर से स्ट्रोक न हो|  डिमेंशिया के लक्षणों के लिए भी सतर्क रहें|

(नोट:अधिकांश डिमेंशिया में लक्षण धीरे-धीरे और लगातार बढ़ते हैं|)

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संवहनी डिमेंशिया: मुख्य बिंदु (Salient Points of Vascular Dementia)|

mantra image
  • संवहनी मनोभ्रंश एक प्रमुख प्रकार का डिमेंशिया है, जो डिमेंशिया के 20-30% केस के लिए जिम्मेदार है|
    • यह अकेले भी पाया जाता है, और अन्य डिमेंशिया के साथ भी मौजूद हो सकता है , जैसे कि अल्ज़ाइमर और लुई बॉडी डिमेंशिया के साथ|
  • लक्षणों में, और प्रगति संबंधी पहलू में यह अन्य प्रमुख डिमेंशिया से कई तरह से फर्क हैं|
    • हानि कहाँ और कितनी हुई है, लक्षण इस पर निर्भर हैं|
    • अल्ज़ाइमर के मुकाबले इसमें याददाश्त की समस्या शुरू में कम पाई जाती है|
    • लक्षणों की प्रगति धीरे-धीरे भी हो सकती है, या चरणों (स्टेप्स) में भी हो सकती है|
  • इस की संभावना कम करने के लिए कारगर उपाय मौजूद हैं|
    • स्वास्थ्य और जीवन शैली पर ध्यान दें तो रक्त वाहिकाओं में समस्याएं कम होंगी| इस से संवहनी डिमेंशिया की संभावना कम होगी, और यदि हो भी तो इसकी प्रगति धीमी कर सकते हैं|
    • हृदय स्वास्थ्य के लिए जो कदम उपयोगी है, वे रक्त वाहिका समस्याओं से बचने के लिए भी उपयोगी हैं|

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(नोट्स: अधिक जानकारी के लिए लिंक, और चित्रों के लिए श्रेय) (Notes: Links, Credits)|

*1अन्य प्रमुख डिमेंशिया और उन पर प्रकाशित पोस्ट हैं: अल्ज़ाइमर रोग (Alzheimer’s Disease, AD) (सबसे आम डिमेंशिया रोग), लुई बॉडी डिमेंशिया (Lewy Body Dementia) और फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया (Frontotemporal Dementia, FTD)|

और देखें: इस हिंदी वेबसाइट पर इस विषय पर पृष्ठ: डिमेंशिया किन रोगों के कारण होता है (Diseases that cause dementia),निदान, उपचार, बचाव (Dementia Diagnosis, Treatment, Prevention). स्ट्रोक पर विस्तृत पोस्ट देखें: स्ट्रोक (आघात) और डिमेंशिया (मनोभ्रंश) (Stroke and Dementia).
कुछ विश्वसनीय अंग्रेज़ी वेबसाइट के लिंक: Vascular Dementia (Alzheimer’s Association, USA)Opens in new window और Vascular Dementia (Alzheimer’s Society, UK) (अंग्रेज़ी PDF डाउनलोड उपलब्ध) Opens in new window|

संवहनी डिमेंशिया और संबंधित विकारों के लिए कुछ शब्द/ वर्तनी:

  • वास्कुलर डिमेंशिया, वैस्क्युलर डिमेंशिया, नाड़ी-संबंधी डिमेंशिया, संवहनी मनोभ्रंश, हृदवाहिनी रोग, रक्त-वाहिका रोग,स्ट्रोक, सबकोर्टिकल संवहनी डिमेंशिया, मल्टी-इनफार्क्ट, मिनी-स्ट्रोक्स, बहु-रोधगलितांश डिमेंशिया, बिंसवान्गर रोग, सबकोर्टिकल वैस्क्युलर डिमेंशिया, ट्रांसिऐंट इस्कीमिक अटैक्स, अस्थायी स्थानिक अरक्तता दौरे, पक्षाघात|
  • Vascular dementia, stroke, transient ischemic attacks (TIA), multi-infarct disease, subcortical vascular dementia, small vessel disease, Binswager Disease.
श्रेय: (Public domain pictures) मस्तिष्क का चित्र: Henry Vandyke Carter [Public domain], via Wikimedia Commons, मस्तिष्क के वैस्क्यूलर सिस्टम का चित्र: National Institute of Aging.

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लुई बॉडी डिमेंशिया (Lewy Body Dementia): एक परिचय

लुई बॉडी डिमेंशिया (मनोभ्रंश) एक प्रमुख प्रकार का डिमेंशिया है जिसके बारे में जानकारी बहुत कम है और जो अकसर पहचाना नहीं जाता। नतीजन, परिवार वाले यह नहीं जान पाते कि आगे क्या क्या होगा, देखभाल की  तैयारी  कैसे करें, और किन बातों के प्रति सतर्क रहें। इस पृष्ठ पर:

लुई बॉडी डिमेंशिया (मनोभ्रंश) क्या है (What is Lewy Body Dementia)|

lewy body in neuron
  • लुई बॉडी डिमेंशिया (Lewy Body Dementia, LBD) एक प्रमुख प्रकार का डिमेंशिया (मनोभ्रंश) है*1 |
  • इस डिमेंशिया में हुई मस्तिष्क की हानि को दवाई से पलटा नहीं जा सकता (इर्रिवर्सिबल, irreversible)| व्यक्ति का मस्तिष्क फिर से सामान्य नहीं हो सकता|
  • मस्तिष्क की हानि समय के साथ बढ़ती जाती है (प्रगतिशील डिमेंशिया, प्रगामी डिमेंशिया, progressive dementia)|
  • अंतिम चरण में लुई बॉडी डिमेंशिया वाले व्यक्ति सब कामों के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं|
  • इस डिमेंशिया की खास पहचान है कि मस्तिष्क के कुछ न्यूरान (neuron, कोशिका/ सेल) में “लुई बॉडी” नामक असामान्य गुच्छे  पाए जाते हैं| इस असामान्य संरचना के कारण ये सेल ठीक काम नहीं करते|
  • यह असामान्य संरचना मस्तिष्क के कई भागों में पाई जाती है| इन में अकसर वे क्षेत्र भी मौजूद हैं जो पार्किंसन रोग में प्रभावित होते हैं|
  • लुई बॉडी डिमेंशिया अन्य डिमेंशिया रोगों के साथ भी मौजूद हो सकता है, खासकर अल्ज़ाइमर के साथ (मिश्रित डिमेंशिया)|

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जानकारी की कमी (Information/ awareness about LBD is very low)|

  • आम लोगों ने डिमेंशिया या अल्ज़ाइमर का नाम तो शायद सुना हो, पर वे लुई बॉडी डिमेंशिया के बारे में नहीं जानते|
  • डॉक्टरों में भी लुई बॉडी डिमेंशिया के बारे में कम जानकारी है, और इस को पहचानने का, और इसका इलाज करने का बहुत कम अनुभव है।
  • कुछ मुख्य बिंदु:
    • “लुई बॉडी” संरचना (असामान्य प्रोटीन डिपॉजिट का गुच्छा) सबसे पहले 1912 में एक पार्किंसन के रोगी में पहचाना गया|
    • “लुई बॉडी” संरचना से संबंधित डिमेंशिया का रोग निदान सिर्फ 1990 के दशक से शुरू हुआ है| निदान प्रणाली और मापदंड पर अब भी चर्चा जारी है|
    • यह डिमेंशिया कितने लोगों को है, इस पर भी विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है|
    • विशेषज्ञों का कहना है इस से ग्रस्त कई व्यक्तियों को सही रोग निदान नहीं मिलता, और लुई बॉडी डिमेंशिया वाले व्यक्ति को कई बार पार्किंसन रोग का या अल्ज़ाइमर रोग का निदान दिया जाता है|

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लुई बॉडी डिमेंशिया के लक्षण (Symptoms of Lewy Body Dementia)|

  • लुई बॉडी डिमेंशिया में पाए जाने वाले कुछ विशिष्ट लक्षण:
    • सोच-विचार की क्षमताएं कम होती हैं और रोज-रोज बहुत बदलती हैं| इन क्षमताओं  में  स्पष्ट और बड़े-बड़े उतार-चढ़ाव नजर आते हैं |
    • विभ्रम, खास तौर से दृष्टि विभ्रम : ऐसी चीजें देखना जो मौजूद नहीं हैं (दृष्टि विभ्रम, चाक्षुष मतिभ्रम, visual hallucinations), ऐसी चीजें सुनना जो हैं नहीं (श्रवण मतिभ्रम, auditory hallucinations)। विभ्रम करीब 80% रोगियों में पाया जाता है, और अधिकतर यह दृष्टि विभ्रम होता है|
    • पार्किन्सन लक्षण: कंपन (ट्रेमर), जकड़न, पैर घसीटना, धीमापन और गति में बदलाव, झुक का चलना, बारीक काम में दिक्कत (जैसे कि लिखना, सुई पिरोना), चेहरे पर भाव की कमी|
    • नींद से जुड़ा विकार: नींद में ही सपनों पर अमल करना, जैसे कि सोते-सोते जोर से हँसना, चिल्लाना, हाथ-पैर मारना, बिस्तर से गिर जाना—यानि कि, REM नींद संबंधित व्यवहार विकार|
  • अन्य लक्षण: याददाश्त की समस्या, प्रॉब्लम सुलझाने में दिक्कत, तर्क करने में दिक्कत, निर्णय ठीक से न ले पाना, दूरी का अंदाज़ा न लगा पाना, वस्तुओं को पहचान न पाना, समय और जगह की पहचान न रहना, वगैरह| लुई बॉडी डिमेंशिया में याददाश्त की समस्या अल्ज़ाइमर जितनी नहीं देखी जाती|

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रोग निदान संबंधित शब्दावली (Terms used while diagnosing)|

रोग-निदान के समय डॉक्टर अलग-अलग नामों का इस्तेमाल करते है, जिससे कई परिवार वाले कन्फ्यूज हो सकते हैं। इस पर छोटा सा परिचय:

  • कुछ डॉक्टर इस डिमेंशिया को कभी “डिमेंशिया विद लुई बॉडीज” कहते हैं और कभी “लुई बॉडी डिमेंशिया” बुलाते हैं|
  • कुछ डॉक्टर एक निदान प्रणाली का इस्तेमाल करते हैं जिस में वे लुई बॉडी डिमेंशिया नाम के अंतर्गत दो अलग रोग निदान पहचानते हैं| ये हैं पार्किंसंस वाला डिमेंशिया (Parkinsonian dementia) और डिमेंशिया विद लुई बॉडीज (Dementia with Lewy Bodies)|
diagnosis of LBD as parkinsonian dementia or dementia with lewy bodies

लुई बॉडी डिमेंशिया: कुछ अन्य तथ्य (Some other facts about Lewy Body Dementia)|

parkinson man
एक अनुमान के अनुसार पार्किंसंस वाले व्यक्तियों में से करीब 1/3 व्यक्तियों को आगे जा कर डिमेंशिया हो सकता है|

इस डिमेंशिया के होने की संभावना: पर अब तक उपलब्ध जानकारी :

  • इसकी संभावना उम्र बढ़ने के साथ बढ़ती है और इस के अधिकांश केस 50+ आयु के लोगों में हैं|
  • महिलाओं के मुकाबले यह पुरुषों में अधिक पाया जाता है|
  • पार्किंसंस वाले लोगों में इस की ज्यादा संभावना होती है|

इस डिमेंशिया की प्रगति: 

  • इस में  मस्तिष्क में हो रही हानि समय के साथ बढ़ती है| अंतिम अवस्था में व्यक्ति पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो सकता है|
  • यह 2 से 20 साल तक चल सकता  है| (प्रारंभिक अवस्था या  निदान से लेकर मृत्यु तक का फासला औसतन 5 से 7 साल का है|

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लुई बॉडी डिमेंशिया और उपचार (Lewy Body Dementia Treatment)|

medicine pill
  • वर्तमान में, दवा से लुई बॉडी डिमेंशिया न तो रुक सकता है, न ही उसकी प्रगति धीमी करी जा सकती हैं|
  • ऐसे में व्यक्ति को लक्षणों से राहत देना अहम हो जाता है, ताकि व्यक्ति को कम दिक्कतें हों|  इस के लिए दवाई, घर और वातावरण में बदलाव, और देखभाल और बातचीत के बेहतर तरीके इस्तेमाल करे जाते हैं|
  • कुछ दवाएं अल्ज़ाइमर या पार्किंसन रोग में कारगर हो सकती हैं पर लुई बॉडी केस में लक्षणों को बिगाड़ सकती हैं|
    • कई बार लुई बॉडी डिमेंशिया वाले व्यक्ति को अल्ज़ाइमर का गलत निदान मिल सकता है। इस स्थिति में डॉक्टर अल्ज़ाइमर की दवाई देंगे|
    • पार्किन्सन लक्षणों से राहत देने के लिए डॉक्टर पार्किंसन रोग में दी जाने वाली दवाई दे सकते हैं|
    • लुई बॉडी डिमेंशिया वाले व्यक्ति में ऐसी कुछ दवाओं से नुकसान हो सकता है|
  • रोग निदान के बारे में थोड़ा सा भी शक हो तो डॉक्टर से बात करें|
  • सतर्क रहें कि दवा से नुकसान तो नहीं हो रहा। व्यवहार संबंधी दवा (ऐन्टी साइकाटिक, anti-psychotic) के दुष्प्रभाव के प्रति खास तौर से सतर्क रहें|

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लुई बॉडी डिमेंशिया: मुख्य बिंदु (Salient Points about Lewy Body Dementia)|

  • लुई बॉडी डिमेंशिया एक प्रमुख प्रकार का डिमेंशिया है। यह ठीक नहीं हो सकता और समय के साथ व्यक्ति की हालत खराब होती जाती है|
  • इस के बारे में जानकारी बहुत कम है|
  • इस की खास पहचान है मस्तिष्क की कोशिकाओं में “लुई बॉडी” नामक असामान्य संरचना की उपस्थिति|
  • लक्षण:
    • विशिष्ट लक्षण हैं  दृष्टि विभ्रम, सोचने-समझने की क्षमता कम होना, और इन का रोज-रोज बहुत भिन्न होना, पार्किंसन लक्षण, जैसे कंपन, जकड़न, धीमापन, पैर घसीटना, इत्यादि, और  नींद में व्यवहार संबंधी समस्याएँ|
    • अन्य डिमेंशिया लक्षण भी प्रकट होते हैं|
  • अभी इस को रोकने या धीमे करने के लिए कोई दवाई नहीं है| इलाज और देखभाल में व्यक्ति को लक्षणों से कुछ राहत देने की कोशिश रहती है|
  • सही रोग निदान मिलने में दिक्कत हो सकती हैं|
  • कुछ आम-तौर डिमेंशिया में इस्तेमाल होने वाली दवाओं से लुई बॉडी डिमेंशिया वाले लोगों को नुकसान हो सकता है। सतर्क रहना जरूरी हैं|
  • लुई बॉडी डिमेंशिया से संबंधित कुछ खास संसाधन हैं। अधिक जानने के लिए और वर्तमान जानकारी के अपडेट पाने के लिए इन से संपर्क करें। कुछ ऑनलाइन समुदाय भी हैं जहाँ लोग इस से संबंधित अनुभव और सुझाव बांटते हैं। आप यदि इस डिमेंशिया से ग्रस्त हैं, या इस से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल कर रहे हैं, तो इन में अनुभव और सुझाव बाँट सकते हैं|

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(नोट्स: अधिक जानकारी के लिए लिंक, और चित्रों के लिए श्रेय)|
*1अन्य प्रमुख डिमेंशिया और उन पर प्रकाशित पोस्ट हैं : अल्ज़ाइमर रोग (Alzheimer’s Disease, AD) (सबसे आम डिमेंशिया रोग), संवहनी डिमेंशिया (वैस्कुलर डिमेंशिया, Vascular dementia), और फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया (Frontotemporal Dementia, FTD).

और देखें:

लुई बॉडी डिमेंशिया और संबंधित विकारों के लिए कुछ शब्द/ वर्तनी:

  • लेवी बॉडीज़ , लेवी बॉडीज़ के साथ डिमेंशिया,  लुई बाड़ी, लुई बाड़िज़, लुई बाड़िज़ वाला डिमेंशिया , लेवी बॉडीज़, लेवी बॉडीज़ वाला डिमेन्शिया, पार्किंसंस, पार्किंसन, पर्किन्सन , पार्किन्सन|
  • Lewy Body Dementia (LBD), Dementia with Lewy Bodies (DLB), Parkinsonian Dementia, Parkinson’s Disease
चित्रों का श्रेय: कोशिका में लुई बॉडी का चित्र: Marvin 101 (Own work) [CC BY-SA 3.0] (Wikimedia Commons) पार्किन्सन के व्यक्ति का चित्र: By Sir_William_Richard_Gowers_Parkinson_Disease_sketch_1886.jpg: derivative work: Malyszkz [Public domain], via Wikimedia Commons.

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अल्ज़ाइमर रोग (Alzheimer’s Disease, AD) : एक परिचय

अल्जाइमर रोग (Alzheimer’s Disease, AD) सबसे ज्यादा पाया जाने वाला डिमेंशिया है (50-75%)। इस पर जानकारी अन्य डिमेंशिया रोगों से ज्यादा आसानी से मिलती है। इस पृष्ठ पर प्रस्तुत है इस पर एक सरल परिचय और कुछ उपयोगी चित्र, और हिंदी साइट और वीडियो के लिंक भी हैं|

डिमेंशिया के अन्य तीन मुख्य प्रकारों पर प्रकाशित पोस्ट  के लिए ये लिंक देखें : संवहनी डिमेंशिया (वैस्कुलर डिमेंशिया, Vascular dementia), लुई बॉडी डिमेंशिया (Lewy Body Dementia), और फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया (Frontotemporal Dementia, FTD) |

अल्ज़ाइमर रोग क्या है (What is Alzheimer’s Disease)|

अल्ज़ाइमर रोग सबसे ज्यादा पाया जाने वाला डिमेंशिया है*1 |

  • इस डिमेंशिया में मस्तिष्क में हुई हानि को दवा से वापस ठीक नहीं किया जा सकता| यह इर्रिवर्सिबल (irreversible) है|
  • Dementia India Report 2010 के अनुसार इर्रिवार्सिब्ल डिमेंशिया के केस में से 50 – 75% लोगों को अल्ज़ाइमर रोग होता है|
  • अल्ज़ाइमर रोग अन्य डिमेंशिया के साथ-साथ भी पाया जाता है, जैसे कि वैस्कुलर डिमेंशिया के साथ। इस को मिश्रित डिमेंशिया (मिक्स्ड डिमेंशिया) कहते हैं|
Table 1.1 from Dementia India Report 2010

अल्ज़ाइमर रोग सबसे पहले डॉक्टर अलोइस अल्झाइमर ने पहचाना था| इस लिए यह रोग उन के नाम से जाना जाता है। पर यह रोग नया नहीं है। इस के लक्षण तो हम सदियों से देखते आ रहे हैं, बस हम यह नहीं जानते थे कि ये लक्षण मस्तिष्क में हो रहे बदलाव के कारण हैं।

Alzheimer's disease-neuron death
  • अल्ज़ाइमर रोग में मस्तिष्क में हो रही हानि की खास पहचान हैं बीटा-एमीलायड प्लैक और न्यूरोफिब्रिलरी टैंगल| सरलता के लिए इन्हें अकसर सिर्फ प्लैक और टैंगिल  भी बुलाया जाता है|
  • इन असामान्य खण्डों की वजह से मस्तिष्क के सेल (कोशिकाएं, न्यूरोन) मरने लगते हैं|
  • सेल एक दूसरे को सन्देश ठीक से नहीं पहुंचा पाते|
  • मस्तिष्क सिकुड़ने लगता है|
  • हानि अकसर मस्तिष्क के हिप्पोकैम्पस भाग में शुरू होती है, और धीरे धीरे सभी भागों में फैलने लगती है|
  • जैसे-जैसे हानि बढ़ती है, मस्तिष्क के अनेक भाग भी ठीक काम नहीं कर पाते|

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अल्ज़ाइमर रोग के लक्षण (Symptoms of Alzheimer’s Disease)|

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अकसर हिप्पोकैंपस क्षेत्र अल्ज़ाइमर में सबसे पहले प्रभावित होता है। इस क्षेत्र का सम्बन्ध सीखने और याददाश्त से है।
  • अल्ज़ाइमर रोग में शुरू का आम लक्षण है याददाश्त की समस्या। इस लिए इस रोग को कई लोग भूलने की बीमारी कहते हैं|
  • यह स्मृति-लोप की समस्या बहुत धीरे-धीरे बढ़ती हैं| यह विशेष तौर से हाल में हुई बातों को याद करने की कोशिश करते वक्त नजर आती है|
  • अन्य शुरू के लक्षण हैं डिप्रेशन (यानि कि अवसाद), अरुच और उदासीनता|

मस्तिष्क ठीक काम नहीं कर पाता, इसलिए अन्य लक्षण भी नजर आते हैं| कुछ उदाहरण पेश हैं:

  • जगह और समय क्या है, यह ठीक से मालूम नहीं होना| भटकने की समस्या आम है|  |
  • साधारण रोज-रोज के काम करने में दिक्कत होना, काम बहुत धीरे-धीरे करना या उन में मदद की जरूरत होना|
  • ध्यान लगाने में दिक्कत|
  • नई चीजें न सीख पाना |
  • अपनी बात बताने में दिक्कत|  दूसरों की बातें समझने में दिक्कत| भाषा की दिक्कत,| लिखने में दिक्कत|
  • चीजें पहचानने में दिक्कत| चित्रों को पहचान ना पाना| दूरी का अंदाजा ठीक से नहीं लगा पाना|
  • सोचने में और तर्क करने में दिक्कत| हिसाब करने में दिक्कत| समस्याएँ ना सुलझा पाना|  निर्णय लेने में दिक्कत |
  • व्यक्तित्व और मूड में बदलाव, जैसे कि दूसरों से दूर रहने लगना, चिड़चिड़ा होना |
  • भ्रम होना|

अल्ज़ाइमर रोग में कई उप-प्रकार हैं, जिन में कुछ असामान्य अल्ज़ाइमर रोग (Atypical Alzheimer’s Disease) भी हैं, और इन में लक्षण सामान्य अल्ज़ाइमर रोग से कुछ अलग होते हैं।
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समय के साथ अल्ज़ाइमर रोग का बढ़ना (Progression of Alzheimer’s Disease)|

अल्ज़ाइमर रोग एक प्रगतिशील रोग है। इस में समय के साथ-साथ हानि बढ़ती रहती है, और लक्षण भी उसी प्रकार गंभीर होते जाते हैं। शुरू में अकसर सिर्फ हिप्पोकैम्पस में हानि होती है, पर यह हानि  फैलती जाती है।

Alzheimers disease-brain shrinkage and link to wikimedia
अल्ज़ाइमर में मस्तिष्क के सेल (न्यूरोन) में हानि

रोग का व्यक्ति पर असर किस रफ्तार से और किस तरह बढ़ेगा यह हर केस में फर्क होता है। अंतिम चरण तक पहुँचते पहुँचते व्यक्ति सभी कामों के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं। व्यक्ति का चलना फिरना, बोल पाना, यहाँ तक कि खाना निगल पाना, सभी बहुत मुश्किल हो जाता है|  वे पूरे समय बिस्तर पर ही रहते हैं।

अल्ज़ाइमर रोग में मस्तिष्क में किस प्रकार हानि होती है, और समय के साथ यह कैसे बढ़ती है, यह देखने के लिए कुछ चित्रण पेश हैं , National Institute on Aging  USA के सौजन्य से|

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अल्ज़ाइमर रोग: कुछ अन्य तथ्य (Some other facts about Alzheimer’s Disease)|

बढ़ती उम्र और अल्ज़ाइमर  होने की  संभावना में सम्बन्ध है|

  • अल्ज़ाइमर की संभावना उम्र के साथ बढ़ती है, और खास तौर से 65  साल और अधिक होने  के बाद ज्यादा होती है। अधिकांश केस 65 और उससे  ज्यादा आयु  वाले लोगों में पाए जाते हैं|
  • एक जरूरी तथ्य यह है कि अल्ज़ाइमर रोग 65 से कम उम्र के लोगों में भी हो सकता है। इस को यंगर ऑनसेट अल्ज़ाइमर रोग (Younger Onset Alzheimer’s Disease, YOAD) या अर्ली ऑनसेट अल्ज़ाइमर रोग कहते हैं (Early Onset Alzheimer’s Disease, EOAD)|

अल्ज़ाइमर के कारक पर उपलब्ध जानकारी :

  • अल्ज़ाइमर रोग किसी को भी हो सकता है। इस का कोई स्पष्ट कारक नहीं मालूम है।
  • उम्र के साथ-साथ अल्ज़ाइमर रोग की संभावना बहुत बढ़ती है| उम्र बढ़ने को इस रोग का सबसे प्रमुख कारक माना जाता है|
  • यदि परिवार में किसी को अल्ज़ाइमर है, तो बच्चों में अल्ज़ाइमर की संभावना ज्यादा होती है। इस आनुवंशिकता को ठीक से समझने के लिए अभी रिसर्च चल रहा है।

अवधि:

  • यह रोग प्रगतिशील है और ला-इलाज भी, और इस की अवधि शुरू के लक्षण से लेकर व्यक्ति के मौत तक है। यह अवधि हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग है| ये अवधि कुछ साल से लेकर एक या दो दशक तक की हो सकती है।
  • कुछ अनुमान के अनुसार प्रारंभिक लक्षण से अंत तक व्यक्ति को औसतन आठ साल लगते हैं|

बचाव:

  • अल्ज़ाइमर से बचने का कोई पक्का तरीका अब तक मालूम नहीं है। इस पर जोर-शोर से शोध चल रहा है।
  • अब तक की समझ के हिसाब से कुछ चीजें  हैं जिन्हें अपनाने से इसकी संभावना कम होगी|
    • स्वस्थ जीवनशैली अपनाना, जैसे कि नियमित व्यायाम और पौष्टिक भोजन |हृदय स्वास्थ्य में इस्तेमाल तरीके अल्ज़ाइमर रोग से बचाव के लिए भी अपना सकते हैं|
    • सक्रिय और सकारात्मक जीवन बिताना, और अर्थपूर्ण काम करना|
    • अवसाद, यानि कि  डिप्रेसन से बचना|
    • ऐसे काम करना जिन से मस्तिष्क सक्रिय रहे|
    • लोगों से मिलना-जुलना| सामाजिक गतिविधियों में भाग लेना|
    • कुछ स्वास्थ्य समस्याओं से खास तौर बचना, जैसे कि मधुमेह, उच्च रक्तचाप, उच्च कोलेस्ट्रोल, और हृदय रोग। यह  समस्याएँ हों  तो इन को नियंत्रण में रखना|
    • तंबाकू सेवन बंद करना|
    • मद्यपान सीमित रखना|

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अल्ज़ाइमर रोग-निदान और उपचार (Diagnosis and Treatment of Alzheimer’s Disease)|

अल्ज़ाइमर रोग-निदान के लिए कोई एक विशिष्ट टेस्ट नहीं है। विशेषज्ञ अल्ज़ाइमर का डायग्नोसिस  पूरी चिकित्सीय जाँच के बाद ही दे सकते हैं। वे व्यक्ति के लक्षण समझने की कोशिश करते हैं, व्यक्ति की अन्य बीमारियों की जानकारी प्राप्त करते हैं, फैमिली मेडिकल हिस्ट्री लेते हैं, और परिवार वालों से भी बात करते हैं। खून के टेस्ट, मानसिक अवस्था के लिए टेस्ट, याददाश्त और सोचने-समझने के लिए टेस्ट, ब्रेन स्कैन, इत्यादि,  ये सब इस चिकित्सीय मूल्यांकन का भाग हैं।

रोग-निदान में गलतियाँ हो सकती है। कुछ उदाहरण पेश हैं|

  • लक्षण धीरे धीरे बढ़ते हैं| कई बार इन्हें बुढ़ापे की आम समस्या समझ कर नजरअंदाज कर दिया जाता है|
  • यदि व्यक्ति में अल्ज़ाइमर रोग सामान्य तरह से पेश नहीं हो, तो यह शायद न पहचाना जाए| उदाहरण है  कम उम्र में अल्ज़ाइमर होना|
  • क्योंकि अल्ज़ाइमर रोग के बारे में अन्य डिमेंशिया रोगों से ज्यादा जानकारी और जागरूकता है, इसलिए कभी-कभी मिलते-जुलते लक्षण देखने पर, बिना पूरी जाँच करे, व्यक्ति को अल्ज़ाइमर का रोग-निदान मिल सकता है। व्यक्ति को कोई दूसरी बीमारी है, यह शायद पहचाना न जाए। इस स्थिति में:
    • व्यक्ति को अन्य मौजूद बीमारी का इलाज नहीं मिल पाता है|
    • कुछ दवा जो अल्ज़ाइमर रोग में कारगर हैं, वे अन्य रोगों में नुकसान भी कर सकती हैं|

अच्छा यही होगा कि परिवार वाले संतोष कर लें कि रोग-निदान के समय सब जाँच हुई है|

रोग-निदान जितनी जल्दी हो, उतना अच्छा है, ताकि व्यक्ति उपलब्ध दवा का लाभ उठा सकें, और व्यक्ति और परिवार वाले, सब आगे के लिए योजना बना पाएँ|

इसका पूरा उपचार अब तक उपलब्ध नहीं है| 

  • वर्तमान में, दवा से अल्ज़ाइमर रोग न तो रुक सकता है, न ही उसकी प्रगति धीमी करी जा सकती हैं|
  • हालांकि मस्तिष्क में हो रही हानि के लिए कोई दवा नहीं है, पर ऐसी कुछ दवा हैं जिन से अल्ज़ाइमर के रोगियों को कुछ राहत मिल सकती है|
    • ये दवाएं लक्षणों में कुछ सुधार लाने के लिए इस्तेमाल होती हैं। यह कुछ लोगों में कारगर होती हैं, पर सब में नहीं, और यह शुरू की अवस्था में ज्यादा कारगर होती हैं।

दवा के अतिरिक्त, अन्य भी कई तरीके हैं जिन से व्यक्ति की सहायता करी जा सकती है| उदाहरण हैं घर और वातावरण में बदलाव, और देखभाल और बातचीत के बेहतर तरीके इस्तेमाल करना। व्यक्ति की खुशहाली के लिए इन्हें अपनाना बहुत जरूरी है|
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उपलब्ध जानकारी और सपोर्ट पर कुछ कमेन्ट (Available information and resources: some comments)|

डिमेंशिया अनेक रोगों की वजह से हो सकता है, और इन में से अल्ज़ाइमर रोग पर सब से ज्यादा चर्चा होती है। डिमेंशिया समर्थन पर काम करने वाली संस्थाओं के नाम में अकसर अल्ज़ाइमर शब्द होता है, जैसे कि “अल्ज़ाइमर असोसिअशन” या “अल्ज़ाइमर सोसाइटी”। भारत में राष्ट्रीय स्तर के संगठन के नाम में भी अल्ज़ाइमर शब्द है: Alzheimer’s and Related Disorders Society of India (ARDSI)। लेखों में, खबरों में, अन्य जागरूकता के लिए करे गए कार्यक्रमों में, सब में अल्ज़ाइमर और डिमेंशिया दोनों शब्दों का अदल-बदल कर इस्तेमाल होता है। इस कारण यह नाम भी कई लोग पहचानते हैं| पर इस में क्या लक्षण हैं, और उन का व्यक्ति और परिवार पर क्या असर होता है, इस पर जानकारी कम है।

कई लोग अल्ज़ाइमर को भूलने की बीमारी समझते हैं या इसे वृद्धों की बीमारी के रूप में ही जानते हैं। लोग यह नहीं जानते कि व्यक्ति को बहुत तरह की दिक्कतें होती हैं और समय के साथ-साथ व्यक्ति पूरी तरह लाचार हो जाते हैं, या यह कम उम्र में भी हो सकता है। यानि कि, नाम की पहचान तो है, पर इस रोग का किस-किस पर और कितना गंभीर असर होता है, इस के बारे में  कई गलत धारणाएँ हैं।

परिवार में यदि किसी को अल्ज़ाइमर है, तो देखभाल की जरूरत होती है, और व्यक्ति की सहायता का काम समय के साथ बढ़ता जाता है। देखभाल कई साल करनी होती है| इस के लिए परिवार को सही जानकारी, सलाह और सेवाओं की जरूरत होती है। पर भारत में ऐसी बहुत ही कम संस्थाएं और सेवाएं हैं जो उचित जानकारी और सहायता दे सकती हैं।

अफ़सोस, कुछ लोग अल्ज़ाइमर रोग से संबंधित आशंका और भय का फायदा उठाते हैं। वे अपनी संस्था या सेवा के लिए दावा करते हैं कि वे अल्ज़ाइमर रोगियों को उचित सहायता और सेवा प्रदान कर पायेंगे| वे  कभी-कभी यह भी गलत दावा करते है कि वे अधिकृत संस्थाओं से जुड़े हैं। पर वास्तव में उनकी जानकारी बहुत ही सीमित होती है। किसी के भी दावे पर विश्वास करने से पहले ऐसे दावों की पुष्टि करनी जरूरी है।

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अल्ज़ाइमर रोग: मुख्य बिंदु (Salient Points of Alzheimer’s Disease)

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  • अल्ज़ाइमर रोग डिमेंशिया का सबसे आम कारण है|  यह डिमेंशिया के करीब 50 से 75% केस के लिए जिम्मेदार है|
    • यह अकेले भी पाया जाता है, और अन्य डिमेंशिया के साथ भी मौजूद हो सकता है (जैसे कि संवहनी मनोभ्रंश या लुई बॉडी डिमेंशिया के साथ)|
  • शुरू में इस का आम लक्षण है याददाश्त की समस्या। अन्य आम शुरू के लक्षण हैं अवसाद और अरुचि।
    • लक्षण धीरे धीरे बढ़ते हैं, और शुरू में पता नहीं चलता कि कुछ गड़बड़ है|
    • समय के साथ लक्षण बढ़ते जाते हैं और मस्तिष्क के सभी कामों में दिक्कत होने लगती है|
    • अंतिम चरण में व्यक्ति पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं|
  • इस को रोकने या ठीक करने के लिए दवा नहीं है, पर लक्षणों से राहत देने के लिए कुछ दवा और गैर-दवा वाले उपचार हैं|
  • इस से बचने के लिए कोई पक्का तरीका मालूम नहीं है| पर यह माना जाता है कि स्वस्थ जीवन शैली से, व्यायाम से, सक्रिय जीवन बिताने से कुछ बचाव होगा
    • हृदय स्वास्थ्य के लिए जो कदम उपयोगी है, वे इस से बचाव में भी उपयोगी हैं (What is good for the heart is good for the brain).

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(नोट्स: अधिक जानकारी के लिए लिंक और श्रेय) (Notes: Links and Credits)|

*1अन्य प्रमुख डिमेंशिया और उनके लिए लिंक हैं  संवहनी डिमेंशिया (वैस्कुलर डिमेंशिया, Vascular dementia), लुई बॉडी डिमेंशिया (Lewy Body Dementia), और फ्रंटो-टेम्पोरल डिमेंशिया (Frontotemporal Dementia, FTD)|

और जानकारी के लिए देखें:
मस्तिष्क में बदलाव पर हिंदी में वीडियो |
एक वीडियो परिचय, डिमेंशिया सलाहकार Atiq Hassan (Bradford,UK)द्वारा:

अल्जाइमर रोग पर एक तीन मिनट का हिंदी “पॉकेट” वीडियो: एल्ज़ाइमर्ज़ रोग क्या है|

इस विषय पर हमारे हिंदी पृष्ठ भी देखें:  डिमेंशिया किन रोगों के कारण होता है (Diseases that cause dementia),निदान, उपचार, बचाव (Dementia Diagnosis, Treatment, Prevention)|
कुछ अन्य हिंदी लिंक हैं भारत में स्थित “वाइट स्वान फ़ाउंडेशन फ़ॉर मेंटल हेल्थ”के वेबसाइट पर दो पृष्ठ: अल्ज़ाइमर रोग की समझ Opens in new window और अल्ज़ाइमर रोग Opens in new window, और अमरीका में स्थित Alzheimer’s Association, USA का पृष्ठOpens in new window.
कुछ अंग्रेज़ी लिंक:
What Is Alzheimer’s?(Alzheimer’s Association, USA) Opens in new window और Alzheimer’s disease? (Alzheimer’s Society, UK) (अंग्रेज़ी PDF डाउनलोड उपलब्ध) Opens in new window|

अल्ज़ाइमर रोग और संबंधित विकारों के लिए कुछ शब्द/ वर्तनी पेश है:

  • अल्ज़ाइमर रोग, अल्जाइमर, अल्जाइमर्ज़, अलजाइमर, अलज़ाइमर, एलसायमरस, अलज़ाईमर, एल्ज़ाइमर्ज़, एल्ज़ाइमर, बीटा-एमीलायड प्लैक, न्यूरोफिब्रिलरी टैंगिल|
  • Alzheimer’s Disease, beta amyloid plaque, neurofibrillary tangles, young onset Alzheimer’s Disease, early-onset Alzheimer’s Disease, mixed dementia, Atypical Alzheimer’s disease, Posterior cortical atrophy (PCA), Logopenic aphasia, Frontal variant Alzheimer’s disease.
श्रेय: (Public domain pictures) neuron death picture: 7mike5000 [CC BY-SA 3.0], via Wikimedia Commons, hippocampus: By Derivative work: Looie496 (File:Gray739.png) [Public domain], via Wikimedia Commons, Pictures of brain changes in AD, and brain shrinkage: By National Institute on Aging [Public domain], via Wikimedia Commons, brain lobes image: Henry Vandyke Carter [Public domain], via Wikimedia Commons.

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